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श्रेष्ठता का अतिवाद


इतिहास के झरोखे से...

यह अच्छा हो या बुरा किंतु निर्मल मन से हमें यह स्वीकारना ही होगा कि सभ्यता के बोध के साथ वंश की श्रेष्ठता का भाव मानव मन के एक कोने में सदा के लिये बस चुका है । आप इसे मानव-सभ्यता का साइड-इफ़ेक्ट कह सकते हैं । समाज में कुछ लोग श्रेष्ठ होना चाहते हैं तो कुछ अपनी श्रेष्ठता बनाये रखना चाहते हैं । “श्रेष्ठवंश” के इस भाव ने समाज में उच्च और निम्न वर्ग के अंतर को बनाये रखा है । ग्रीक राजवंशों से लेकर हिटलर और माओ तक रक्त की श्रेष्ठता और शुद्धता को लेकर असुरक्षा के भय से ग्रस्त बने रहे । जेनेटिक शुद्धता की असुरक्षा के संकट से निपटने के लिये जातीय संहार से लेकर ब्रेन-वाश और भाई-बहन के परस्पर विवाह तक की विधियों को पूरी दुनिया में अपनाया जाता रहा है । भारत में नियोग के अतिरिक्त तपश्चर्या पर विश्वास किया जाता रहा तो पश्चिमी और मध्य एशियाई देशों में रक्तसम्बन्धों में विवाह पर भरोसा किया जाता रहा । हिटलर ने जातीय संहार को अपनाया तो माओ ने अपनी जीवित प्रयोगशालाओं में मनोवैज्ञानिक तरीकों पर भरोसा करते हुये किशोरावस्था से ही भावी पीढ़ी के मस्तिष्क का वैचारिक प्रक्षालन प्रारम्भ किया । माओ को यह विश्वास था कि इस तरह के प्रक्षालन से तैयार पीढ़ी के परस्परिक विवाह से होने वाली संतानों के जींस में होने वाले गुणात्मक म्यूटेशन से कम्युनिज़्म के जेनेटिक ट्रेट्स विकसित होंगे जो शुद्ध कम्युनिज़्म का संवहन करेंगे । माओ के इस प्रयोग से एक मज़ेदार बात यह प्रमाणित होती है कि वर्गभेद का विरोध करने वाले माओ के मन में भी मनुष्य की प्रकृति, आचरण और विचारों को लेकर श्रेष्ठता और हीनता का स्थायी भाव था ।

महानता के बोध में डूबता चला गया यूनान...
         
अपने दुर्दांत योद्धाओं, बेहद ख़ूबसूरत स्त्रियों, गणित, कला और दर्शन प्रेमी नागरिकों की विरासत से सम्पन्न यूनान को भी एक दिन खंडहर और विनाश देखने के लिये बाध्य होना पड़ा था । कहीं इस सबका कारण उसका अतिवाद तो नहीं !   
एथिकल और वंशीय महानता के बोध से ग्रीक मूल का मिस्री बादशाह “सिकन्दर महान” भी ख़ुशफ़हम था । ग्रीक राज-वंशों में रक्त की शुद्धता बनाये रखने के लिये भाई-बहनों के पारस्परिक विवाहों की परम्परा ही पड़ गयी । जेनेटिक शुद्धता को लेकर ये लोग इतने चिंतित थे कि अपना नाम तक नहीं बदलना चाहते थे । वंश परम्परा से चले आ रहे नाम में ही केवल संख्याओं के आधार पर उन्हें चिन्हित किया जाने लगा । कला, दर्शन और गणित के प्रेमी ग्रीक राजाओं की पहचान गणितीय संख्याओं पर आश्रित होने लगी । ग्रीकमूल की मिस्री शासक क्लियोपेट्रा सप्तम् के माता-पिता भी आपस में भाई-बहन थे । तीन सौ वर्ष तक ग्रीस पर शासन करने वाले टोलेमी राजवंश की अंतिम स्त्री शासक क्लियोपेट्रा ने भी अपने दो भाइयों से विवाह किया था । ईसापूर्व 69 में जन्मी क्लियोपेट्रा सप्तम् के पिता टोलेमी त्रयोदश का भी विवाह अपनी बहन के ही साथ हुआ था ।

विद्वता और सौन्दर्य की नैसर्गिक सम्पत्तियाँ भी उसे क्रूर होने से नहीं बचा सकीं... 

इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई अपनी वीरता और देशप्रेम के लिये विख्यात हुयीं तो मात्र 39 वर्ष तक जीवन को भरपूर भोग कर दुनिया को अलविदा कहने वाली मिस्र की क्लियोपेट्रा अपनी विद्वता, बहुभाषाज्ञान, सत्ता की अदम्य भूख के लिये शारीरिक समझौतों, कई विवाहों, प्रेम सम्बन्धों, भाई-बहन की हत्याओं और ख़ूबसूरती के लिये चर्चित हुयी । उसने सत्ता के लिये अपने भाई से पति बने टोलेमी त्रयोदश और छोटी बहन अर्सिनोय चतुर्थ की हत्या करवा दी । किशोरावस्था से लेकर अपनी युवावस्था तक क्लियोपेट्रा के जीवन में चार पुरुष आये और चले गये... दो अपने स्वयं के भाई, तीसरा ज़ूलियस सीज़र और चौथा मार्क एण्टोनी । इस बीच उसने चार बच्चों को भी जन्म दिया, ज़ूलियस सीज़र से सीज़ेरियॉन, और मार्क एण्टोनी से तीन बच्चे ।
ईसापूर्व 30 में रोम ने अलेक्ज़ेण्ड्रिया पर हमला किया । युद्ध में मार्क एण्टोनी की पराजय हुयी । रोमन्स ने मार्क एण्टोनी को क्लियोपेट्रा के मरने की झूठी ख़बर सुना कर आत्महत्या के लिये प्रेरित किया । रोमन्स जो चाहते थे वही हुआ, एण्टोनी ने आत्महत्या का प्रयास किया, उसे रक्तरंजित अवस्था में क्लियोपेट्रा के पास ले जाया गया । घोर निराशा और अथाह दुःख के सागर में डूबी क्लियोपेट्रा ने एण्टोनी को अपना वास्तविक पति और प्रेमी स्वीकार करते हुये अपने शरीर को कूटना और नोचना शुरू कर दिया । उसके कारुणिक विलाप को देखकर शत्रु और विरोधी भी दहल गये, पूरा मिस्र दुःखित हुआ ।
रक्तरंजित एण्टोनी का शरीर क्लियोपेट्रा के सामने था । ज़िन्दग़ी को भरपूर जीने की शौक़ीन क्लियोपेट्रा को लगा कि अब उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी है । दूसरों को क्रूरता से मरवा देने वाली क्लियोपेट्रा ने अपनी मौत के लिये भी एक दर्दनाक तरीका ही चुना । बारह अगस्त को अलेक्ज़ेण्डिया के एक मौसोलियम में सर्पदंश लेकर क्लियोपेट्रा ने दुनिया को अलविदा कह दिया । अतिवाद की वंशपरम्परा ने क्लियोपेट्रा को जिस मार्ग पर ढकेला था उसकी ऐसी परिणति दुःखद है और हम सबके लिये सचेतक भी ।
 


