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प्रथम चर्चा

पहले अपना परिचय दे दूँ......एक  सनातनधर्मी भारतीय हूँ, देश की व्यवस्था से व्यथित और समाज के पतन से चिंतित. धर्म के विषय में क्रांतिकारी विचार हैं जो कदाचित परम्परावादियों के लिए अरुचिकर हों. अब इस ब्लॉग पर बुलाया गया है तो अस्वीकार करना उचित नहीं लगा......आ गया हूँ तो पहले सफाई अभियान में जुट जाना चाहता हूँ ....धुल उड़ेगी .....नाक से होते हुए मेरे ही फेफड़ों में सबसे अधिक जायेगी तो स्पष्ट है कि सर्वाधिक क्षति भी मुझे ही होगी. किन्तु सदियों से जमी धूल को साफ़ करने किसी को तो आगे आना होगा ...तो फिलहाल मैं एक सफायीवाले की भूमिका में हूँ.
     व्यावहारिक बात यह है कि लोग पहले घर के अन्दर की सफाई करते हैं और फिर बाहर की. आभ्यंतर और बाह्य स्वच्छता अभियान के क्रम में हमें अपने ऊपर लादी गयी बहुत सी वंचनाओं को भी हटाना होगा, फिर अपना परिमार्जन करना होगा ...इसके बाद बाह्य स्वच्छता में धर्म के विद्रूपों, भारतीय परिवेश में धर्म का स्वरूप, आयातित धर्मों का भारतीय परिवेश में औचित्य आदि विषयों पर मंथन और आन्दोलन का प्रयास किया जाएगा. 
      भारत के लोग यदि यह अनुभव करते हैं कि कुछ भी ठीक नहीं चल रहा ..और किसी बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है तो इसके लिए एक रणनीति बनानी होगी, यूँ ही कहीं भी घात-प्रतिघात से कोई सफल क्रान्ति नहीं की जा सकती.
      मैं आप सबसे एक बात जानना चाहता हूँ, भाषा से लेकर संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्म तक के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी श्रेष्ठता के बाद भी हमें हजारों वर्षों की पराधीनता क्यों झेलनी पडी ? मध्य एशिया एवं उत्तर-पूर्वी एशिया के आततायी विदेशी आक्रमणकारियों को इसके लिए उत्तरदायी ठहराना बड़ा सरल है. किन्तु मैं बड़े ही स्पष्ट और विनम्र शब्दों में कहना चाहता हूँ कि दूसरों को दोष देने से हम स्वयं के दोषों को पहचानने में भारी त्रुटि कर बैठते हैं. परिणाम होता है एक लंबा उलझाव. हमें अपने ही दोषों को पहचान कर उनका परिहार करना होगा.  मार्गावारोध तभी दूर हो सकेगा. तो आज और अधिक नहीं बस .....आज की विनम्र प्रस्तुति माँ भारती के श्री चरणों में सादर समर्पित-

सजने से पहले टूट कर सपने बिखर गए  /
आज़ाद  है ये  देश फिर भी लोग मर गए //
देव-दैत्य , सुर-असुर  थे  कब  यहाँ  नहीं / 
जय बिना संग्राम के मिल पाती है नहीं //
प्रतीक्षा हम अवतार की क्यों जाने कर रहे /
हैं शक्ति से संपन्न फिर भी बेबस ही रहे //
गुणगान ही अतीत का हम करते रह गए /
और विश्व दौड़ में प्रथम ये म्लेच्छ  आ गए //

हम आर्य हैं महान हैं इस भ्रम में जी रहे /
जाने किस व्यामोह में मोहित बने हुए //  
कर्म योग गीता का हम पा नहीं सके /
बस आत्म मुग्धता में हम खोये रह गए //
गद्दारियों से है भरा अतीत कम नहीं /
देश को ही बेचने में शर्म भी नहीं //
विश्वास अपने रक्त का ही तोड़ते रहे /
हम रूस या अमेरिका को ताकते रहे //
जो डर गया वो पीढ़ियों को दास कर गया /
भिड़ गया जो रण में वो ही ताज पा गया //
हम दासता में  उनकी जी के खुश बने रहे /
क्या है स्वाभिमान यह तो भूल ही गए //
आतंक के हों दंश या संकट हो कोई भी /
सदियों से सहते-सहते हम अभ्यस्त हो गए //
जी लिया विदेशियों ने ज्ञान वेद का /
सार पा लिया उन्होंने कर्म योग का //
वे देखते ही देखते सिरमौर बन गए /
हम वेद पाठ करके जाने कबके सो गए //


