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लोकपाल बिल +अन्ना का आन्दोलन +कमेटी का गठन +बैठकों की शुरुआत = चूँ-चूँ का मुरब्बा

...और अंततः लोकपाल बिल बन गया चूँ-चूँ  का मुरब्बा. बड़ी ही चतुरता से केंद्रीय सरकार ने अन्ना के साथ-साथ पूरे देश को ठग लिया है. यह आज की बिलकुल ताज़ी खबर है. 
     बिल के मसौदों पर कुछ मत भिन्नता के बाद एक सहमति के आसार नज़र आ रहे थे कि शिकार को लेकर गंभीर मत-भिन्नता सामने आ चुकी है. ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब सरकार की सोची-समझी चाल थी. जिस समय अन्ना भूख हड़ताल पर थे पूरे देश में एक जोश सा आ गया था .......सरकार को उस समय अन्ना की बात मानने में ही अपनी भलाई नज़र आयी, पर जैसे हिन्दी सिनेमा का खलनायक अंत तक अपनी दुष्टता से बाज़ नहीं आता उसी तरह सरकार ने अपनी चाल चल ही दी. सरकार को पता है कि भारतीय जन मानस का उबाल थोड़ी देर का होता है .....उबाल के समय कैसे भी थाम लो ...फिर बाद में कौन पूछता है ! और वही हुआ, तत्काल तो जन विरोध को थामने के लिए आनन-फानन में बात मान ली गयी पर जब वास्तविक काम की बात आयी तो प्रारम्भ से ही रोड़ेबाजी शुरू हो गयी. जैसे-तैसे उस अवरोध को पारकर आगे बढे तो अब शिकार को लेकर असहमति का झंडा बुलंद हो गया है. लोकपाल का कोड़ा किस पर नहीं चलेगा इस लाख टके के सवाल पर सत्ता में मंथन हुआ ...और निष्कर्ष निकाला गया कि बड़ी-बड़ी मछलियों को किसी भी तरह इस जाल से मुक्त रखा जाना चाहिए. 
    अब अन्ना को चाहिए कि अपने दल के साथ उस दलदल से बाहर आकर फिर से एक नया आन्दोलन प्रारम्भ करें, क्योंकि यदि लोकपाल बिल की अधिकार सीमा से बड़ी मछलियों को मुक्त रखा गया तो इस बिल का कोई अर्थ नहीं होगा. लोकतंत्र में लोक से बड़ा कोई भी नहीं होना चाहिए. चाहे वह कितना भी बड़ा पदाधिकारी क्यों न हो. सांसदों और प्रधानमंत्री को भी उस बिल की अधिकार सीमा के अंतर्गत होना ही चाहिए. 
      इस पूरे मामले में एक बात ध्यान देने योग्य है...और वह यह कि लोकपाल बिल के निर्माण और फिर उसके क्रियान्वयन के प्रति सरकार की इच्छा शक्ति की पोल खुल चुकी है. इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार में बैठे हमारे माननीय लोग अभी और घोटाले करने पर आमादा हैं. 
     निष्कर्ष यह कि भारत में लोकतंत्र एक छलावा ही सिद्ध होता जा रहा है ...देश की जनता को इसके स्वरूप और विकल्प पर मंथन करना होगा. 
    और चलते-चलते........
   छतीसगढ़ में पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध की गयी जांच में उनके पास से अरबों की अनुपात हीन संपत्ति के प्रमाण सामने आये हैं. अब सरकार उस अनुपातहीन संपत्ति पर आयकर लेने पर विचार कर रही है ......इतना दंड काफी है, अर्थात आयकर ले लेने के बाद प्रकारांतर से उस अवैध संपत्ति को उस अधिकारी की वैध संपत्ति घोषित कर दिया जाएगा . 
    पता नहीं सरकार और हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी अनुपात हीन संपत्तियों को राष्ट्रीय संपत्ति स्वीकार कर राष्ट्र को समर्पित क्यों नहीं कर देना चाहती ?        

मुस्लिम देशों में परिवर्तन की लहर ...