आर्यों का श्रेष्ठत्व...

शब्द “आर्य” श्रेष्ठत्व का बोधक है । आर्यों की श्रेष्ठता अपने सार्वभौमिक चिंतन, उदात्त मानवीय संस्कारों और आचरण में सतत परिमार्जन का परिणाम हुआ करती थी । श्रेष्ठ होना एक सतत गतिमान प्रक्रिया है जो सात्विक तपश्चर्या की अपेक्षा करती है । आर्यों को अपने सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतन के लिये जाना जाता रहा है । कालांतर में तपश्चर्या समाप्त हो गयी, आत्मिक विकास की गतिमान प्रक्रिया अवरुद्ध हो गयी और पूर्वजों की महानता को ओढ़ने का विकल्प जीवन में अपना लिया गया ।
आर्यों के आधुनिक वंशजों में अपने पूर्वजों की महानता का लेश भी दिखायी नहीं देता । राजा और प्रजा के सामूहिक चारित्रिक पतन ने विदेशी आक्रमणकारियों को अवसर उपलब्ध होने दिया । आर्यावर्त पददलित हुआ और एक दीर्घपराभव के दुःख को भोगने के लिये विवश हुआ । हम अभी तक इस दुःख से मुक्त नहीं हो सके हैं... मुक्त होने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं ।
तब आर्यत्व एक अर्जित पद हुआ करता था, लोग अनार्यत्व से आर्यत्व की दिशा में चलने के लिये साधना किया करते थे । अब हम मानते हैं कि हमारी अकर्मण्यता और जड़ता ने हमें आर्यत्व से बहुत दूर कर दिया है । मूर्ति पूजा के विकृत स्वरूपों, पाखण्डों, विकृत अनुष्ठानों और तामसी वृत्तियों ने हमारे पूर्वजों के आर्यत्व से हमें वंचित कर दिया है । हम आर्य कहलाने के लेश भी अधिकारी नहीं रहे ।
जब मैं उच्च-शिक्षितों को आर्थिक अपराधों में लिप्त पाये जाने की सूचनायें पढ़ता हूँ, अनुष्ठान कराने वाले पंडितों के पतन को देखता हूँ, शिक्षकों को छात्राओं के यौनशोषण में लिप्त होने की ख़बरें सुनता हूँ, पूजा पण्डालों के अनैतिक व्यापार को देखता हूँ, धार्मिक कार्यों के लिये असामाजिक तत्वों को निर्भय हो चंदा वसूलते देखता हूँ, गुरुओं को राष्ट्रविरोधियों के पक्ष में खड़े होकर कुतर्क करते हुये देखता हूँ... तो मुझे लगता है कि अब आर्यत्व एक अतीत का विषय हो कर रह गया है और उसके स्थान पर एक आतंकवाद जन्म ले रहा है । यह आतंकवाद अनियंत्रित है, निरंकुश है, निर्भय है और अतिवादियों द्वारा पोषित है । मेरा स्पष्ट मत है कि आत्मोत्थान के बिना आर्यत्व और हिंदुत्व की बात करने का कोई अर्थ नहीं है । हिंदू मत में अपनी विचारधारा दूसरों पर थोपने का कोई प्रावधान नहीं है किंतु जो ऐसा करके स्वयं को हिंदू धर्म के रक्षक होने के मिथ्याभिमान में चूर हैं वे निश्चित रूप से एक धार्मिक आतंकवाद के पोषक हैं । यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो एक दिन हिंदू धर्म भी लोगों की घृणा का विषय बन जायेगा । हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि किसी भी सिद्धांत की पहचान और उसका व्यावहारिक अस्तित्व उसके अनुयायियों द्वारा ही प्रतिष्ठित या तिरस्कृत होता है ।