अवतार लेगा कोई इसकी राह छोड़ दो /
बनके भगीरथ खुद ही ये बाधाएं तोड़ दो //
संकटों की बाढ़ की हर धार मोड़ दो /
पल-पल जो बोले झूठ वो जिव्हा मरोड़ दो //
आतंक जिनका धर्म है मुंह उनका तोड़ दो /
कुछ काली की माला में भी नर-मुंड जोड़ दो //
जिन दीपकों से घर जले उनको बुझाना है /
रोशन करे जो घर वही दीपक जलाना है //
राणा-शिवा जैसा वही जौहर दिखाना है /
जग में हमें फिर से वही सम्मान पाना है //
अभी तो राम-कृष्ण-आज़ाद-बोस का काम बाकी है /
जो क़र्ज़ चुका दे धरती का वह दाम बाकी है //
मरते नहीं वे लोग जो कुछ ऐसा कर गए /
मरने से पहले देश के कुछ काम आ गए //




20 टिप्‍पणियां:

Kunal Verma ने कहा…

वाह दोस्त

Kunal Verma ने कहा…

आइए हमारे साथ एक नये युग की ओर।अगर आप नहीँ आओगे तो हमेँ लगेगा भारत के लोग बिक चुके हैँ।
http://bloggers-adda.blogspot.com

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

isi tarah jaagrat hona padega.. aajadi ke baad se hi jo galtiyan ham logon ne ki hain unhe sudharna padega...

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

यह प्रश्न बार बार उठाया जाता है कि “हम दो हजार साल तक गुलाम क्यों रहे ?”
मैने अधिकांश मामलो में पाया कि यह कुटिल उलहाना होता है हिदु संस्कृति को हतोत्साहित करने के लिये। अथवा फिर हीनबोध महसुस करवाने के लिये।
जबकि वास्त्विकता इससे अलग है। आर्य संस्कृति को आर्य-पद उसके सर्वोच्छ सभ्य संस्कार छू लेने के कारण मिला था। आर्य का अर्थ ही होता है श्रेष्ठ-सुसंस्कृत-सभ्य।
इस संस्कृति नें महान युद्ध लडे, देव-दानव, महाभारत से लेकर कलिंग तक। उसका इतिहास भी आलेखित किया और हर युद्ध के अन्त में यह रेखांकित किया कि युद्ध का अंत हमेशा मानवता के सर्वनाश पर ही होता। आर्य संस्कृति इस सच को स्थापित कर, कभी की आदिम जंगली व्यवहार से शान्त-सभ्यता में परिवर्तित हो चुकी थी। उसका लक्ष्य था शान्त सुखप्रद जीवन। उसे कहां पता था वह अन्दरूनी आक्रमकता तो खत्म कर सकती है किन्तु बाहर से जंगली आक्रमण खोर चढ आये तो सभ्यता और शान्ति को भंग कर सकते है। और यही हुआ। इसीलिये राजनैतिक सत्ता आततायियों के हाथ चली गई, पर सभ्य व्यवहार को पुनः जंगली बनने से बचा लिया।
दुविधा तब भी थी, दुविधा आज भी है। आक्रमण खोर शक्ति या श्रेष्ठ सांस्कृतिक सभ्यता। जबकि अब तो पूरा विश्व युद्धोन्माद से बाहर आ रहा है। सिवाय आतंकवाद की कबीलाई म’कार मानसिकता के।

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

बहुत ही ओजपूर्ण वीर-रस धारा है। अभिनन्दन!!

अवतार लेगा कोई इसकी राह छोड़ दो।
बनके भगीरथ खुद ही ये बाधाएं तोड़ दो।
संकटों की बाढ़ की हर धार मोड़ दो।
पल-पल जो बोले झूठ वो जिव्हा मरोड़ दो॥
आतंक जिनका धर्म है मुंह उनका तोड़ दो।
कुछ काली की माला में भी नर-मुंड जोड़ दो॥
जिन दीपकों से घर जले उनको बुझाना है। /
रोशन करे जो घर वही दीपक जलाना है।
राणा-शिवा जैसा वही जौहर दिखाना है॥

साधुवाद!!