      आज कल मुस्लिम देशों में परिवर्तन की एक लहर उठी हुयी है. समुद्र में  कोई भी लहर यूँ ही नहीं उठा करती....इसके पीछे होता है समुद्र का हाहाकार और पीड़ा की एक लम्बी कहानी . यह लहर मिस्र से होती हुयी यमन तक पहुँच चुकी है. हमें ध्यान रखना होगा कि परिवर्तन की हर लहर का परिणाम सुखद होना अनिवार्य नहीं है . हर क्रान्ति मिस्र जैसी नहीं हो पाती. 
        एक ताज़े समाचार के अनुसार, यमन के एक शहर पर अलकायदा के तीन सौ विदोहियों ने कब्ज़ा कर लिया है. यह समाचार भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए खतरे का पूर्वाभास है. विश्व जन मानस में अलकायदा की हिंसक छवि बन चुकी है . उसी अलकायदा ने यमन के एक शहर पर कब्ज़ा कर लिया है. दूसरी और तालिबान ने पाकिस्तान के परमाणु आयुधों पर अपने इस्लामिक हक़ की खुले आम घोषणा कर दी है. यह स्पष्ट संकेत है कि आने वाले समय में  पाकिस्तान के अन्दर एक भीषण उथल-पुथल होने वाली है. इस उथल-पुथल से भारत का अप्रभावित रह पाना संभव नहीं है....खासकर तब जबकि कट्टरपंथी लोगों की निगाहें पाकिस्तान के परमाणु ज़खीरों पर लगी हों और वे कटिबद्ध हों पूरी दुनिया में शरीयत का क़ानून लागू करने के लिए. 
        अब एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या पाकिस्तान अपने परमाणु ज़खीरों की सुरक्षा कर पाने में समर्थ है ? ईश्वर करे वह समर्थ हो सके ..पर यदि वह ऐसा न कर सका और परमाणु ज़खीरे तालिबानियों के हाथ लग गए तो उनका प्रयोग भारत के विरुद्ध नहीं किया जाएगा ऐसा सोचना भारी भूल होगी. 
       खतरा पाकिस्तान पर भी कम नहीं है......वह अपने ही जाल में बुरी तरह फंस चुका है. आने वाले समय में पाकिस्तान का अस्तित्व क्या और कैसा होगा ......यह चिंतनीय है. पर पाकिस्तान की आम अवाम का रुख कुछ तसल्ली देने वाला है. वे अमन चाहते हैं ......सत्ता की अस्थिरता, गरीबी, बेरोज़गारी, भूख, पेयजल की समस्या, कमर तोड़ महंगाई, खूनखराबा और विश्व बिरादरी में बदनामी ....ये कुछ ऐसे घटक हैं जिनसे पकिस्तान का बुद्धिजीवी वर्ग और आम आदमी दोनों ही आजिज़ आ चुके हैं. वे परिवर्तन चाहते हैं. पर इसके लिए वे कुछ कर पाने की स्थिति में अभी नहीं लगते. वे प्रतीक्षा में हैं....किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में .....ठीक हम लोगों की तरह . आखिर हैं तो वे भी इसी भारतीय मानसिकता से जुड़े हुए ...केवल सीमा रेखा खींच देने से मानसिकता नहीं बदल जाया करती. 
     ......तो पाकिस्तान की अवाम भी परिवर्तन की प्रतीक्षा में है .......किन्तु इस बीच दुर्भाग्य से यदि कहीं तालिबानी अपने उद्देश्य में सफल हो गए तो यह प्रतीक्षा निराशा और पीड़ा के घोर अन्धकार में भी बदल सकती है....
          पाकिस्तान का अस्तित्व संकट में है. यदि स्थायी समाधान की बात करें तो एक ही श्रेष्ठ विकल्प उसके सामने है और वह है पाकिस्तान-भारत की सीमा-रेखा का लोप. कुछ लोगों को यह असंभव सा लग रहा होगा ..पर मैं आशान्वित हूँ. जर्मनी के प्रकरण में पहले भी ऐसा हो चुका है ...इसलिए भारत-पाक एकीकरण केवल खयाली पुलाव नहीं है. जिस दिन भारत-पाक की आम जनता यह चाह लेगी उसी दिन यह संभव हो जाएगा. 
        जनता क्यों चाहेगी ? इस चाहत के पीछे विकास की अनिवार्य आशाएं हैं. इन आशाओं को समझाना होगा. यह समझना होगा कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम कोई जमीनी विकास नहीं कर सके. पेय जल और दो वक़्त की रोटी हमारी पहली ज़रूरतें हैं जिन्हें छोड़कर हमारी सरकारें परमाणु आयुधों पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. ज़रा सोचिये - दोनों देशों की सेनाओं पर जितना धन खर्च किया जा रहा है एकीकरण के बाद उसका सदुपयोग ज़मीनी ज़रूरतों के लिए किया जाएगा. भारत और पाकिस्तान अमेरिका और यूरोप के आयुधों के ग्राहक हैं .......हम अपनी अहम् ज़रूरतों का पैसा व्यर्थ के कार्यों के लिए इन देशों को देते जा रहे हैं. यह अब अवाम को समझना होगा. अवाम को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान की अपेक्षा भारत का मुसलमान अधिक महफूज़ और चैन से है. एकीकरण दोनों देशों के विकास और अमन-चैन की पहली ज़रुरत है. यह बात जिस दिन हम सच्चे मन से स्वीकार कर लेंगे उस दिन भारत -पाक के एकीकरण को कोई रोक नहीं सकेगा. और तब विश्व में एक महाशक्ति के रूप में भारत का जो अवतरण होगा उसे देख कर दुनिया हैरत में पड़े वगैर नहीं रह सकेगी. .....ईश्वर करे वह दिन शीघ्र ही आये .        