नहीं रहे क्यूबा की क्रांति के जनक और वामपंथ के स्तम्भ फिडेल कास्त्रो



फिडेल कास्त्रो एक घोर अमरीका विरोधी वामपंथी थे। क्यूबा की क्रांति के इस जनक को 1952 में 18 साल की जेल हुई मगर 1955 में माफ़ी दे दी गयी और ये मैक्सिको चले गए वहां इनकी मुलाकात चे घिवेरा से हुई ..वहां से सन 1956 में वामपंथी आतंकी चे घिवेरा के साथ 81 लोग वापस क्यूबा आये और क्यूबा में घुसते ही इनसे क्यूबा की पुलिस से मुठभेड़ हुई और 18 जिन्दा बचे जिसमे फिडेल और घिवेरा भी शामिल थे..2 राइफल और 18 लोगो के साथ शुरू हुआ सत्ता से संघर्ष ,1959 में क्यूबन तानाशाह फुलखेंशियो बतिस्ता को गद्दी से हटाकर फिडेल के सत्ता प्राप्त करने पर खत्म हुआ..कास्त्रो 47 साल तक क्यूबा के प्रधानमंत्री रहे..सिगार तथा बेसबॉल के शौक़ीन और यूएन में सबसे लंबा भाषण (लगभग साढ़े चार घंटे लगातार) देने वाले फिडेल कास्त्रो को सेक्स के लिए दिन में 2 से 3 अलग अलग लड़किया अपने बिस्तर पर चाहिए थी। क्यूबा के इस वामपंथी तानाशाह नेता के नाम कई जनसंहार और बिस्थापन दर्ज है मगर फिडेल के खाते में एक ऐसे क्रन्तिकारी तानाशाह(एकदलीय प्रणाली की छाया में बैठा हुआ तानाशाह) की छवि भी है जो अमरीका को आजीवन नाको चने चबवाता रहा.मगर इसी कारण क्यूबा पूरे विश्व से अलग थलग हो गया और वहां की अर्थव्यस्था तबाह हो गयी..फिडेल कास्त्रो एक ऐसा कम्युनिष्ट तानाशाह जिसके विरोधियों के पास दो ही रास्ते होते थे या तो वो मारे जायेंगे या क्यूबा छोड़ देंगे...फिडेल कास्त्रो एक ऐसा कम्युनिष्ट तानाशाह जिसे अमरीका समेत कई ख़ुफ़िया एजेंसिया मिल कर भी नहीं मार पाई..CIA ने फिडेल कास्त्रो को मारने के लिए 650 से ज्यादा बार प्रयास किये मगर अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी हर बार विफल रही..
एक बार नास्तिक वामपंथी फिडेल कास्त्रो ने कहा था की मैं भगवान को नहीं मानता था मगर CIA और अमरीका द्वारा कई दशको तक मुझे मारने के सैकड़ो प्रयास के बाद भी मैं जीवित बचा हूँ,इससे मुझे लगने लगा है की भगवान होता है...
खैर आज फिडेल कास्त्रो इस दुनिया में नहीं है और शोक के साथ साथ एक बड़ा हिस्सा हवाना में जश्न भी मना रहा है..आने वाला समय और क्यूबा की अगली पीढी इस वामपंथी कम्युनिष्ट तानाशाह का क्यूबा के निर्माण (या विध्वंस)में योगदान को तय करेगी..
आशुतोष की कलम से

औचित्यहीन तीन तलाक प्रथा

मुस्लिम महिलाओं के संगठन ने तीन बार तलाक की प्रथा के खिलाफ अर्जी दी है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उनकी राय जाननी चाही..केंद्र सरकार स्पष्ट रूप से उन महिलाओं के साथ खड़ी है और तीन तलाक प्रथा को औचित्यहीन बताया है..भारत तथाकथित और क़ानूनी रूप से एक सेकुलर देश है तो कानून सबके एक जैसे हो इससे भी इतर कई मुश्लिम देश तीन तलाक प्रथा के खिलाफ है तो भारत क्यों नहीं?? मानवाधिकार की दृष्टि से देखे दरअसल तीन तलाक प्रथा नारी शोषण के लिए उपयोग की जा रही है..
अगर कोई मुस्लिम युवक अपनी पत्नी को तीन बार तलाक तलाक तलाक बोल दे तो हो गया तलाक..कभी कभी दारु के नशे में बोल दे तलाक तलाक तलाक तो हो गया तलाक..कभी लड़ाई हुई और जोश में बोल दिया तलाक तलाक तलाक तो हो गया तलाक....अब रही बात जीवन यापन कैसे करेगी तो कांग्रेस के राजीव गांधी ने शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के मुह पर थप्पड़ मारते हुए मुसलमान समुदाय के लिए कानून बना के ये निश्चित कर दिया की शौहर फूटी कौड़ी नहीं देगा तलाक के बाद... और तो और शौहर को अगर गलती का पछतावा हुआ तो इससे बड़ी पीड़ा उसकी पत्नी झेलेगी.मुस्लिम विवाह नियमो के अनुसार पहले वो किसी और शक्श से शादी करेगी उसके साथ सोयेगी फिर वो व्यक्ति उसको तलाक तलाक तलाक करके तलाक दे देगा उसके बाद वो पुनः अपने पुराने शौहर के पास चली जायेगी...
ये कैसा अत्याचार???गलती दारू के नशे में शौहर करे और भुगतान उसकी बेगम दूसरे के बिस्तर पर करे..क्षमा कीजिये ये भारत है इराक सीरिया लीबिया या सूडान नहीं..
सभी मुस्लिम संगठनो को आगे आके एक सुर में इस अत्याचारी प्रथा का विरोध कर मुस्लिम महिलाओं को सशक्त बनाने में सहयोग करना चाहिए..विश्वास रखिये कठमुल्ले इसका विरोध करेंगे,फतवे देंगे मगर एक बार मुस्लिम बहनो ने ये बाधा पार कर ली तो विकास की अनंत संभावनाएं सामने हैं...
सबका साथ सबका विकास
जय हिन्द
आशुतोष की कलम से

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-2

सिकंदर के भारत में विजय और पोरस को पराजित करने की जो झूठ गाथा कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने लिखी थी उसको सिकंदर के समसामयिक ग्रीक और रोमन इतिहासकारों ने ही झुठला दिया..इसी सन्दर्भ में सिकंदर की पराजय पोस्ट की पहली कड़ी ,मैंने कुछ दिन पहले पोस्ट की थी उसे आप इस लिंक पर http://goo.gl/UO8hkG पढ़ सकते हैं..अब आगे बढ़ते हैं,
तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता का झूठ : तक्षशिला नरेश आम्भी का चित्रण वामपंथी कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने इस प्रकार किया है की उसका पोरस से बैर था और इसी कारण सिकंदर के साथ वह जा मिला. और सिन्धु नदी आसानी से पार कर गया, अब यूनानी लेखक कर्टियस(curtius Quintus) के अनुसार तक्षशिला नरेश आम्भी और सिकंदर की पहली वार्ता इस प्रकार थी
●●“what occasion is there for wars between you and me ,if you are not come to take from us our
water and other necessaries of life; the only thing reasonable men will take up arms for? As to gold and silver and other possessions, if I am richer than you, I am willing to oblige you with part; If I am poor, I had no objection to sharing in your booty.’’ (Plutarch, Page no 20)●●

मतलब आम्भी ने कहा की यदि तुम हमारा अन्न जल छिनने के लिए नहीं आये हो,जिसके लिए युद्ध हुआ करते हैं तो हम क्यू लड़ें??और यदि तुम्हे सोना,चांदी या धन की इच्छा से आये हो और मानते हो की मैं तुमसे ज्यादा धनी हूँ तो मैं इसका एक हिस्सा देकर तुम पर एहसान करना चाहूँगा और यदि तुम्हे ऐसा लगता है की तुम धनी हो तो, तो तुम्हारे लूटे हुए धन में से लेने में मुझे संकोच नहीं है.