कौशलेन्द्र ने कहा…

सुज्ञ जी ! आपका आना अच्छा लगता है ...आपके विचार सुलझे हुए हैं किन्तु यहाँ मैं किंचित कम सहमत हूँ आपसे. हम अपने आदर्शों के कारण पराधीन रहे यह बात समझ में नहीं आती. यह वही आर्यपुत्रों का समाज है जिसने त्रेता में राम और सीता को नहीं बख्शा ...फिर द्वापर में मथुरा से कृष्ण को भागने पर विवश कर दिया.....गुजरात के एक समुद्री टापू पर उन्हें अपना झंडा गाड़ना पडा. बुद्ध के जीवन काल में उनकी ह्त्या के प्रयास किये गए. .......
यह सच है कि हर बड़े युद्ध के बाद शान्ति की आवश्यकता का अनुभव किया गया और युद्ध करने वालों ने ही युद्ध का विरोध किया. किन्तु युद्ध होना अधिक समय तक रुका नहीं. अवध-लंका युद्ध के बाद महाभारत युद्ध और फिर कलिंग युद्ध ...........और फिर .....और भी अनेकों देशी युद्धों की लम्बी सूची के बाद भी युद्ध आज तक रुक नहीं सके हैं. मैं युद्धों का समर्थक नहीं हूँ....आप भी नहीं हैं और भी बहुत से लोग हैं जो युद्ध को अच्छा नहीं मानते. पर ध्यान रखें अर्जुन और कृष्ण भी युद्ध नहीं चाहते थे .....नहीं चाहते थे ......पर उन्हें विवश होना पडा युद्ध के लिए. चन्द्रगुप्त को इसी धरती पर सिकंदर के साथ लड़ना पडा. यवनों को रोकने के लिए उनके युद्ध के निर्णय को गलत नहीं ठहराया जा सकता. इसके बाद देशी राजाओं के आपसी संघर्षों और राज्यों की अक्षमता ने अरबों को आमंत्रित किया, जयचंद ने पृथ्वीराज से लगी बुझाने के लिए गोरी को आमंत्रित किया .....फिर मुस्लिम शासन का एक लंबा दौर चला ......वह भी युद्धों के साथ. भारतीय देशी राजाओं की अक्षमता, आपसी युद्ध, और विश्वासघातों ने यूरोपियों को यहाँ आने का अवसर दिया, ब्रिटिश लोग अन्य यूरोपियों की अपेक्षा अधिक धूर्त थे उनकी धूर्तता में हमारा सहयोग भी कुछ कम नहीं था. फिर अब स्वतन्त्र भारत में भ्रष्टाचार के लिए हम किसको दोषी ठहराएं ?

कौशलेन्द्र ने कहा…

...........पुनश्च,यह भी सही है कि हमने कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की ..युद्ध सदा ही हम पर थोपे गए ..और इस मामले में सचमुच हम भारतीय गर्व का अनुभव करते हैं .
अर्जुन ने तर्क दिया था कि अन्याय युद्ध को और युद्ध हिंसा, आर्थिक क्षति, चारित्रिक पतन और वर्णशंकर संतानों को जन्म देने का कारण बनता है. तो भी कृष्ण ने युद्ध की अपरिहार्यता के बारे में अपने तर्कों से अर्जुन को मना लिया था. परमाण्वीय शक्तियों के विनाशकारी परिणामों की झलक पा लेने के बाद पूरी दुनिया डरी हुयी है युद्धों से. यह शान्ति वैसी ही है जैसी कर्फ्यू के समय होती है या इमरजेंसी शासन के समय होती है. हम इसे शान्ति नहीं कह सकते. अवसर मिलते ही यह शान्ति युद्ध में बदल जायेगी. दूसरी बात यह कि सभ्यता का चरमोत्कर्ष उसके विनाश में निहित होता है. अभी तालिबान ने धमकी दे दी है कि यदि लादेन के विरुद्ध कोई कदम उठाया गया तो वह परमाण्विक शक्ति से पूरे विश्व को तबाह कर देगा. कहाँ से मिली उसे यह शक्ति ? उच्च भौतिक शक्तियों पर आज किसका नियंत्रण है ? क्या हमारा विज्ञान या अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ भस्मासुरों को रोक पाने में सक्षम है ? भस्मासुर को तो भस्म ही करना पडा था न !
आर्यों के उत्तराधिकारियों को हीन भावना का बोध कराना मेरा कदापि उद्देश्य नहीं है किन्तु जिस प्रकार से "शरीरं व्याधि मन्दिरम्" उसी प्रकार से "इदं जगतम् विकार मन्दिरम् अस्ति" . और विकारों के परिहार की व्यवस्था में क्रमशः - रोकथाम, सदाचरण, आचरण में सुधार, न्याय और अंत में दंड या शल्य चिकित्सा का प्रावधान शास्त्र सम्मत एवं वैज्ञानिक है.सतयुग में सदाचरण, द्वापर में आचरण में सुधार, त्रेता में न्याय और कलियुग में दंड या शल्य चिकित्सा द्वारा शारीरिक-मानसिक एवं सामाजिक व्याधियों की चिकित्सा की जानी चाहिए . शल्य चिकित्सा में अंग भंग या छेदन (Excision )किया जाता है ......आसुरी चिकित्सा होते हुए भी प्राण रक्षा के लिए यह स्वीकार्य एवं अपरिहार्य है. डायबिटिक गैंग्रीन में प्राण को बचाने के लिए पैर को एम्पुटेट करना ही पड़ेगा. यह युद्ध की वकालत नहीं है युद्ध की विवशता है.
तो विकार का सही निदान करना पड़ेगा. शल्य कर्म कहाँ किया जाय ...यह सुनिश्चित करना होगा. इस निदान प्रक्रिया में गैस्ट्रोइंडोस्कोपी जैसी पीड़ायुक्त प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ सकता है इसलिए इसे आप यह नहीं कह सकते कि हमारा अवमूल्यन किया जा रहा है या हमारे स्वाभिमान पर चोट की जा रही है या कि हमें हीनभावना से ग्रस्त करने का प्रयास किया जा रहा है.
विधर्मियों के आतंक से लड़ने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग कर उसे मारने की अपेक्षा स्वयं में रोगप्रतिरोध क्षमता उत्पन्न करना अधिक आवश्यक है इसलिए मैं इस ब्लॉग का नाम "हल्ला बोल" की अपेक्षा "उठो-जागो और लक्ष्य की ओर आगे बढ़ो" रखने के पक्ष में हूँ .