मुस्लिम वोटो के लिए गिडगिडाते चंद्रबाबू नायडू--

आज सुबह अख़बार में इस खबर ने बहुत दुःख पहुँचाया कि प्रगतिशील माने जाने वाले चंद्रबाबू नायडू सत्ता प्राप्तिके लिए मुस्लिमो के आगे वोटो के लिए गिडगिडा रहे हें, वेसे तो जिन लोगो को यह भरोसा नहीं होता हे, कि जनता उनके काम पर, उनके विकाश कार्यों पर विस्वास कर उन्हें वोट देगी उनके लिए जीत के लिए मुसलमानों के सामने वोटो के लिए गिडगिडाना , मुस्लिम टोपी पहन हिन्दुओं से ज्यादा मुस्लिम हितेषी साबित करना ही एक मात्र रास्ता रह जाता हे. इसके लिए चंद्रबाबू व उन जेसे नेताओं के पास विकास के पैमाने पर अपनी असफलताओं को छुपाने तथा सत्ता पाने के लिए वही घिसेपिटे तरीके हे भाजपा सांप्रदायिक पार्टी हे,हमने नरेन्द्र मोदी का विरोध किया. वेसे विकाश के मामले में वो नरेन्द्र मोदी के आगे कहीं नहीं टिकते, नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में जैसा अभूतपूर्व विकास किया हे चंद्रबाबू तो वेसे विकास कि कल्पना ही नहीं कर सकते, विकास करना तो बहुत दूर कि बात हे. नरेन्द्र मोदी का विकास पुरे गुजरात का विकास हे, ना कि हिन्दू या मुसलमान का. तभी तो तमाम मिडिया, ढोंगी सामाजिक तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता, पूरी कांग्रेश पार्टी, चंद्रबाबू तथा उनके जैसे धर्मनिरपेक्ष (सही अर्थ --धर्मविहीन )लोगो के तमाम दुस्प्रचार करने तथा समूची ताकत झोंकने के बावजूद नरेन्द्र मोदी को पराजित नहीं कर सके. कहते हे ना कि झूट कितना ही बड़ा क्यों हो, कितने ही लोग कितनी ही बार बोले सच के सामने टिक नहीं सकता,
अब बेचारे चंद्रबाबू भी क्या करे, गुजरात में जो झूट नहीं चला वो हैदराबाद में तो चला सकते हे, ना तो गुजरात के विकास कि सच्चाई जनता को बता सकते हे, ना इस सच्चाई को जानते हुए भी जनता को बता सकते हे कि गुजरात में हिन्दू के साथ साथ मुसलमान भी नरेन्द्र मोदी को वोट देते हे, चंद्रबाबू नायडू कहते हे, गोधरा कांड के बाद हुए दंगो के बाद भाजपा के साथ होते हुए भी उन्होंने ही नरेन्द्र मोदी को हटाने कि सबसे पहले मांग कि थी, पर वो यह नहीं बताते कि उन्होंने गोधरा कांड कि आलोचना भी कि थी, शायद ऐसे लोगो के लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब यही होता होगा कि मुसलिमों के द्वारा हिन्दू मरे तो चुप बेठो,पर अगर हिन्दू के द्वारा मुस्लिम मरे तो हिन्दू कि जम कर आलोचना करो, वेसे भला हो उस समय के भाजपा नेताओं का जिन्होंने नरेन्द्र मोदी को हटाने कि बजाय चंद्रबाबू को जाने दिया जिनके नेत्रत्व में आज गुजरात अकल्पनीय प्रगति कर रहा हे, चंद्रबाबू नायडू कि तरह प्रदेश कि जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर नहीं किया. इसलिए अब बेचारे चन्द्र बाबु नायडू को वोटो के लिए मुसलमानों के सामने गिडगिडाना पड़ रहा हे. उनके लिए धर्म आधारित आरक्षण कि असंवेधानिक मांग तथा शादिखानो तथा मस्जिदों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता कि मांग करनी पड़ रही हे, वो हिन्दुओं के लिए मंदिर निर्माण, या हिन्दू तीर्थ यात्रा के लिए आर्थिक सहायता के लिए कोई मांग नहीं करते हे.
ऐसा कई बार सुना कि चंद्रबाबू नायडू ने धोके से पार्टी कि कमान अपने ससुर तेलगु देशम के संस्थापक श्री एन. टी. रामाराव से हथिया ली थी. लगता हे धोका देना उनकी खास विशेसता हे, अपने फायदे के लिए भाजपा के साथ जुड़े, अपने प्रदेश के लिए केंद्र से जम कर आर्थिक सहायता ली, हैदराबाद का बहुत विकाश किया, केवल हैदराबाद के विकाश को पुरे प्रदेश का विकाश मानने कि नादानी करते रहे, गाँव को, किषानो, बुनकरों को भूल गए, अपनेआप को विकाश पुरुष समझने के चंद्रबाबू के अहंकार का राजशेखर रेड्डी ने फायदा उठाया, गावं गावं में पदयात्राएं कि. अगले चुनाव में चंद्रबाबू रास्ते पर आ गए, खुद तो डूबे ही भाजपा को भी केंद्र में ले डूबे. चंद्रबाबू कि कारगुजारिओं का नुकसान भाजपा को भी हुआ.
ऐसे लोग जब भाजपा के साथ सत्ता में होते हे, या भाजपा के सहयोग से सत्ता मिलती हो तब इनके लिए भाजपा अच्छी होती हे किसी भी कारण से सत्ता से बाहर हो जाने पर भाजपा सांप्रदायिक हो जाती हे, चंद्रबाबू तथा उन जेसे नेता ऐसे समय भाजपा को धोका देकर मुसलमानों के सामने गिडगिडाने लगते हे. कहावत हे कि मुर्खता व नादानी में आदमी अपने ही पैरो पर कुल्हाड़ी मार लेता हे, पर चंद्रबाबू नायडू तो महा नादान हे जो कुल्हाड़ी पर पैर मार रहें हे, लगातार मारते ही जा रहें,पहली बार अपनी कारगुजारिओं से खुद के साथ साथ भाजपा का भी भट्टा बैठाया, भाजपा और नरेन्द्र मोदी को हार का जिम्मेदार ठहराया, दूसरी बार के चुनाव में सोचा भाजपा से अलग रहने से, उसे सांप्रदायिक पार्टी बताकर उसकी व् नरेन्द्र मोदी कि जमकर आलोचना करने से, मुस्लिम मतदाता पट जायेगा, मुस्लिमो को पटाने के कई जतन किये, मुस्लिम टोपी पहनकर सलाम करते हुए कई पोस्टर लगवाये, कई बड़े मुस्लिम नेताओं को अपने साथ मिलाया, पर कुछ नहीं हुवा, जो नादानी उन्होंने तब कि वो लगातार करते जा रहे हे, मुस्लिम तो उनके लाख गिडगिडाने पर भी ओवेस्सी कि एम.आइ.एम. पार्टी को छोड़ने वाले नहीं हे , उलटे हिन्दुओं के काफी वोट टूट कर भाजपा में जाने से चंद्रबाबू नायडू कि हालत ना घर के ना घाट के जैसी हो गई, दुसरे विधानसभा चुनाव के बाद हुए अन्य दुसरे चुनाव इसका सबूत हे. भगवान जाने कब नायडू जी को सदबुधि आयेगी कि चुनाव में जीत नरेन्द्र मोदी कि तरह पूरी जनता के विकास पर ध्यान देने, हर गावं शहर , हर जाति,धरम के विकास पर बराबर ध्यान देकर पूरी जनता का विस्वास जितने से मिलती हे. अपने फायदे के लिए जिस पार्टी का साथ लो, मतलब निकलजाने पर पर उसके साथ धोका दे कर किसी विसेस संप्रदाय के सामने गिडगिडाने से नहीं. जनता विकाश करने वालो तथा किसी कि भावनाएं भड़का कर वोट पाने कि लालसा रखने वालों को पहचानती हे. यह बात जब चंद्रबाबू नायडू समझेंगे तभी सफल होंगे.



