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               धर्म-परिवर्तन


धर्म से धरती का नाता भूल कर जो चल दिया 
राष्ट्र से ही तोड़ नाता राष्ट्र-द्रोही बन गया.

द्रोह करके धर्म से जो भी पलायन कर गया 
भारत से पहले येरूशलम का वो दीवाना हो गया.

जो हुआ अपना नहीं वो क्या हमें दे पायेगा 
सूर्य का अपमान कर जुगुनू के ही गुन गायेगा.

रख आर्ष ग्रंथों में अश्रद्धा कोई नीति क्या सिखलाएगा 
कुछ सीखकर चालें विदेशी वो मात क्या दे पायेगा.

ज्ञान की जिस संपदा का सम्मान रिपुओं ने किया 
पोथियाँ पढ़कर विदेशी खुद को ही तुमने खो दिया.
   
धर्म त्यागी बन्धु मेरे सांझ घिर आयी है अब
लौट आओ घर तुम्हारे बिन अधूरा हो गया.



7 टिप्‍पणियां:

गंगाधर ने कहा…

bahut sundar kavita.

सुज्ञ ने कहा…

क्या खुब कौशलेन्द्र जी,

वास्तविकता अभिव्यक्त हुई है।

जो हुआ अपना नहीं वो क्या हमें दे पायेगा
सूर्य का अपमान कर जुगुनू के ही गुन गायेगा.

और अन्तिम छंद को मैं तो इस तरह व्यक्त करता।

धर्म त्यागी बन्धु मेरे सांझ घिर आयी है अब
लौट आओ कि सर पे छत का वक्त हो गया.

छत = सनातन धर्म

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत गम्भीर समस्या है धर्म परिवर्तन...

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

Beemar hai logon hakiman-e-watan
auron ko dawa vo kya dega
karta jo apno se daga
gairo ko wafa vo kya dega......

JAI SHRI RAAM.........

आशुतोष की कलम ने कहा…

पाश्चात्य सब्यता का अनुकरण हमें इस मार्ग की और धकेलता है इसका समाधान हिंदुत्व की अवधारणा को प्रबल बनाने में है..

हल्ला बोल ने कहा…

JAI SHRI RAAM

किलर झपाटा ने कहा…

वाह वाह जी बहुत दमदार गीत ओज से भरा हुआ और कटु सत्य को सिद्ध करता हुआ।

ज्ञान की जिस संपदा का, मान रिपुओं ने किया
पोथियाँ पढ़कर विदेशी, खुद को तुमने खो दिया

धर्म त्यागी बन्धु मेरे, सांझ घिर आयी है अब
लौट आओ घर तुम्हारे बिन, अधूरा हो गया

दिल जीत लिया आपने तो