सुज्ञ जी ! कृपया इसे पुनः पढ़ें -"आर्य संस्कृति इस सच को स्थापित कर, कभी की आदिम जंगली व्यवहार से शान्त-सभ्यता में परिवर्तित हो चुकी थी।"

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

मैं आपके मंतव्य से सहमत हूँ, पर मैं श्रेष्ठ सोच के विकृत या कायरता परिगणित किये जाने के खिलाफ हूँ। बहुत बडे कर्मठ त्याग के बाद ही वह उच्च दशा प्राप्त होती है। मैं मानता हूँ प्रतिशोध संस्कृति सहज सरल है। श्रम तो शान्त सभ्य बननें में लगता है।

इस लिये उस गुलामी के दिनों को बस यह कहकर…बीती ताही बिसार के आगे की सुध लेहि…॥

जैसा कि आप भी मानते है कि हमने सभ्यता का चरमोत्कर्ष पा लिया था, और आप भी कहते है "बात यह कि सभ्यता का चरमोत्कर्ष उसके विनाश में निहित होता है. " बस यह मानो की हमने सभ्यता संस्कृति के चरमोत्कर्ष का मूल्य चुकाया था बिना विनाश के।

यही बात मेरी उन अन्तिम पंक्तियों में ध्वनित है।

पर मेरा कही भी यह आशय नहीं है कि अब स्वरक्षा या प्रतिरोध क्षमता के उपाय न किये जाय। बिना अपराधबोध के वे सब उपाय किये जाने चाहिए जिन्हे आपने अपने विचारों में प्रकट किए है।

सुज्ञ: ईश्वर डराता है।

आशुतोष ने कहा…

कौशलेन्द्र भाई..
हमें सेकुलर चोला हटा सफाई तो करनी ही पड़ेगी .अच्छा है आप ने शुरुवात कर दी..
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ..
या तो तू युद्धमें मारा जाकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथवा संग्राममें जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा । इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिए कृतनिश्चयी होकर खडा हो जा ..

हमे अपने आदर्शों को याद कर जरुरत पड़े तो सशत्र भी उठान पड़ेगा..

बहुत सुन्दर आलेख बहुत सुन्दर प्रयास..

आभार .....

