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एक दो नहीं 200 महिलाओं के साथ हुआ बलात्कार, लेकिन.....

ढाका.बांग्लादेश में वर्ष 2001 में संसदीय चुनाव के बाद करीब 200 'अल्पसंख्यक महिलाओं' के साथ बलात्कार किया गया। अल्पसंख्यक परिवारों के साथ ज्यादती की गई, जिससे बड़ी संख्या में वे देश से पलायन को मजबूर हुए।

एक न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। यह रिपोर्ट गृह मंत्री सहरा खातून को सौंपी गई है। इसमें अल्पसंख्यक महिलाओं से बलात्कार और उनके परिवारों के साथ ज्यादती के लिए बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी (बीएनपी) तथा इसकी सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष सदस्यों तथा सांसदों का नाम लिया गया है, जिसने 2001 का चुनाव जीता था।

चुनाव बाद बेगम खालिदा जिया बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी थीं और वर्ष 2001-06 तक उनकी सरकार रही।समाचार पत्र 'डेली स्टार' ने मंगलवार को प्रकाशित अपने अंक में आयोग के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि हिंसा 15 माह तक जारी रही और "इस असभ्य कृत्य का मकसद उन्हें देश छोड़ने के लिए बाध्य करना था। अवामी लीग के पक्ष में मतदान करने के कारण दोषियों की नजर में वे शत्रु बन गए थे।"

आयोग की रिपोर्ट में हत्या, बलात्कार, आगजनी और लूट की 3,625 घटनाओं का जिक्र किया गया है। इसमें हालांकि बलात्कार पीड़िताओं का उल्लेख 'अल्पसंख्यक महिलाओं' के रूप में किया गया है, लेकिन मीडिया में उन्हें हिन्दुओं के रूप में लिखा गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उस वक्त सैकड़ों हिन्दू परिवार बांग्लादेश से निकलकर भारत चले गए थे, जिस पर भारत सरकार ने चिंता जताई थी।आयोग के सदस्यों ने पीड़ितों और उनके परिवार के सदस्यों से पूछताछ की, जिसमें उन्होंने डरावने अनुभव सुनाए। आयोग के अनुसार बलात्कार के आरोपों की जांच जारी रखना मुश्किल है, क्योंकि बहुत से पीड़ित कानूनी लड़ाई लड़ना नहीं चाहते।

मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत से आरोपियों को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया, जबकि कई अब सत्तारूढ़ अवामी लीग से जुड़ गए हैं और इसलिए पुलिस ने उनके खिलाफ मामले की जांच रोक दी है।

 

8 टिप्‍पणियां:

chooti baat ने कहा…

ab salim khan kya kahege islam ke bare me

हरीश सिंह ने कहा…

यह कौन सी नई बात है जनाब, सभी मुस्लिम देशो में अल्पसंख्यको के साथ अत्याचार होता है. जब अपने देश कश्मीर में ही हम सुरक्षित नहीं है तो अन्य देशो की क्या कहें. एक ढांचा गिराए जाने पर अभी तक बवाल हो रहा है. पर उसके बदले कितने मंदिर धरासाई कर दिए गए. पाकिस्तान में बम लगाकर मंदिर गिराई गयी, बंगलादेश में खुले आम हिन्दू महिलाओ को बीच सड़क पर नंगी कर इज्ज़त लूटी गयी, आज तक कोई बोला, हमारे सेकुलर नेता अभी तक मुस्लिमो के घाव पर मरहम ही रख रहे हैं. पर इसके लिए हम सभी मुस्लिमो को दोष नहीं दे सकते.

कौशलेन्द्र ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने हरीश भाई ! सभी मुसलमानों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. किन्तु निर्दोष मुसलमानों को तस्लीमा नसरीन की तरह अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हो रहे इन अमानवीय अत्याचारों का खुल कर विरोध करना चाहिए था. इसका विरोध तो भारतीय मुसलमानों को भी करना चाहिए ...यदि ऐसा होता तो निश्चित ही हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच भाईचारा बढ़ता. निर्दोष मुसलमानों का मौन रहना किस बात का प्रतीक है ? भारत या बांग्ला देश में कितने लोगों ने तस्लीमा जी का अनुसरण करने का साहस किया है ? मुझे याद आ रहा है ......कभी ....शायद वाराणसी में किसी मसले पर मुसलमानों ने जुलूस निकाल कर अपना विरोध मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ किया था उस समय हिन्दुओं के दिल उनके लिए खुली चौपाल की तरह खुल गए थे.