इतना सुनने के बाद कोई नहीं कह सकता की इनमे मित्रता रही होगी और कोई स्वाभिमानी विजेता रहता तो तक्षशिला नरेश आम्भी का सर काट देता या स्वयं डूब मरता मगर ऐसा नहीं हुआ और किसी स्वार्थवश इन दोनों को मित्रता यहाँ हो गयी. मित्रता क्यू हुई इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है न तो रोमन न ही यूनानी न ही भारतीय इतिहास में इसका विवरण उपलब्ध है. परन्तु यहाँ उस एक झूठ से पर्दा अवश्य उठ जाता है जो कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने फैलाया है की तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता थी..
सिकंदर ने विभिन्न राजाओं के पास अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु दूत भेजे..पोरस ने सिकंदर के दूत से कहवा भेजा कि, सिकंदर से अब मुलाकात युद्ध के मैदान में ही होगी.और उसने झेलम किनारे अपनी सेना को तैयार रहने को कहा ..पोरस का पडोसी अभिसार नरेश था जिससे पोरस की मित्रता थी और इन दोनों ने साथ मिलकर कई राज्यों को जीता था. अभिसार नरेश की रिश्तेदारी उन अश्वको से भी थी जिन्होंने सर्वप्रथम सिकंदर की सेना को 9 माह रोके रक्खा था .उन्होंने “ओनस(Aornus)” दुर्ग पर सिकंदर के अधिकार के बाद कई अश्वाकों को अपने राज्य में शरण भी दी थी. अतः अभिसार नरेश अनिर्णय में थे की सिकंदर का साथ दें या पुराने मित्र पोरस का...अतः उन्होंने सिकंदर के भेजे गए दूत को बंदी बना लिया जिससे की सिकंदर को सही स्थिति पता न चले और वो स्वयं पोरस से मिलने की तैयारी में लग गए . सिकंदर को अभिसार नरेश की इस चाल का आभास हो गया और वो अपने नए नए बने मित्र तक्षशिला नरेश आम्भी के साथ दोनों सेनाओ को लेकर झेलम किनारे पोरस से युद्ध करने चले आये और इस युद्ध में पोरस अकेला रह गया था .पोरस की सेना झेलम किनारे कडीग्राम के पास थी और वहां शत्रु की हलचल देख रही थी.झेलम में बाढ़ थी नदी की विकराल बाढ़ को देखकर नदी पार करना असंभव था .
इस पस्थिति में सिकन्दर की मनोदशा का वर्णन निम्न दो वक्तव्यों से हो जाता है.

●विसेंट स्मिथ के शब्दों में “ सिकंदर भारतीय सेना का संगठन देखकर वहीं ढीला पड गया.”
●सिकन्दर पर लिखने वाले यूनानी इतिहासकार एरियन के शब्दों में “सिकंदर ने वहां से चोरी छिपे हटने का निर्णय किया"

●●It was clear to Alexander that he could not effect the crossing at the point where Porus held the opposite bank, for his troops would be attacked as they tried to gain the shore, by a powerful and efficient army, well equipped and supported by a large number of elephants, moreover, he thought it likely that his horse, in face of an immediate attack by elephants, would be too much scared by the appearance of these beasts and their unfamiliar trumpetings to be induced to land-indeed, they would probably refuse to stay on the floats, and at the mere sight of the elephant in the distance would go mad with terror and plunge into the water long before they reached the further side.

अब यूनानी इतिहासकार एरियन को पढ़कर स्पष्ट है की सिकंदर पोरस की सेना और हाथियों को देखकर भयभीत हो गया था और उसे डर था की ये हाथी उसके घोड़ो और पैदल सैनिको को नदी में ही डूबा डूबा कर मार डालेंगे.ये देखकर सिकंदर ने ये प्रचार करवा दिया की वो कम से कम 6 माह तक झेलम किनारे रुकेगा और इस बात को सत्य सिद्ध करने के लिए कई सैनिको को घोड़ो का चारा लाने को भेज दिया. इस बीच उसने नदी का कई जगहों से मुआयना करने के बाद लगभग 6-7 सप्ताह में नदी पार करने लायक एक किनारा खोज निकाला जो की 16 मील उत्तर की ओर नदी के जंगलो से घिरे एक टापू के समीप था . अब उसने क्रेटस नाम के अधिकारी को तक्षशिला की 5000 सेना देकर वर्तमान कैम्प की निगरानी करने को कहा और छिपकर नदी पार करने वाली जगह पर सैनिको को तैनात करके स्वयं नदी पार करने को निकला सेना को आदेश था की जैसे ही सिकंदर नदी पार कर जाये नदी पार करने वाली जगह के सैनिक पीछे से पोरस के सैनिको पर हमला करे और पहले कैम्प की सेना मुख्य आक्रमण के समय उसका साथ दे. उस रात भीषण वर्षा और तूफ़ान के कारण सिकंदर के नदी पार करने की गतिविधि का ज्ञान पोरस की सेना को नहीं हो पाया और सिकंदर नदी पार कर गया.. सिकंदर का दुर्भाग्य ये था की नदी पार करके वो सही जगह न पहुच कर एक टापू पर पहुच गया और सवेरा होते ही पोरस के सैनिको को उसकी चाल का पता लगा गया और जब सिकंदर कड़ी के मैदान में पंहुचा तो सामने पोरस के सैनिको से सामना हुआ .

अगले भाग में महाराजा पोरस के पुत्र के साथ हुआ कडी के मैदान का युद्ध जिसमें सिकंदर की सेना की पोरस के सेना के हाथियों ने धज्जियाँ उड़ा दी और सिकंदर का घोडा मार गया और सिकन्दर बुरी तरह घायल हो गया..