कौशलेन्द्र ने कहा…

सुज्ञ जी ! हमारी आपकी जमेगी. मैं सहमत हूँ आपसे. मेरा विरोध अतीत की आत्म मुग्धता में खोये रहकर अकर्मण्य हो जाने के प्रति है. अतीत के सुनहरे पन्ने हमें उत्साहित करते हैं और काले पन्ने अपनी त्रुटियों को सुधारने का अवसर देते हैं . इसलिए दोनों को स्मरण रखना आवश्यक है. चिकित्सा में आवश्यकता पड़ने पर प्लेसीबो का भी प्रयोग किया जाता है. सुज्ञ जी ! आपको समय निकालना ही पडेगा...आप समय की दुहाई देकर अब बच नहीं सकते. नवजागरण की चेतना वाले इस ब्लॉग मंच पर आपके सक्रिय रूप से जुड़ने की आवश्यकता है.
आशुतोष जी ! यह ब्लॉग नहीं है ....काँटों की राह है...बहुत संभल कर चलने की आवश्यकता है. जिस उद्देश्य से यह ब्लॉग प्रारम्भ किया गया है उसके लिए एक-एक शब्द बहुत गंभीर मनन-चिंतन के बाद रखना होगा. आप युवक हैं ...उत्साही हैं .....देश और समाज के लिए चिंतित हैं .....पर जोश में होश मत खोइयेगा नहीं तो आपकी लगाम सुज्ञ जी के हाथ में देनी पड़ेगी. मुझे लगता है कि सुज्ञ जी इस अभियान के अच्छे सारथी हो सकते हैं .
जय श्री राम ! राधे-राधे ! !

abhishek1502 ने कहा…

बेहद प्रेरणादायक पोस्ट
आप के विचार और कविता के मर्म को आत्मसात करना हमारी आवश्यकता है , इस के बिना आर्य जाति पुनः शिखर पर नही पहुच सकती !

हरीश सिंह ने कहा…

बहुत सुन्दर आलेख बहुत सुन्दर प्रयास..

जीत भार्गव ने कहा…

आपके विचार धारदार और ब्लॉग प्रासंगिक है. कृपया इसे जारी रखें.
सेकुलरिज्म की आड़ में चल रही राष्ट्रविरोधी और हिन्दू-द्वेषी हरकतों का प्रतिकार करने के लिए राष्ट्रवादी लेखको के साझा मंच 'आह्वान' AHWAN- Association of Hindu Writers And Nationalists की रचना की गयी है. आपसे भी निवेदन है कि 'आह्वान' से जुड़िये.
यह समूह गूगल पर है तथा इसका लिंक है: http://groups.google.com/group/AHWAN1
| वन्देमातरम |
http://secular-drama.blogspot.com

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

हमारी आपकी बेशक जमेगी, आपके दृष्टिकोण को तो मैं आपकी पहली टिप्पणी से ही जान गया था। यह आज की हमारी चर्चा तो इस मंच को गम्भीरता और गरीमा प्रदान करने के उद्देश्य से है। जो आप भी जानते है,और मैं भी। और यह भी रेखांकित हो जाता है कि हमें किस तरह सोच समझ कर सार्थक गति देनी है।
आपने सही कहा…"उसके लिए एक-एक शब्द बहुत गंभीर मनन-चिंतन के बाद रखना होगा. "
युगों के श्रम से उपार्जित उपलब्धि को भी हम लज्जित नहीं कर सकते। और नारात्मकता फलने फैलने से भी बचाना। आत्म गौरव को भी बचाना है। तो बिना हीनताबोध लाए गलतियों से सबक भी लेना है।

कौशलेन्द्र जी,

आशुतोष जी गम्भीर और सुलझे व्यक्तित्व के धनी है। यह तो हरीश सिंह जी के अजीब व्यवहार से आहत है, यह आक्रोश कुछ प्रतिक्रियात्मक है। और सच भी है हरीश सिंह जी की विचारधारा स्पष्ठ नहीं हो पा रही।

मैं इसी तरह सक्रिय रहुंगा, जब तक मंच के सम्मानित सदस्यों से स्नेह मिलता रहेगा।

सुज्ञ ने कहा…

यह ब्लॉग केवल और केवल हिन्दुओं का है तो, हिन्दु मन्दिरों की तरह सौम्य और आनंददायक होंना चाहिए, भले हिन्दु रामालय में धनुष शस्त्र धारी राम की प्रतिमा हो, फ़िर भी मन्दिर तो अपार शान्ति प्रदान करता ही होगा। इसे कब्रिस्तान वाली दरगाहों की तरह खौफनाक तो न ही होना चाहिए। बस एकता देखकर मात्र एकता के दुश्मनों के पसीने छूट जाय।

कौशलेन्द्र ने कहा…

सुज्ञ जी ! जमने के लिए थोड़ी सी नोक-झोक भी ज़रूरी है ...इसलिए कभी हो तो इसे प्यार से लीजिएगा ...बुरा मत मत मानियेगा कभी. आशुतोष जी को मैं भी जानता हूँ.....प्यारा सा बदमाश है .....उसे प्यार करने और डाँटने के अधिकार मेरे पास सुरक्षित हैं ...इसीलिये उसकी लगाम आपके हाथ में देने की धमकी दी है मैंने. आशुतोष जी की ऊर्जा को सही तरीके से खर्च करना है हमें.