प्रस्तुतकर्ता Laxmipat Dungarwal

धन्य है वो मानव जिन्होने पवित्र भारतवर्ष मे सनातन धर्म मे जन्म लिया है.

मित्रो
बहुत जन्मो के पुण्य के फलस्वरुप इस महान भारतवर्ष मे महान सनातन धर्म मे जन्म होता है.

और हम लोग बहुत खुशनसीब है कि हम लोगो को ऐसा अवसर प्राप्त है जो देवताओ के लिये भी दुर्लभ है.

भारत भूमि की महिमा अनन्त और अवर्णनीय है.

देवगण भारत मे जन्म लेने की इच्छा करते हुये ये सोचते है.
कि हम लोग कब संचित किये हुये महान अक्षय,निर्मल एवं शुभ पुण्य के फलस्वरुप भारत मे जन्म लेँगे और कब वहाँ महान पुण्य करके परमपद को प्राप्त होँगे.

नारदपुराण मे सनक जी नारद जी से कहते है.
नारद जी! जो भारत भूमि मे जन्म लेकर परमात्मा श्री विष्णु जी की आराधना मे लग जाता है उसके समान पुणयात्मा तीनो लोको मे नही है.

भागवत मे कहा गया है
"देवता भी भारत मे उत्पन्न हुये मनुष्यो की महिमा इस प्रकार गाते है-

अहा,
जिन जीवो ने भारतवर्ष मे भगवान की सेवा के योग्य मनुष्य जन्म लिया है उन्होने ऐसा क्या पुण्य किया है?
अथवा इन पर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये है ? इस परम सौभाग्य के लिये निरन्तर हम भी तरसते रहते है
(5/19/21)

इस देश का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा इसका पुराणो मे स्पष्ट उल्लेख है.
कि स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र थे प्रियव्रत !
इन्होने ज्योतिर्मय रथ द्धारा सात बार वसुधातल की परिक्रमा की ,इनसे जो परिखाएँ बनी ,वे सात समुद्र हुये और उनके किनारे के क्षेत्र सात महाद्वीप हुये.
इन द्वीपो के नाम क्रमशः जम्बु, प्लक्ष, शाल्मलि ,कुश, क्रौँच,शाक तथा पुष्कर नाम से प्रसिद्व हुये.

महराज प्रियव्रत के आग्नीध्र आदि सात पुत्र इन सात द्वीपो के अधिपति हुये.
सबसे बड़े पुत्र आग्नीध्र जम्बुद्धीप के अधिपति हुये.

महाराज आग्नीध्र ने जम्बुद्धीप को अपने नौ पुत्रो मे बराबर बाँट कर दे दिया.
इन नौ खण्डो के नाम इनके नौ पुत्रो के नाम पर क्रमशः नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलाव्रत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल पड़े.

ज्यष्ठ पुत्र नाभि के नाम पर खण्ड(वर्ष) का नाम अजनाभवर्ष पड़ा.

राजा नाभि के सौ पुत्र हुये. जिनमे ज्येष्ठ पुत्र थे भरत.
उनकी अत्यन्त लोकप्रियता तथा सदगुणशालिता के कारण अजनाभवर्ष का नाम भारतवर्ष पड़ा.

अजनाभं नामैतदर्षँ भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति( भागवत 5/7/3)

यह भारतभूमि अनन्त काल से सुसंस्क्रत,सुजला,सुफला रही है.
इस देश मे उत्पन्न साधु सन्तो से पूरी प्रथ्वी के मानवो ने शिक्षा प्राप्त की है.

इस भारतभूमि पर स्वयं भगवान कई रुपो मे अवतरित हुये है.
अयोध्या, मथुरा , काशी ,रामेशवरम, व्रंदावन ,हरिद्धार जैसी पवित्र स्थान यही पर है.

भगवान शिव का पवित्र कैलाश पर्वत भी यही है.

भगवती सीता और सती का जन्मस्थान भी इसी भूमि मे है.
बड़े बड़े साधु संत मुनि महात्मा भक्त सत्यवादी, सब इसी भूमि पर पैदा हुये है.

परोपकारी, वीर, न्यायप्रिय राजागण तथा साध्वी तपस्विनी ,पतिव्रता नारीरत्न भी इसी भारत मे हुये है.

गंगा, यमुना,सरस्वती,सिन्धु,नर्मदा,क्रष्णा , कावेरी जैसी पुण्य नदियाँ इस भारत भूमि को पवित्र कर रही है

यह भारत धर्मभूमि पुण्यभूमि, देवभूमि और सांस्क्रतिक भूमि है.

ऐसी पवित्र भूमि मे आर्य{हिन्दू} बन कर जन्म लेना अत्यन्त सौभाग्य की बात है.
जो केवल परमात्मा की क्रपा से ही मिलता है.

तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यूँ मत कुरेदो






तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यूँ मत कुरेदो
दहकता लावा ह्रदय में है की हम ज्वालामुखी हैं
लास्य भी हमने किया है और तांडव भी किये हैं
वंश मीरा और शिव का विष पिया है और जिए हैं



नीलकंठ पत्रकार और सेकुलर एक्सप्रेस:


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अभी अभी मिल कर आ रहा हूँ नीलकंठ भाई से ...बेचारे  अपनी आप बीती सुना रहें थे सोचा आप लोगो से साझा करूँ ..लेकिन एक बात आप सभी सम्मानित जनों से मेरे पास उनसे बातचीत की कोई विडियो नहीं है..इसलिए इसे आप काल्पनिक भी मान सकते हैं...आज-कल जमाना है स्टिंग का..लेकिन मेरी तनख्वाह इतनी नहीं की समाज या देश सेवा कैमरे के साथ कर सकूँ..
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हुआ कुछ यूँ की नीलकंठ जी  कार्यरत थे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में..उसी समय उनका मिलना हुआ "सेकुलर एक्सप्रेस" दैनिक के मालिक  हरिदास सिन्हा से, जो की एक समर्पित पत्रकार भी थे...नीलकंठ जी को उन्होंने दे दिया न्योता, की "सेकुलर एक्सप्रेस" में एक कालम लिखो....नीलकंठ जी समसामयिक और धार्मिक विषयों पर कभी कभी  कुछ न कुछ कलम घिस लेते थे, अब मंच दे दिया हरिदास सिन्हा ने अपने अख़बार में..अब तो नीलकंठ की निकल पड़ी.. कलम भी चल पड़ी और कुछ मुरीद भी मिल गए...
कुछ लेखों के बाद अख़बार की  तिमाही मीटिंग में हरिदास जी ने, नीलकंठ को फ़ोन किया और प्रस्ताव दिया यार तुम्हारा कालम रेगुलर कर दिया जाए,कैसा रहेगा???और तुम सेकुलर एक्सप्रेस के अंशकालिक पत्रकार भी बन जाओ..नीलकंठ को क्या चाहिए था ,अंधे को दो आँख..उनकी पत्रकारिता की  कामना का तरु पल्लव पल्लवित होने के लिए अठखेलियाँ करने लगा..साक्षात्कार की तारीख फिक्स हो गयी, क्यूकी हरिदास जी मालिक जरुर थे, मगर अपने मातहतों को कभी नौकर नहीं समझा उन्होंने..भाई निदेशक मंडल की राय जरुरी थी..शाम को ७ बजे समय फिक्स हुआ ..नीलकंठ पहुंचे अपनी चुरकी को बांधते  हुए...चलते चलते  चन्दन और लगा लिया की रिजेक्सन की गूंजाइस न रहे ..तुर्रा ये की दहेज़ में मिला कुरता पहन लिया, गलती से वो भगवा रंग का था..
साक्षात्कार मंडल में ३ लोग थे हरिदास सिन्हा जी, जनक जी ,और पातंजलि...आगे बढ़ने से पहले बता दूँ की नीलकंठ जी के अन्दर एक  बहुत बड़ी कमी थी की वो सच को सामने लाने  के लिए प्रमाण का सहारा नहीं लेते थे..सूत्रों से मिली खबर को भी लाइव कर देते थे..और जन्म से हिन्दू होने के कारण अपने धर्म की विशेषता या किये गए अत्याचारों पर बोलने से झिझकते नहीं थे.. चलिए कहाँ विषयांतर में फस गए ...
आगे बढ़ते हैं,तो शुरू हुआ नीलकंठ का साक्षात्कार, "सेकुलर एक्सप्रेस" में...हाँ ३ लोगों में से पातंजलि जी नहीं आ पाए थे, अतिब्यस्तता के कारण इसलिए वो वेब कांफ्रेसिंग के जरिये साक्षात्कार में शामिल हो गए,धन्य है आज की संचार प्रौद्योगिकी जो मीलों दूर बैठे ब्यक्ति का आभासी स्वरुप कम से कम  सामने ला देती है....पातंजलि जी सेकुलर एक्सप्रेस की वितरण और मार्केटिंग से सम्बंधित प्रबंधन देखते थें..
पहला प्रश्न दागा हरिदास जी ने.. आप कैसे "सेकुलर एक्सप्रेस" में योगदान दे सकते हैं....नीलकंठ जी ने कहा श्रीमान मैं "सेकुलर एक्सप्रेस" को रॉकेट की गति से ले जाऊंगा बस पुष्पक विमान और राम के बारे में कुछ लिखने की अनुमति चाहिए...हरिदास जी खुद भी इश्वर के महाभक्त, मुस्करा कर रह गए नीलकंठ की हाजिरजबाबी से ..
तभी जनक जी ने बोला नहीं नहीं, नीलकंठ इस अख़बार में कोई धर्म वर्म की बात नहीं होगी,देखो में भी पहले बहुत लिखता था जब नया नया आया था तुम्हारी तरह मगर अब इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला... भूल जाओ क्या हुआ तुम्हारे साथ,अपने को आगे के लिए तैयार करो...
ये बताओ क्या जानते हो आज की राजनीति के बारे में????नीलकंठ जी पूरी तयारी से आये थे और अमर सिंह का प्रभु चावला के साथ टेप भी सुनकर आये थे,सो दोहरा दिया ' आज कल राजनीति में यही हो रहा है वो मुझको ठोक रहा है मैं उसको ठोक रहा हूँ" बाकि जो बजे वो ताली ठोक रहे हैं...जनक जी मुस्कराए बिना नहीं रह पाए ..मगर साथ में वरिष्ठ  होने के के कारण राय दे डाली की इतनी स्पष्टवादिता ठीक नहीं होती..फिर भी मेरी तरफ से तुम ओके हो...हरिदास जी ने भी अपनी रहस्यमयी हिंदुत्व का लबादा ओढ़े हुए सेकुलर मुस्कान से सहमती दे दी..

