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सीता का निर्वासन....डा श्याम गुप्त

रात सपने में श्री राम आये,
अपनी मोहक मुद्रा में मुस्कुराये, बोले-
वत्स, प्रसन्न हूँ, वर मांगो |
मैंने कहा, प्रभु !
कलयुगी तार्किक भक्त हूँ,
शंका रूपी एक गुत्थी सुलझादो|

राम ! तुम्ही थे, जिसने-
समाज द्वारा ठुकराई हुई,
छले जाने पर किंकर्तव्य विमूढ़ ,
ठुकराए जाने पर-
संवेदनहीन , साधन हीन, परित्यक्ता,
पत्थर की शिला की तरह-
कठोर,क्रियाहीन,निश्चेष्ट ,कर्तव्यच्युत ,
समाज विरोधी, एकाकी, जड़ -
अहल्या को;
चरणकमलों में स्थान देकर,
समाजसेवा का पाठ पढ़ाकर,
मुख्यधारा में प्रतिष्ठापित किया था |

शबरी के बेर, प्रेम भाव से खाकर ,
नारी व शूद्र-उत्थान के पुरोधा बनकर,
तत्कालीन समाज में, उनके-
नए आयामों को परिभाषित किया था |

फिर क्या हुआ हे राम ! कि-
सिर्फ शंका मात्र से ही , तुमने-
सीता का निर्वासन कर दिया ?

राम बोले, वत्स अच्छा प्रश्न उठाया है ;
सदियों से शंकाओं की शूली पर टंगा हुआ था ,
आज उतरने का अवसर आया है |

आखिर शंका ने ही तो तुम्हें,
समाधान को उकसाया है |
तुमने भी तो, शंका का समाधान ही चाहा है |
शंका उठी है तो -
समाधान होना ही चाहिए;
समाधान के लिए सिर्फ बातें ही नहीं,
उदाहरण भी चाहिए |

अहल्या व शबरी-
सारे समाज की आशंकाएं हैं ;
जबकि, सीता राम की व्यक्तिगत शंका है |
व्यक्ति से समाज बड़ा होता है ,
इसीलिये तो सीता का निर्वासन होता है |

स्वयं पुरुष का निर्वासन-
कर्तव्य विमुखता व कायरता कहलाता है ;
अतः कायर की पत्नी -
कहलाने की अपेक्षा ,
सीता को निर्वासन ही भाता है ||

16 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

राम ! तुम्ही थे, जिसने-
समाज द्वारा ठुकराई हुई,
छले जाने पर किंकर्तव्य विमूढ़ ,
ठुकराए जाने पर-
संवेदनहीन , साधन हीन, परित्यक्ता,
पत्थर की शिला की तरह-
कठोर,क्रियाहीन,निश्चेष्ट ,कर्तव्यच्युत ,
समाज विरोधी, एकाकी, जड़ -
अहल्या को;
चरणकमलों में स्थान देकर,
समाजसेवा का पाठ पढ़ाकर,
मुख्यधारा में प्रतिष्ठापित किया था |

एक एक पंक्ति भावयुक्त!!

हरीश सिंह ने कहा…

अहल्या व शबरी-
सारे समाज की आशंकाएं हैं ;
जबकि, सीता राम की व्यक्तिगत शंका है |
व्यक्ति से समाज बड़ा होता है ,
इसीलिये तो सीता का निर्वासन होता है |
-------------------------
बहुत सुन्दर रचना गुप्ता जी, समाज के लिए अपनों का त्याग करना ही पड़ता है, प्रभु राम की जीवन शैली ही सम्पूर्ण आदर्श है.

एम सिंह ने कहा…

शानदार लिखा है. बधाई
मेरे ब्लॉग पर आयें और अपनी कीमती राय देकर उत्साह बढ़ाएं
समझो : अल्लाह वालो, राम वालो

संजय भास्कर ने कहा…

शानदार लिखा है. बधाई

abhishek1502 ने कहा…

vaaah
bahut hi sundar rachna
jai shri raam

आशुतोष ने कहा…

सबको जबाब दे दिया आपने ..
बहुत सुन्दर रचना...आभार

abhishek1502 ने कहा…

sugya ji ka dhanyavaad jinho ne mujhe ye link diya

बेनामी ने कहा…

हल्ला बोल जी
आदरणीय सुग्य जी और अभिषेक जी को भी आमंत्रित कीजिये इस ब्लाग का सदस्य बनने के लिये.
और हिँदुत्व को मजबूत कीजिये.

drshyam ने कहा…

धन्यवाद हरीश जी, सुग्य जी,सन्जय, अभिषेक, आसुतोष, एम सिन्ह एवं बेनामी जी.... जै श्री राम....