आशुतोष की कलम से

आतंक का मजहब (Religion_of_Terror‬)

आशा है की इस पोस्ट से तर्क और सत्य स्वीकारने वाले राष्ट्रवादी मुस्लिम बंधुओं की भावना आहत नहीं होगी..मैं बहुत स्पष्टता से कहना चाहता हूँ की आतंक का स्थापित मजहब इस्लाम है और पूरा विश्व इसे सदियों से देख रहा है। जो मुसलमान भाई आतंकवादी गतिविधियों से दूर है उन्हें इस सच से कष्ट नहीं होना चाहिए।

पड़ोस के बांग्लादेश में आतंकवादियों ने हमला किया और कुछ लोगों को बंधक बना लिया। यहाँ तक इसे मैं धर्म से दूर रख सकता था मगर बंधकों की हत्या का क्राइटिरिया क्या बनाया इन्होंने??
"हाथ में अरबी में लिखी कुरान दे दी और जिसने कुरान की आयते पढ़ लीं उन्हें जाने दिया जो कुरान की आयते नहीं पढ़ पाये उन्हें रमजान के पाक माह में,अल्ला हो अकबर के नारे के साथ उनके गले को चाक़ू से रेतकर मार डाला गया ....."
कुरान न पढ़ पाने वालों की हत्या करते ही आतंक का मजहब स्थापित हो गया..न तो कुरान न पढ़ पाने वालों की हत्या करने का ये पहला मामला है,न ही ये आखिरी होगा..पुरे विश्व में ये हो रहा है और पूरा विश्व आँखों पर सेकुलर चश्मा लगाये हुए बैठा है..
क्या आप को याद आ रहा है की पूरे विश्व में कितनी घटनाएं हुई हैं जब "वेद" "गीता" "रामचरितमानस","ओल्ड या न्यू टेस्टामेंट","गुरु ग्रन्थ साहिब","जींद अवेस्ता" न पढ़ पाने वाले की आतंकवादियों ने हत्या की हो..शायद नहीं या कोई खोद कर ले आये तो 50-100 सालों में एक बार.मगर कुरान के नाम पर रोज हत्या,अल्लाह के नाम पर रोज बम विस्फोट...ये कौन सा मजहब है ये कौन सा धर्म है???
भारत में स्थिति में सबसे दुखद वर्तमान मुसलमान बिरादरी का भ्रम है की वो औरंगजेब और बाबर की औलाद हैं। 99% मुसलमान ये सत्यता जानते हैं और मन ही मन मानते भी हैं की उनके पुरखे हिन्दू थे और इसी प्रकार गला रेतकर,बलात्कार,जजिया के दम पर कलमा पढ़वाया गया उनसे..मगर आज हो क्या रहा है ISIS के 5 संदिग्ध आतंकवादी पकडे जाते हैं तो ओवैसी उनके लिए करोडो के वकील ले कर खड़े हैं।अब्दुल कलाम के जनाजे में भले ही मुट्ठी भर लोग रहे मगर "आतंकवादी याकूब मेमन" का जनाजा धूमधाम से निकलेगा..लादेन के लिए जयपुर के मस्जिद में नमाज होगी और कश्मीर में भारत मुर्दाबाद होगा..
बात सिर्फ हिन्दू मुसलमान की नहीं है बात है दुनिया के दो धड़ों की , नमाजी और काफ़िर..अभी बांग्लादेश में या भारत में नमाजी काफ़िर को मार रहा है "काफ़िर" वही जो कुरान नहीं पढ़ पाये..इससे भी आगे बढे तो असली कहानी है खूनखराबे के मूल से उदभव की..
पाकिस्तान,अफगानिस्तान,सीरिया,कुवैत,लेबनान लीबिया,सूडान...... यहाँ जितने गैरमुस्लिम काफ़िर थे उन्हें या तो मार डाला गया या वो भारत के वर्तमान मुसलमानो की तरह नमाजी बन गए..मगर फिर भी रोज वहां हत्याएं हो रही है.वहां नमाजी में भी 3 टाइम वाला या 5 टाइम वाला देखकर गला रेता जा रहा है.मतलब खूनखराबे का कोई न कोई रास्ता निकाल लिया जायेगा. जैसे केजरीवाल हर बात पर मोदी की माला जपता है इस्लामिक बुद्धिजीवी हर बात में अमरीका के हाथ की माला जपते हैं जबकि लादेन,अल जवाहिरी,आईएसआईएस, जैसे आतंकवाद के स्थापित और अमिट हस्ताक्षर मस्जिदों में तकरीर करके ही आगे बढे हैं..
सभी मुस्लिम भाइयों से अनुरोध है की सत्य स्वीकारिये और इनका प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन बंद करें क्योंकि जब कोई "काफिर" नहीं रहेगा तो ये आग आप के घर में भी लगेगी. आज वही देश ज्यादा सुरक्षित हैं जहाँ काफिरों की संख्या ज्यादा है.. भारत के सभी काफिरों(गैरमुश्लिम) और सूवरों(छद्मसेकुलर) को सन्देश ये है की इस भुलावे में न रहे की आप बचे हैं अलकायदा का भारतीय चीफ संभल उत्तर प्रदेश का है और ISIS के समर्थन में मुकदमा लड़ने वाले ओवैसी बंधू भारत के ही हैं. अरीब मजीद ISIS का लड़का महाराष्ट्र का है तो यूपी वाले सीरिया में शहादत दे आये हैं.. तो आप या तो प्रतिउत्तर के लिए तैयार रहें या मरने के लिए....
एक रास्ता और भी है "कुरान की कुछ आयते याद कर लें,शायद अगली बार आपका गला कटने से बच जाये"...

JNU छाप बुद्धिजीवी वर्ग में पाँव पसारती #Congiunism की विचारधारा


भारत में एक नयी विचारधारा का जन्म हो रहा है..कांग्रेस और कम्युनिज्म के देशद्रोही गठबंधन की जिसमें इस्लामिक जेहाद और हिन्दू विरोध का स्वाभाविक सा तड़का लगा हुआ है..इसे मैंने #Congiunism का नाम दिया है..
जानिये इस #Congiunism के मूल तत्व क्या हैं..
ये कांग्रेस और कम्युनिष्ट की सम्मिलित विचारधारा है..
 ये भारत को जोड़ने में नहीं बल्कि तोड़ने में विश्वास रखती है 
ये कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते.
ये लोग दुर्गा माता को वेश्या कहते हैं..
ये लोग भारतीय सेना के जवानो की मौत का जश्न मनाते हैं.
 ये भारतीय सेना के लीगों को बलात्कारी कहते हैं.
 इनके आदर्श अफजलगुरू हैं.
 ये जेएनयू दिल्ली में ज्यादा मिलते हैं।
 इनके प्रमुख सहयोगी राहुल गांधी,अरविन्द केजरीवाल,ABP News,NDTV और आज तक हैं..
आशुतोष की कलम से 