मगर तूफान के पहले की शांति की तरह पातंजलि जी खामोश...पता चला की संचार की आडिओ ठीक नहीं होने के कारण उनकी आवाज नहीं आ पा रही थी,अब जा के ठीक हुआ ..
पातंजलि  का पहला प्रश्न या यूँ कह ले नीलकंठ के लिए विशेषण "अरे तुम्हारा नाम नीलकंठ है ..इस नाम से मुझे साम्प्रदायिकता की बदबू आती है" 
नीलकंठ आवक ...." पातंजलि जी मुझे तो भगवान शिव की छवि याद आती है" थोडा सँभालते हुए नीलकंठ ने कहा...
दूसरा बम भी तैयार था, वेबकैम के माध्यम से गिरा" ये शिखा क्या बना रक्खी  है, तुम तो सांप्रदायिक लगते हो,कहीं भगवा एजेंट तो नहीं हो, जो इस अख़बार में सेंध लगा रहे हो.. नहीं नहीं श्रीमान 'हकलाते हुए नीलकंठ बोले" तभी पातंजलि की निगाह पड़ी भगवा कुरते पर अब क्या था पारा सातवे आसमान पर अपने भावनाओं पर काबू करते हुए पातंजलि ने हरिदास की और देखते हुए बोला" ये भगवा आतंकवादी नहीं चाहिए मुझे..इसकी हिम्मत कैसे हुई "सेकुलर एक्सप्रेस"के आफिस में भगवा पहन कर आने की...जल्दी बाहर करें इस कूड़े को.......
नीलकंठ की अब दूसरी कमजोरी हिलोरे मारने लगी वो उनका गुस्सा ..जी में आया की पातंजलि को पातंजलि योग प्रदीप पुस्तक का दर्शन करा दें अपने तांडव से, मगर हरिदास जी से वो बड़े भ्राता जैसा स्नेह रखते थे, सो मन मसोस कर अपने ससुराल वालों को कोस कर रह गए की कुरता दिया भी दहेज़ में तो, भगवा रंग का सालों ने.....चलिए बहुमत साथ था तो नौकरी मिल गयी मगर, पातंजलि जी की आँखों में किरकिरी तो बन ही गए नीलकंठ...
एक बार नौकरी मिलते ही,अपने पुराने रंग में वापस नीलकंठ ...अन्दर का पत्रकार हिलोरे मारता और वो दिन रात एक कर के लेख लिखते सेकुलर एक्सप्रेस में,बीच बीच में हरिदास और जनक जी पीठ थपथपा देते, तो पत्रकारिता के नवोदित बालक को ,जिसके दूध के दांत भी टूटे नहीं थे,समाज बदलने का दिवास्वप्न्न आने लगे..
मगर पातंजलि जी पूरे इंतजार में थे की एक गलती नीलकंठ की और उसकी खोजी पत्रकारिता का पिंडदान सेकुलर एक्सप्रेस में ही हो जाए...
समय बीतता गया और वो गलती कर दी नीलकंठ ने ...पहले इटली से आयातित कुछ विचारधारा को गलत बताया ...पब्लिक का क्या साथ हो ही लेती है ...पातंजलि चुप..फिर इटली की रानी का चरित्र चित्रण पातंजलि चुप फिर युवराज...हद तो तब हो गयी जब उसने लादेन को लादेन और कसब को कसब कह दिया....
अरे ये नीलकंठ क्या कर रहा है  हरिदास जी, इसको पता नहीं देश के दामादों(अफजल और कसब) के बारे में सम्मान से लिखना चाहिए... ये उन्हें पाकिस्तानी आतंकवादी और न जाने क्या क्या बता रहा है..और पहली बहुप्रतीक्षित "सेकुलर एक्सप्रेस' से निकलने की वार्निंग नीलकंठ को...अब नीलकंठ ने सोचा अपना नाम निलाकुद्दीन रख लूँ तो नौकरी बच जाए..मगर बच्चों का क्या होगा ..बीबी का धर्म भी बदलेगा...समाज क्या कहेगा..खैर ...जैसे तैसे फील्डिंग लगा के हरिदास  जी से अभयदान पा लिया...
लेकिन कहते हैं न "आदत छुटे नहीं छुटती" आज हद हो गयी एक हिन्दू नाबालिक लड़की के साथ  दुष्कर्म हुआ और नीलकंठ की इतनी मजाल जो उसकी आप बीती सेकुलर एक्सप्रेस में छाप दे..अरे हिन्दू लड़की तो होती ही है बलात्कार और शोषण के लिए..नीलकंठ के जानने वाली थी तो खबर  पक्की मान कर चाप दिया लेख..
दूसरी वार्निंग पातंजलि की ..क्या प्रमाण है इस लड़की का बलात्कार हुआ है???क्या विडियो है इसका ?? क्या तुमने मेडिकल कराया?? क्या पता किता बलात्कार करने वाला कौन है??क्या इसके पड़ोसियों से पूछा बलात्कार कैसे किया गया??इसके कपडे कहाँ कहाँ से फाड़े गए थे उसका चित्र है???ये जब देखो तब सूत्रों से मिली खबर तुमको ही क्यों मिलती है नीलकंठ...जाओ पहले बलात्कार का विडियो बनाओ फिर यहाँ आना..अब पानी सर से ऊपर हो रहा है हरिदास जी..कभी ये इश्लाम तो कभी युवराज तो कभी इतिहास तो कभी शिवलिंग..ये इन्सान बखेड़ा खड़ा करता है ..केवल जीभ चलता रहता है...समाज में क्या योगदान है इसका???
अरे हिंदुत्व की बात  करने की बार बार हिमाकत करता है..."सेकुलर एक्सप्रेस" की रीडरशिप घट गयी..मदरसों ने एड देना बंद कर दिया...क्या बंद करना है इस सेकुलर एक्सप्रेस को, जो एक भगवा गुंडे को बैठा रखा है, सेकुलर लोगों को सेकुलर श्वान बोलने के लिए????अब या तो ये या तो मैं....

पता चला जनक जी ब्याक्तिगत कार्य में ब्यस्त थे ...हरिदास  की परिस्थिति भी धृतराष्ट्र  जैसी, अगर नीलकंठ को न निकाला तो पातंजलि चला जाएगा  सेकुलर एक्सप्रेस कैसे बिकेगा..धन्धा बंद..और अगर नीलकंठ को निकला तो नैतिक आधार क्या होगा ...रीडर तो उसके लेख पसंद ही करते हैं बड़ी उलझन है भाई..
तभी मोबाइल की घंटी बजी..."नीलकंठ कालिंग"..हेल्लो हरिदास  जी, मैं इस मंच से स्वेच्छा से इस्तीफा दे रहा हूँ ..जो राम का नहीं वो हमारे किसी काम का नहीं.....अब हरिदास  जी सोच रहे थे "जय श्री राम" आप से ही चल रहा है "सेकुलर एक्सप्रेस" का काम ..दुविधा से मुक्ति मिली.....