आशुतोष ने कहा…

@सुज्ञ जी कौशलेन्द्र जी; बहुत बहुत आभार चर्चा में स्थान देने के लिए..
बात सत्य है मुझे हरीश सिंह का STATUS नहीं मालूम हो रहा है...
लगता है द्वन्द में है... कभी तो वो हिन्दू धरम के खिलाफ होने वालों पर पिल पड़ते हैं तो कभी बिलकुल हरीश खान की तरह बात करते हैं..
इसीलिए मुझे लगता है की वो कहीं स्थानीय निकाय के चुनाव तो नहीं लड़ने वाले..
इस मंच पर जमेंगी हम सब की...थोडा ब्यस्त हूँ आज कल..जल्द ही समय निकल कर कुछ और योगदान देने का परस करूँगा..

जय श्री राम

सुज्ञ ने कहा…

धन्यवाद, आशुतोष जी, सही परिपेक्ष्य में देखने के लिये!

कौश्लेन्द्र जी,

मेरी भी इतिहास में रूचि रही है, इतिहास हमें पढ़ाया ही इसलिये जाता है कि गौरवमय कार्यो का हम अनुसरण करें, और गलतियों से सबक ग्रहण करें।
किन्तु,हर अच्छाई के साथ बुराई सलग्न होती है,समस्या तब आती है जब गौरवमय अनुसरण की जगह हम मात्र गौरव लेने में मशगूल हो जाते है या गलतियों से सबक लेने की जगह 'गलती ही क्यों कर दी' इस हीनबोध में घुटते रहते है।

बस, इतिहास स्मरण करने का यही दुखद पहलू है।

कौशलेन्द्र ने कहा…

कसमसाहट हर तरफ है ......
कभी हवा चलती है तो चिंगारियां चमक उठती हैं

एक महिला पाठिका का मेल से मिला सन्देश ---

नमस्कार कौशल जी......आपने जो लिंक भेजी है , उसका अवलोकन कुछ देर पहले ही किया.........आपका आलेख और रचना दोनो ही जबर्दस्त हैं......आपका आक्रोश झलकता ही नहीं फूट-फूट कर बाहर निकल रहा है........इस विचारधारा को गति देने की प्रबल आवश्यकता है..........मैं जिस जगह पर कार्यरत हूँ वहाँ की आधी आबादी मुसलमानों की है.........इतना कुछ देखने को मिलता है कि खून खौलने लगता है.........कॉलेज में घूमनें वाले युगल जोड़ों में अधिकतर लड़के मुसलमानों के होते हैं और लड़कियाँ भोले-भाले हिन्दु परिवारों की......और यह कोई इत्तफाक नहीं है.....सोची-समझी साजिश है......शादी के बाद धर्म बदलकर बिचारियों का जीना दूभर कर देते हैं......अगर इतने ही उदार मन के हैं ये लोग तो अपनी बेटियों को हिन्दुओं में क्यों नहीं ब्याह देते....तब तो मरने –मारने पर उतारू हो जाते हैं.......अपनी ही बहन-बेटियों को ठिकाने लगा देते हैं........हम धार्मिक कट्टरता का विरोध करते हुए अपने बच्चों को दिन में एक बार मंदिर ले जाना भी जरूरी नहीं समझते....और इन लोगों को नमाज पढ़ना इस तरह घोंट कर पिलाया जाता है........कि जरूरी से जरूरी लेक्चर भी बंक करके नमाज पढ़्ने चले जाते हैं...........ऐसा तो कितना कुछ देखती रहती हूँ और तिलमिला जाती हूँ.........गोधरा से सिर्फ 70 किलोमीटर की दूरी पर रहती हूँ.........स्थितियों का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं........ खैर .....इस शुभ शुरूआत के लिये बधाई........मैं आपके साथ हूँ.......

Mohan ने कहा…

paheli baat to yah hai ki pahele hame vudesi (a)dharm ko jalmul se nikalna honga. tabhi hum sukh shanti vali jindgi ji sakenge, jay shree krishna........garv se kaho, hum hindu hai