ट्विट@ashu2aug
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भारतीय सेना बलात्कारी है: कांग्रेसी सपोला कामरेड कन्हैया

कांग्रेस,कम्युनिष्ट और केजरीवाल का पाला हुआ एक सपोला अपनी जेएनयू की बिल से बोल रहा है की भारतीय सेना बलात्कारी है..
मेरा प्रश्न उस सपोले से नहीं उसे दूध पिलाने वाले कांग्रेसी,वामपंथी और केजरीवाल की टोपी गैंग से है।
बाढ़ से लेकर पुल बनाने तक सेना चाहिए। जब आतंकवादियों से तुम्हारी पैंट गीली पीली हो तो भी सेना चाहिए जब भूकंप में तुम्हारा घर तबाह हो तो सेना चाहिए और जब सीमा पर गोली चले तब तो सेना चाहिए ही..कई कांग्रेस,वामपंथी,केजरीवाल जैसे नेताओं ने अपने घरों की महिलाओं की सुरक्षा में सेना को तैनात कर रखा है तो अगर सेना बलात्कारी है तो तुम सबकी बहनो,बेटियों और पत्नियों का बलात्कार हुआ होगा जिन्होंने सैनिको की सुरक्षा या सेवा ली है..
सबसे पहल प्रश्न तो जेएनयू के गद्दारों के साथ खड़े राहुल गांधी के वंशावली पर हो जायेगा क्योंकि उनके नाना,दादी,दीदीमम्मी सबने भारतीय सेना की सेवाएं ली हैं और ले रही हैं.केजरीवाल जी आप की बिटिया और पत्नी भी यदा कदा सुरक्षा लेती हैं..वामपंथियों का क्या कहना सेना के जवान के मरने का जश्न भी मनाते हैं और सुरक्षा में सेना का जवान भी चाहिए..
यदि सेना बलात्कारी है तो 24 घंटे सेना के भरोसे साँस लेने वालों तुम सब अपने पिता की संतति कैसे हो गए??तुम सबकी बाप हुई #भारतीय_सेना..
कांग्रेसियों,कम्युनिष्ट और केजरीवाल के गुंडों Narendra Modi को गाली देना स्वीकार है मगर देश को या भारतीय सेना को गाली देकर तुम ये साबित कर दे रहे हो की तुम्हारे जन्म से माह पहले तुम्हारी अम्मीजान जरूर लाहौर के "हीरामंडी" का पर्यटन करके आई होंगी...

 आशुतोष की कलम से
 टवीट:  @ashu2aug

आर्यभट्ट एवं शून्य के आविष्कार से सम्बंधित भ्रान्ति (Zero in india)

आज कल हिन्दू संस्कृति विरोधीयों ने एक जोक फैलाया है की जब आर्यभट्ट ने शून्य की खोज 500 ईसवीं के लगभग की तो 100 कौरवों और रावण के 10 सर की गिनती किसने की???
◆◆आर्यभट्ट ने शून्य की खोज अपने द्वारा अविष्कृत अक्षरांक पद्धति में किया है न की सभी पद्धतियों में।ठीक उसी प्रकार जैसे किताब को अंग्रेज बुक लिखते हैं इसलिए बुक की खोज करने वाले अंग्रेज हुए मगर उसी को किताब के रूप में किसी और ने खोजा ...
◆◆आविष्कार और शोध में अंतर है । शोध निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जबकि आविष्कार नितांत नवीन और अभूतपूर्व होता है । यूँ मेटाफ़िज़िक्स की दृष्टि से देखें तो अभूतपूर्व भी कुछ नहीं होता । सब कुछ रिपीट होता है, बस केवल हमारे सामने जो पहली बार प्रकट होता है हम उसे आविष्कार मान लेते हैं । अग्नि बाण पहले भी थे ... आज भी हैं । बीच के काल में नहीं थे । सभ्यताओं के उदय और अस्त के साथ इन सब चीजों का भी उदय-अस्त होता रहता है । उदय-अस्त का अर्थ केवल एपियरेंस एण्ड डिसएपियरेंस भर है । सूर्य अस्त होने के बाद भी समाप्त नहीं हो जाता । शून्य के अस्तित्व के बिना स्थापत्य कला, विज्ञान, दर्शन आदि के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती । यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि शून्य का अस्तित्व वैदिक काल से भी पूर्व का है ।
◆◆आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) को शून्य का आविष्कारक नहीं माना जा सकता। आर्यभट्ट ने एक नई अक्षरांक पद्धति को जन्म दिया था। उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में भी उसी पद्धति में कार्य किया है। आर्यभट्ट को लोग शून्य का जनक इसलिए मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय (498 ई.) केगणितपाद 2 में एक से अरब तक की संख्याएं बताकर लिखाहै 'स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात' मतलब प्रत्येक अगली संख्या पिछली संख्या से दस गुना है। उनके ऐसे कहने से यह सिद्ध होता है कि निश्चित रूप से शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है।
◆◆पिंगलाचार्य भारत में लगभग 200 से 500ईसा पूर्व के बीच छंद शास्त्र के प्रणेता पिंगलाचार्य हुए हैं (चाणक्य के बाद) जिन्हें द्विअंकीय गणित का भी प्रणेता माना जाता है। इसी काल में पाणिनी हुए हैं जिनको संस्कृत का व्याकरण लिखने का श्रेय जाता है। अधिकतर विद्वान पिंगलाचार्य कोशून्यका आविष्कारकमानते हैं।पिंगलाचार्य के छंदों के नियमों को यदि गणितीय दृष्टि से देखें तो एक तरह से वे द्विअंकीय (बाइनरी) गणित का कार्य करते हैं और दूसरी दृष्टि से उनमें दो अंकों के घन समीकरण तथा चतुर्घाती समीकरण के हल दिखते हैं। गणित की इतनी ऊंची समझ के पहले अवश्य ही किसी ने उसकी प्राथमिक अवधारणा को भीसमझा होगा। अत: भारत में शून्य की खोज ईसा से 200 वर्ष से भी पुरानी हो सकती है।
◆◆ बख्शाली पाण्डुलिपि :गणित के एक बहुमूल्य ग्रंथ बख्शाली पाण्डुलिपि के कुछ (70) पन्ने सन् 1881 में खैबर क्षेत्र में बख्शाली गांव के निकट बहुत हीजीर्ण अवस्था में मिले थे। ये भोजपत्र पर लिखे गए हैं। इनकी भाषा के आधार पर अधिकांश विद्वान इन्हें 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का मानते हैं। यह ग्रंथ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह शुल्व सूत्री (वैदिक) गणित के ईसा पूर्व 800 से लेकर ईसा पूर्व 500 के काल के बाद के गणितीय रूप को दर्शाता है। इस पाण्डुलिपि में शून्य का जिक्र है।भारत में उपलब्ध गणितीय ग्रंथों में 300 ईस्वी पूर्व का भगवती सूत्र है जिसमें संयोजन पर कार्य हैतथा 200 ईस्वी पूर्व का स्थनंग सूत्र है जिसमें अंक सिद्धांत, रेखागणित, भिन्न, सरल समीकरण, घन समीकरण, चतुर्घाती समीकरण तथा मचय (पर्मुटेशंस) आदिपर कार्य हैं। सन् 200 ईस्वी तक समुच्चय सिद्धांत के उपयोग का उल्लेख मिलता है और अनंत संख्या पर भी बहुत कार्य मिलता है।
◆◆ ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है-ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भीपूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता केबारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है।
◆◆यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक"कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्यदेश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
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स्रोत: गूगल ब्लॉग,कौशलेन्द्रम मिश्र अतिदलित जी,आशुतोष की कलम से....
https://www.facebook.com/ashutoshkikalam