चलो भाई नीलकंठ तुम अगर जाना चाहते हो तो में कैसे रोक सकता हूँ...एक काम करो एक नया अख़बार निकलना शुरू किया है...हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान...हम अब उधर ध्यान देते हैं..वहाँ ये पातंजलि का पंगा भी नहीं रहेगा और तुम देशभक्ति भी कर लेना.....और हाँ खाली हाथ नहीं सेकुलर एक्सप्रेस की तरफ से में तुम्हे योगदान के लिए ५ हजार का चेक भी दूंगा..मगर नीलकंठ वो तुम्हारे इस्तीफे वाली खबर हम कालम से हटा रहें हैं...सेकुलर मज़बूरी है...और ये ५ हज़ार मेरी तरफ से भी...
कल से "हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान".के आफिस में तुम्हारा स्वागत है...फिर मिलते हैं. 

सामने रखे कंप्यूटर में ईमेल पर "पातंजलि" का धन्यवाद लिखा मेसेज फ्लेश कर रहा था......
"सेकुलर एक्सप्रेस" और "हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान" दोनों मजे में चल रहा है...
हरिदास जी भी गा रहें हैं..
हरी अनंत हरी कथा अनंता......

निरीह जानवरों पर अत्याचार आधुनिकता के दिखावे के लिए


इस पोस्ट को लगाने का अभिप्राय सिर्फ इतना ही है की कृपया चमड़े से बनी बस्तुओं का कम से कम इस्तेमाल करें जिससे निरीह जीवों पर हो रहा अत्याचार कुछ कम करने में हम सब योगदान दे सकें..

    यूँ ही नहीं कहा गया हिमालय को देवभूमि ........ कैलाश पर्वत की दिव्यता  का दर्शन कीजिये आप भी. 
      हिमालय यात्रा के अनंतर गोमुख के मार्ग में दूर एक पर्वत की चोटी पर मुझे भी एक स्थान पर विशाल हिमनद के रूप में ॐ  के दर्शन हुए थे ...दिव्य था वह दर्शन ....अभिभूत था मैं. हिमालय ने सदा ही मुझे आकर्षित किया है. अगला जन्म हिमालय के ही किसी गाँव में लेना चाहूंगा .......


Himalayas


North Face of Kailash Parvat (Bhutan) - by 
Adien Gaswort (Italy)
HimalayasThe Great Mountains of Himalayas (India) - by Tlivu (South Africa)


Himalayas
View of Pindari Glacier (India) - By Gaurav CHAUHAN (India)
Himalayas
Mesmerizing View of Himalayas (India - by Aadyn (Australia)

सनातन संस्कृति को खतरा


सनातन संस्कृति सर्वाधिक प्रचीन और सर्वश्रेष्ठ सभ्य संस्कृति है। इस संस्कृति नें सर्वोच्छ उँचाई को हासिल कर लिया था। सनातन नें वह स्थिति प्राप्त कर ली थी जहाँ कोई भी विचारधारा आए उसे अपने रंग में रंग देती थी। क्योंकि इसके पास सर्वोच्छ निष्कर्ष निश्चित हो चुके थे इसलिए सामान्य जीवन धारा के छोटे छोटे सिद्धांतो का इसमें घुल जाना स्वभाविक था। अन्तत: सारी विचारधाराएँ इसमें घुलकर एक-मेव हो जाती थी।
किन्तु बाहरी विपरित विचारधाराएँ आई जो दर्शन की पूर्णता को प्राप्त नहीं थी। किसी भी तरह जीवन और भोग को महत्व देने वाली थी। वे कुसंस्कृतियाँ, सनातन से पूरी तरह विपरित थी।
उन कुसंस्कृतियों को सनातन नें पहले तो अपने रंग में रंगना चाहा, उसे सर्वोच्छ सिद्धांतो में आत्मसात करने का प्रयास किया पर मूल से ही भिन्न और विपरितता के कारण वे खलनायक की भूमिका में ही रही। सनातन दूध की तरह थी जो मिश्री को स्वयं में घोल देती थी। इन कुसंस्कृतियों का स्वभाव फिटकरी था, देखनें में मिश्री की डली पर स्वभाव कटु और विष समान था। स्वभाव मात्र कटु ही नहीं वह जिसका आधार लेती उसे भी बिगाड कर रख देती। इस फ़िटकरी नें दूध समान सनातन में भी बिगाड़ ही शूरू किया।
सनातन की पीढ़ी नें उनके आगमन पर पहले उन्हे स्वयं में घुलने का अवसर दिया, पर वह घुल न पाई। दूसरी पीढ़ी ने स्वतंत्र सौहार्द दिया। उस संस्कृति ने सौहार्द की कमजोरी पर राज किया। हमारी वर्तमान पीढ़ी सेक्युलर बन झुक गई, उसे हमले की छूट मिल गई। अब आने वाली सनातन पीढ़ी को सम्पूर्ण खा जाने की उसकी मानसिकता है। वह सनातन को अपने कुसंस्कारित विपरित रंग में रंग देने को आमदा है। वे कुटिलता से कहती है हमारे में कुछ समानताएं है। अत: हम जैसे बन जाओ। पूरी तरह से संस्कार विहिन, असभ्य वापस आदिम, भ्रष्ट!!

सावधान, सनातन संस्कृति वास्तव में खतरे में है!!

खरी-खरी



पहचान  

नाम -
"भस्मासुर"
पहचान -  
"पाकिस्तान" .

उनका धर्म.......

है बेहद नाज़ुक 
( पैदाइश के वक़्त एल.बी.डब्ल्यू. रहा होगा )  
बात-बात में 
मंडराने लगता है उसपर 
खतरा.
उसकी इम्यूनिटी भी कमजोर है
जब देखो ........तब पड़ा रहता है 
जेहाद के आई.सी.यू.  में. 

अतिथिदेवोभव

अतिथि की पूजा 
हमारी संस्कृति है 
इसीलिये 
हम अर्पित कर देंगे ......
अतिथियों को धार्मिक आरक्षण.

दान 

दधीची ने दे दीं अस्थियाँ 
हमने दे दिया 
अपना स्वाभिमान.

हिन्दुस्थान 

चढ़ जाएगा
इस्लाम .... 
और शरीयत की भेंट
बचेगा 
बतौर नमूना 
किसी टापू में.