सुज्ञ ने कहा…

मित्रों से निवेदन है, मुझे लेखन के लिये समय नहीं मिल पाता। इस मंच को मेरा समर्थन है। मैं स्पष्ठता से मानता हूँ हमें हमारी संस्कृति की सुरक्षा करनी ही होगी। कई कुसंस्कृतियों का वैचारिक आकृमण है आज भारतीय संस्कृति पर। ऐसी कुसंस्कृतियां कभी रहन-सहन की स्वतंत्रता का लोभ देती है तो कभी मांसाहार प्रसार का घ्रणित निवेदन। कभी सरल धर्म-पालन की सुविधा का प्रलोभन देती है तो कभी भाईचारा व मानव समानता के नाम पर हमें उच्च सभ्यता से गिराकर अपने समकक्ष खडा देखना चाहती है।

इसलिये हिन्दुत्व (भारतीय सुसंस्कृत जीवन शैली) और जीवन मूल्यों के संरक्षण के लिये अनावश्यक सौहार्द के नशे को त्याग कर वैचारिक संघर्ष करना ही होगा।

इसलिये मैं आपके साथ हूँ, टिप्पणियों के माध्यम से मै अपने विचार प्रकट करता रहुंगा।

गंगाधर ने कहा…

धर्म और समाज को बचने के लिए कभी-कभी अपनों का परित्याग करना पड़ता है. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

poonam singh ने कहा…

स्वयं पुरुष का निर्वासन-
कर्तव्य विमुखता व कायरता कहलाता है ;
अतः कायर की पत्नी -
कहलाने की अपेक्षा ,
सीता को निर्वासन ही भाता है ||
------------
bahut sundar pankti

नेहा भाटिया ने कहा…

धर्म और समाज को बचने के लिए कभी-कभी अपनों का परित्याग करना पड़ता है. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

कौशलेन्द्र ने कहा…

डॉक्टर साहब ! जय श्रीराम ! सत्ताधारी के लिए व्यक्ति नहीं समाज प्रमुख होता है यह राम ने कहा नहीं बल्कि करके दिखाया ....काश! आज के नेता श्रीराम से कुछ सबक लेते जो समाज और राष्ट्र की अपेक्षा व्यक्ति और परिवार को प्रमुख मान अपना घर भरने में लगे हुए हैं. डॉक्टर साहब ! आपने अपनी रचना में शंका का सशक्त तरीके से समाधान किया है. छत्तीसगढ़ में एक मुस्लिम भाई हैं ....पक्के नमाजी ......पर राम के दीवाने ...इतने की मुस्लिम समाज के हर विरोध के बाद भी उन्होंने मंच पर राम कथा कहना नहीं छोड़ा. वे राम कथा वाचक हैं ....क्योंकि वे राम को अपना पूर्वज मानते हैं और उनके आदर्शों को पुनः स्थापित किये जाने की आवश्यकता का तीव्र अनुभव करते हैं. छत्तीसगढ़ को गर्व है ऐसे मुस्लिमों पर. किसी विदेशी को अपना आदर्श मानने की अपेक्षा अपने देश की धरती में जन्मे राम-कृष्ण-महावीर-बुद्ध और नानक को अपना आदर्श मानना ही उचित और प्रासंगिक है. मुस्लिम राम-कथावाचक ने यह सन्देश सभी भारतीय मुस्लिमों को अपने आचरण के माध्यम से दे दिया है.

स्वाती गुप्ता ♥ श्री राधे ♥ ने कहा…

..•♥•.श्री राम !!.•♥•.
राम ! तुम्ही थे, जिसने-

अहल्या को;
चरणकमलों में स्थान देकर,
समाजसेवा का पाठ पढ़ाकर,
मुख्यधारा में प्रतिष्ठापित किया था |
स्वयं पुरुष का निर्वासन-
कर्तव्य विमुखता व कायरता कहलाता है ;
अतः कायर की पत्नी -
कहलाने की अपेक्षा ,
सीता को निर्वासन ही भाता है ||

आपकी की रचना बहुत ही सुनदर ही और बहुत कुछ कहती भी ही धन्यवाद for share with us :) shri ram !!
shri radhe!!

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद..गन्गाधर जी....
---पूनम सिन्ह जी,स्वाती जी व नेहा जी को विशेष धन्यवाद,... सीता के ( व सीता-निर्वासन के )बारे में महिला-शक्ति का मत महत्व पूर्ण है...राधे-राधे...सीत सीता...

---धन्यवाद कौशलेन्द्र जी..एक राम-नामी मुस्लिम भाई से परिचय कराने के लिये...इन्हीं के लिये कहा गया...इन मुसलमान हरिज़नन पै कोटिक हिन्दू वारिये....