सोशल मिडिया से युद्ध का ऐलान करते महारथी (social Media War)

#War #युद्ध
◆ दृश्य एक: 24 दिसम्बर 1999 को इस्लामिक आतंकवादियों ने  में इंडियन एयरलाइंस फ्लाईट 814 का
आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया और उसे अफगानिस्तान के कंधार ले गए.. 178 यात्री थे जिसमें से एक यात्री रूपीन कत्याल विरोध करने के कारण मारा गया. बाकी 177 मुसाफिरों ने भारीे हथियारों से लैस आतंकियों का कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई..

◆ दृश्य दो:  मुसलमान आतंकवादीयों ने ग्यारह सितम्बर 2001 अमेरिका में ट्वीन टावर आतंकवादियों ने उड़ाया..यात्रियों से भरे एक हाइजैक जहाज को आतंकवादी व्हाइट हाउस की ओर ले जा के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के आवास पर गिराना चाहते थे मगर यात्रियों ने आतंकियों से लड़ाई की.काकपिट तक पहुचता देख "अल्लाह हूँ अकबर के नारे के साथ" मजबूरी में आतंकियों को विमान पहले गिराना पड़ा. सभी यात्री मारे गये..सभी आतंकी मारे गए।।व्हाइट हाउस सुरक्षित रहा..

◆ दृश्य तीन: आतंकवादी अयूब_अल_खज्जानी ने एम्स्टर्डम से पेरिस जा रही एक हाई स्पीड ट्रेन में एक47 और बमो से लैस होकर हमला किया। ट्रेन में यात्रा कर रहे अमरीकी एंथोनी सालडर, एलेक स्कारलाटोस और स्पेंसर स्टोन ने इस्लामिक आतंकवादी #अयूब_अलखज्जानी से ट्रेन में भिड़ गए और आतंकवादी को धर दबोचा..इस गोलाबारी में दर्जनों की जान जा सकती थी मगर तीन लोग गंभीर रूप से घायल हुए..

◆दृश्य चार:पुनः कांधार हाइजैक से सम्बंधित है..विमान अपहरण के बाद यात्रियों के परिजनों की इकट्ठा भारी भीड़। सभी का कहना था की किसी भी कीमत पर उन्हें उनके परिजन जीवित चाहिए एक की भी जान अब नहीं जानी चाहिए..सरकार चाहे आतंकी छोड़े या वार्ता करे सेना भेजे या कोई भी कीमत दे मगर कोई भी मरना नहीं चाहिए..अंततः अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस समेत सभी दलों की सहमति से 3 खूंखार आतंकवादियों को छोड़ा और सभी यात्री वापिस आये..

◆ दृश्य पांच: वर्तमान का दृश्य...भारत में हुए पठानकोट आतंकी हमले के बाद हम सब सोशल मिडिया से युद्ध की घोषणा कर रहे है..मैं सन 1999 के पुराने आर्काइव वीडियो खंगाल रहा हूँ जिसमे विमान हाइजैक में फसे यात्रियों के परिवारों के कुछ लोग ये कहते मिल जाए  "मरते हैं परिजन तो मरने दो मगर आतंकवादियों को रिहा करके घुटने मत टेको..हमें परिजनों से प्यारा हमारा देश है.."
कई घंटो की खोज के बाद ऐसा वीडियो मिल नहीं पाया...आप में से किसी को मिल जाए तो जरूर भेजिएगा..मुझे वो वीडियो Narendra Modi के पास भेजकर उनको याद दिलाना है की हम लोग सिर्फ फेसबुक से तोप नहीं चलाते, आप युद्ध कीजिये विपत्ति काल में  सैनिको के साथ साथ हम आम भारतीय भी अपने परिवार समेत मरने को तैयार थे.

आशुतोष की कलम से
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ट्वीट :   @ashu2aug 

पाकिस्तान नीति :मोदी का यू टर्न या कांग्रेसी कुकर्मों का फल

‪#‎मोदीसरकार‬ ‪#‎अच्छेदिन‬ ‪#‎यूटर्न‬?
सत्ता से बाहर रहकर युद्ध और सर काटने की बात करने वाली भाजपा आज युद्ध से भाग रही है..मोदी ने U टर्न मार लिया??आओ कांग्रेसियों,वामियों,आपियों,पापियों मैं बताता हूँ की पाकिस्तान से युद्ध क्यों नहीं कर सकता मोदी..
दरअसल ये प्रधानमंत्री मोदी का ये U टर्न तुम्हारे कुकर्मो का फल है..‪#‎कांग्रेस‬(04-14) और ‪#‎वामपंथियों‬ (04-09)ने कहाँ भारत के रक्षा तंत्र को पंहुचा दिया ●वामपंथी और कांग्रेसियों अपने दस साल के शासन काल में भारतीय सेना,वायुसेना,BSF को ISI के एजेंटो का दूसरा घर बना दिया है तुमने जिसकी सफाई पिछले डेढ़ साल से कर रहा है Narendra Modi..और हर रोज ISI के कांग्रेसी दामाद गिरफ्तार हो रहे हैं..