हरीश सिंह ने कहा…

कौशलेन्द्र जी मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हू, हिन्दू-मुसलमानों के बीच लोग भले ही भाईचारे की बात करें. लेकिन उनके दिलो में में कितना प्रेम एक दूसरे के प्रति है. इससे सभी वाकिफ हैं. यही कमी सिर्फ मुसलमानों की नहीं हिन्दुओ की है. हमारे मान में एक दूसरे के प्रति करने के लिए सवाल बहुत हैं. और यही सवाल लोग करना नहीं चाहते. जब तक हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के उअपर आरोप लगते रहेंगे. तब तक विवाद ख़त्म नहीं होगा. राजनीती ने जब हिन्दू को कई जातियों में विभक्त कर दिया और हम तो हिन्दू मुसलमान हैं. हम पूरे भारत को न हिन्दू बना सकते हैं और न ही मुसलमान. जब हमें रहना यही है तो दिलो को साफ करने के लिए सवाल करें. उस पर बहस करें. ताकि वह बुराइयाँ ख़त्म हों. यदि हम इस्लाम को बुरा कहेंगे तो सारे मुसलमानों के ऊपर अंगुली उठेगी, और उसमे वीर अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम जैसे मुसलमान हैं. बाबर की संस्कृति और लादेन की संस्कृति हमें पसंद नहीं है. भारत का मुसलमान भी यह समझौता करे की हमें राष्ट्रीय झंडे पर चाँद-सितारा नहीं. हमेशा तिरंगा चाहिए. हमें पाकिस्तान नहीं अपना भारत चाहिए. इसकी मिटटी ही हमारी जन्मभूमि,कर्मभूमि और मातृभूमि है. वह जज्बा होना चाहिए जो एक इंसानियत की होनी चाहिए. जो इंसानियत की हत्या सिखाये वह आयत या मन्त्र हमें भूल जाना चाहिए..... हमें जिद छोडनी होगी. और बात करनी होगी,. बंगलादेश पाकिस्तान के मुसलमानों की तोलना हम भारतीय मुसलमानों से न करें और मुसलमानों को चाहिए की वे कश्मीर जैसे मुद्दे का विरोध करे. जब मुसलमान बार-बार गुजरात की बात करता है और कश्मीर के दर्द को भूल जाता है तो उस मुसलमान से मुझे भी घृणा होती है. जो मुसलमान हिन्दुस्तान का तिरंगा जलाये. चाँद सितारे की बात करे और हिन्दुओ के पर्व पर पाबन्दी लगाने की बात करे वह मुसलमान हमें भी पसंद नहीं.
बहुत सी बात है चर्चा जारी रही तो अवश्य करूँगा पर. सौम्य शब्दों में.. हमें तो लगता है यहाँ सभी को आना चाहिए..,

Abhishek ने कहा…

@हरीश जी.
आप के साथ प्रॉब्लम यही है आप मुस्लिम को नसीहत देते देते हिन्दुओ की कमिय दिखाना शुरू कर देते है. आप ही बताईये की अगर गोधरा कांड ना होता हो क्या गुजरात दंगे होते. बाबर मंदिर नहीं तोड़ता तो क्या बाबरी मस्जिद तोड़ी जाती. सदियों से हिन्दुओ को ही सेक्युलर होने और सारे मुस्लिमो को दोष ना देने का पाठ पढाया जा रहा है. और आज भी आप जैसे लोग समस्या का मूल नहीं देखते और हिन्दुओ को सीख देने लगते है की हिन्दुओ को भी अपनी कमिया दूर करनी चाहिए. मैं भी मानता हूँ आज का हिन्दू भी कठमुल्लों के सामने कट्टरता दिखने लगा है तो इसमे गलत क्या है अगर मुस्लिम सदियों में भी अपनी कट्टरता नहीं छोड़ सकते तो हिन्दुओ को सीख देना कहा तक जायज है. हिन्दू कभी भी कट्टर नहीं था इसी का सबूत है की आज इंडिया में इतने मुस्लिम / ईसाई है. किन्तु अब हद्द हो चुकी है इनकी कट्टरता की, और कट्टरता का जवाब कट्टरता से ही देना पड़ेगा. इसका सबसे अच्छा उदाहरण गुजरात को ही कहा जा सकता है जहा एक बार हिन्दुओ ने मुस्लिम को उनकी भांषा में जवाब दिया और आज देखिये वहा कितनी प्रोग्रेस है. लास्ट १० साल से ना कोई दंगा हुआ है और ना ही कोई गोधरा जैसा कांड. वही कशमीर में आये दिन कुछ ना कुछ होता रहता है.