● कामपंथी और अल-खान्ग्रेसियों 10 साल में तुमने कितने आयल रिजर्व बनाये??युद्ध सिर्फ बयान से नहीं लड़े जाते.आयल रिजर्व भारत के पास कितने दिनों का था जब मोदी ने सत्ता संभाली? सितम्बर 2015 से मोदी सरकार नए आयल रिजर्व बना रही है जिससे की तुम्हारे कुकर्मो और ऐय्याशियों से तबाह सेना को हिम्मत मिले..
● युद्ध के लिए कम से कम 40 दिन की सामग्री होनी चाहिए.. इटली वाली बाई और मौनी बाबा की कृपा से सेना के पास 40 दिन तक चलने वाला सिर्फ 10 फीसदी गोला बारूद ही था। जबकि 50 फीसदी से ज्यादा गोला-बारूद तो केवल एक हफ्ते तक के लिए मौजूद था।
● चीन के पास 60 से 80 दिन का रिजर्व है और भारत के पास??कांग्रेसियों तुमने दलाली के चक्कर में सिर्फ 7 दिन का रिजर्व रख छोड़ा था..और बाते करोगे को मोदी क्यों युद्ध नहीं कर रहा..
●याद है अल-खान्ग्रेसियों तुमने 10 साल में सेना को इतना तबाह कर दिया की भारतीय सेना का जनरल तुम्हे चिट्टी लिखता रहा,चिल्लाता रहा की भारत की सेना के पास लड़ने को हथियार नहीं और तुम लोग 2G,3G जीजाG,कॉमनवेल्थ और कोयला से अपना मुह काला करते रहे..सेना चीखती रही और तुम अपना बिस्तर गर्म करके जज बनाने में व्यस्त रहे..
● विमानों खरीद में तुमने इतनी घटिया दलाली की राजनीति चली की दलाली न मिलने के कारण 10 साल में विमानों को खरीदने का आर्डर नहीं दे पाये वो तो भला हो नरेंद्र मोदी का जिन्होंने "राफेल डील" को खुद ही फ़्रांस जा के फाइनल करके हताश हो रही एयरफोर्स को नयी हिम्मत दी वरना कांग्रेस का बस चलता तो उड़नताबूत बन चुके आउटडेटेड MIG में ही मरने देती वायुसेना के पायलटों को..यही डील कांग्रेसियों तुमने पहले फाइनल कर दी होती तो आज तक ये विमान हमारे एयरफ़ोर्स के हैंगरों में पहुच चुके होते..
● गलती से कांग्रेस ने हेलीकॉप्टर और सेना के ट्रक खरीद लिए तो उसे "ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला" और "टाट्रा ट्रक घोटाला" नाम से ये देश जानता है..
● अब आते हैं नौसेना की स्थिति पर, याद है न क्या हालात बना दी थी तुम कांग्रेसियों ने 2004 से 2014 तक हादसों की झड़ी लगा दी और नौसेना की शान INS सिंधुरक्षक का खड़े खड़े तबाह हो जाना और 18 नौसैनिकों का मरना वो जख्म है जिसे सिर्फ एक हादसा नहीं माना जा सकता था। नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके जोशी ने तो इस्तीफा दे दिया मगर उसके बाद फिर हादसे का होना ये बताने को पर्याप्त था की 10 सालों में नेविवारशिप का रखरखाव हुआ नहीं या हुआ भी तो बड़ी हथियार दलाल लाबी इसमें सम्बद्ध थी..
● घोटाले और मुफ्तखोरी से तबाह देश का खजाना तुमने मोदी को दिया था जो कोई युद्ध नहीं झेल सकता था। यही कारण है की उस देश के खजाने को भरने के चक्कर में आज मोदी कभी सेस बढ़ाता है तो कभी पेट्रोल डीजल पर वैट बढ़ा के देश को मजबूत करता है और हमारी थोक के भाव गालियां भी सुनता है.
● अब कांग्रेस और वामपंथियों की अवैध राजनैतिक संतति,टोपी वाली नौटंकी गैंग के गुर्गों..तुम लोग तो कांग्रेस से भी गए गुजरे हो तुम्हारी नौटंकी चलती ही है फ्री के वाईफाई, फ्री के बिजली,फ्री के पानी पर तो अगर युद्ध हुआ तो तुम्हे जीत हार से मतलब नहीं होगा तुम्हे मतलब होगा युद्ध के बाद निश्चित बढने वाली महंगाई से.. महंगाई बढ़ गई जी..मोदी ने टैक्स लगा दिया जी..LG हमे काम करने दे रहा जी...ऐंड सो आन नौटंकी आन इट्स पीक..
★★★ अब कुछ मानसिक रूप से अपरिपक्व बच्चे, ये कहेंगे की अब तो मोदी है जो करना है कर लो...तो भाई जहाजो के आर्डर मोदी खुद फ़्रांस में देकर आया है...जहाज का आर्डर दिया है न की पिज्जा का जो दो मीनट में बनकर आधे घंटे में आ जाये, कुछ साल लगेंगे बनाने और डिलिवरी में..सेना का आधुनिकीकरण जारी है.नए आयल रिजर्व अगस्त सितम्बर 2015 से बनने शुरू हो गए..करोडो के हथियारों की खरीद को रक्षामंत्री मनोहर पारिकर ने अप्रूव कर दिया. कांग्रेस की चहेती हथियारों की दलाल लाबी को लात मार के भगा दिया गया है..एक एक सौदे पर PMO की नजर है...Rajnath Singh के विभाग वाले सेना व एयरफोर्स में कांग्रेस के ISI वाले दामादो को रोज पकड़ रहे हैं.आप के पास अरबो रूपये हो तो भी एक मकान बनाने में समय लगता है तो यहाँ तो पूरे रक्षा तंत्र का फिर से जीर्णोद्धार करना है ऐसे तीव्र गति से काम हुआ तो 5 साल में खड़े होने लायक होंगे और कम से कम 10 साल में दौड़ने लायक..और यदि जैसा पहले कांग्रेसी जमाने में था वैसी स्पीड रही तो चीन है ही खड़ा 1962 दोहराने के लिए....
आशुतोष की कलम से