कौशलेन्द्र ने कहा…

@ हमारे मन में एक दूसरे के प्रति करने के लिए सवाल बहुत हैं. और यही सवाल लोग करना नहीं चाहते. जब तक हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के ऊपर आरोप लगाते रहेंगे. तब तक विवाद ख़त्म नहीं होगा.
हरीश जी ! शंका समाधान के लिए प्रश्नोत्तर और एक स्वस्थ्य संभाषा होनी ही चाहए जहाँ सुलझे हुए और शांत-गंभीर बुद्धि के लोग जुट सकें. मुझे लगता है कि हमें संयोग से यह अवसर हल्ला बोल के सूत्रधार जी ने उपलब्ध करवा दिया है. हमें इसका संतुलित उपयोग पूरी इमानदारी के साथ करना चाहिए. आपका कहना सत्य है कि हमारे हृदयों में कुछ ऐसा तो है जो होना नहीं चाहिए.अभी दो बातें हैं - प्रथम ...क्या भारत के लिए इस्लाम स्वीकार्य है ?...द्वितीय .....क्या मुसलमानों को स्वीकारना हमारी विवशता है ? ...देखिये , मैं बड़ी ही इमानदारी से किन्तु चुभने वाले प्रश्न उपस्थित कर रहा हूँ क्योंकि मैं सफाई वाले की भूमिका में हूँ अभी. इन प्रश्नों का उत्तर हर सनातनधर्मी को अपने अन्दर टटोलना है. पूरे वैश्विक परिदृश्य में इस्लाम के नाम पर मुस्लिमों ने जो आतंक फैलाया हुआ है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. धर्म के नाम पर दंड देने की ठेकेदारी असहनीय है. हम सच्चा इस्लामिक उसे मानते हैं जो दांडिक फतवों और आतंक का सक्रिय विरोध करे. मुसलमान यदि आगे आते हैं इस कार्य के लिए तो फिर दुनिया देखेगी कि सनातनधर्मी उनके लिए क्या नहीं करेंगे ! आतंरिक विरोध समाप्त करने का यह एक उचित और सरल तरीका मेरी समझ में आ रहा है. किन्तु यदि ऐसा नहीं होता तो यह समझा जाएगा कि सभी मुसलामानों की मौन सहमति है इस आतंकवाद में.
आयतों की बात मुझे नहीं मालुम पर मन्त्र तो ऐसा कोई नहीं है जिसे भूलने की नौबत आये. सारे मन्त्र रचनात्मक हैं ...सृष्टि की उपासना के लिए हैं ....प्रकृति की आदि शक्तियों की स्तुति के लिए हैं ...इसलिए आयतों के साथ मंत्र के उल्लेख का तालमेल कुछ समझ में नहीं आया. अभी ब्रिटेन में होने वाली शाही शादी में दहशत फैलाने के लिए किसी बड़े काण्ड की घोषणा की जा चुकी है ...यह सब यदि इस्लाम के नाम पर हो रहा है तो यह सभी धर्मों के अस्तित्व को खुली चुनौती है. पूरे विश्व को इस तानाशाही के विरुद्ध एक जुट होकर खड़े हो जाने की आवश्यकता है.
@ कट्टरता का जवाब कट्टरता से ही देना पड़ेगा. इसका सबसे अच्छा उदाहरण गुजरात को ही कहा जा सकता है जहाँ एक बार हिन्दुओ ने मुस्लिमों को उनकी भांषा में जवाब दिया.........
अभिषेक जी ! आपकी कुछ बातों से मैं सहमत हूँ पर इस बात से बिलकुल नहीं. गुजरात में मुसलमानों की प्रगति होने और दंगा न होने का कारण हिंसक जवाब नहीं बल्कि मोदी जी का कुशल प्रशासन है. दंगे किसी समस्या के समाधान नहीं हो सकते. संगीनों के साए में होने वाली शान्ति को आप शांति नहीं कह सकते.

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

समस्या की सटीक निशानदेही!! साधुवाद!!

"धर्म के नाम पर दंड देने की ठेकेदारी असहनीय है. हम सच्चा इस्लामिक उसे मानते हैं जो दांडिक फतवों और आतंक का सक्रिय विरोध करे.………किन्तु यदि ऐसा नहीं होता तो यह समझा जाएगा कि सभी मुसलामानों की मौन सहमति है इस आतंकवाद में."

हरीश साहब,

हिन्दुओं का एक मन्त्र ऐसा नहीं है, जो दिलों में अनावश्यक नफरत पैदा करे। और शान्ति की यही शर्त है तो हम 'वसुधैव कुटम्बकम्' वाला मन्त्र भूलने को तैयार है। क्या मुसलमान जेहाद वाली आयत को छोडनें को तैयार है? यदि वह छोडे तो हम उन्हें समन्वयवादी स्वीकार करने में तैयार है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अरे इतनी बेरहमी, नृशंसता..