योग 

सिमट गयी हैं देश की सीमाएं 
सिमटती ही जा रही हैं ........
पर ............. 
तुम्हें क्या
तुम तो करते रहो 
घोटालों का योग 
योगियों का देश जो ठहरा .  
      
( एल.बी.डब्ल्यू.= लो बर्थ वेट ; जन्म के समय जिनका वज़न सामान्य से कम होता है उनमें रोग-प्रतिरोध क्षमता भी कम होती है और वे प्रायः रोगग्रस्त बने रहते हैं / इसका दूसरा  भावार्थ है सतोगुण की अल्पता ) 

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हिँदूओ की निष्क्रियता का दुष्परिणाम

कहते है न जब किसी को उंगली पकड़कर सहारा दो तो वो उसका नाजायज फायदा उठा के हाथ के सहारे सर पे चढ़ जाता है.
यही हाल मुसलमानो का है. सभी मुस्लिम संगठनो देवबंद, जमीयत ए उलेमा आदि ने मिलकर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी से मुलाकात की और मुस्लिम आरक्षण जल्द लागू करने की माँग की .साथ ही उन्होने कहा
कि इसके लिये बड़े स्तर पर जेल भरो आंदोलन भी किया जायेगा.
उन्होने सभी मुसलमानो से कहा कि वो चुनावो मे उसी को वोट दे जो पार्टी उनको शिक्षा , नौकरी आदि मे आरक्षण देने का वादा करे.

इन संगठनो द्वारा इस सविधान विरोधी माँग को रखने की हिम्मत अचानक ही नही आ गयी.
बल्कि ये वोट की लालची सेकुलर सरकारो द्धारा सालो से इनको हडडी डालने का परिणाम है.
और फिर करोड़ो बांग्लादेशी मुसलमान( जिनको वोट की लालची इस सरकार ने यहाँ की नागरिकता प्रदान कर दी है ) को मिलाकर इनकी संख्या इतनी हो गयी है कि सरकार बनाने मे इनकी मुख्य भूमिका है. साथ ही इनका संगठित होना भी इनकी एक मुख्य शक्ति है. इसलिये ये आराम से किसी भी सरकार को ब्लैक मैल कर सकते है.

इन मुल्लो की हिम्मत बड़ने का एक कारण ये भी है इन्हे ये अच्छी तरह से पता है कि हिँदु नाम की कौम बिखरी हुयी है और हमेशा सोयी हुयी रहती है. उसे किसी बात पर कोई आपत्ति नही होती.
उसको त्याग और सहिष्णुता का इतिहास पढ़ा पढ़ा कर त्यागी बना दिया गया है.

इन मुल्लो की हिम्मत ये देखकर और बढ़ गयी कि इनको हज जाने के लिये सब्सिडी दी जा रही है और हिन्दुओ को अमरनाथ यात्रा के लिये टैक्स देना पड़ता है.

इन मुल्लो की हिम्मत इसलिये इतनी बढ़ गयी कि इन्होने देखा कि इनके वोटो की लालची सरकार ने इनकी नाराजगी की वजह से आज तक अफजल गुरु को फासी नही दी.

साथ ही ये मुल्ले ये देखते ही रहते है कि आये दिन दिग्गी जैसे चिरकुट हिँदुओ को कोसा करते है और हिँदु कुछ भी नही बोलते.


इतना सब देखने के बाद इन मुल्लो को पूरा विश्वास है कि ये वोट बैँक की लालची सरकार इनकी इस सविधान विरोधी मांग को भी मांग लेगी और हिँदू हमेशा की तरह चुप रहेगा.

लेकिन मै इन मुल्लो को बता देना चाहता हू.
कि मुस्लिमो को आरक्षण किसी भी कीमत पे नही दिया जायेगा .चाहे जितना भी हाथ पैर मार लो.

और अगर इस विदेशी सरकार ने वोट बैँक के लालच मे इस संविधान विरोधी मांग को लागू करने की जुर्रत की .और हिँदुओ का हक मारने की कोशिश की . तो सरकार कैसे उखाड़ के फेकी जाती है हिँदू जनता को अच्छी तरह आता है.
जैसे कुम्भकर्ण ने जागने के बाद तबाही मचा दी थी वैसे ही ये सोयी हुयी हिँदु जनता जागने के बाद ऐसी तबाही मचायेगी की कांग्रेस का महाविनाश हो जायेगा.

इस्लाम का एक और रूप

बंधुओ आप लोग इस लिंक पर भी जाएँ और देखे दुनिया के एक और कोने में इस्लाम का क्या रूप है। किस तरह गौ माता का कटा हुआ सर लेकर प्रदर्शन कर रहे है कायर इस्लाम के नाम पर। क्या इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है।
http://www.youtube.com/user/VHPSampark#p/u/59/LzZnzgXfyQY









युग परिवर्तन करने को अब

ध्येय मार्ग पर चलना है !

विश्व पटल पर भारत माँ का,

फिर से शौर्य दिखाना है, फिर से शौर्य दिखाना है !!१!!

समय चलेगा अपने ढंग से,

अविचल गति अपनाना है !

ग्राम नगर और डगर डगर में,

भक्ति भाव प्रकटाना है !

हृदय धरा पर भारत माँ का,

उज्जवल चित्र बनाना है, उज्जवल चित्र बनाना है !!२!!

कुरुक्षेत्र में गीता सुन जो,

अर्जुन थे कटीबद्ध हुए !

शाखा स्थल पर उसी रीत से

नव भारत निर्माण करें !

स्नेह भरे भावों से पुनरपि

अर्पण भाव जगाना है, अर्पण भाव जगाना है !!३!!

केशव माधव के सपनों को

पूरा कर दिखलाना है !

संघ शक्ति के द्वारा जग को.

दर्शन भव्य कराना है !

हिन्दू और हिंदुत्व भाव से

भगवा ध्वज फहराना है, भगवा ध्वज फहराना है !!४!!


फेसबुक पर अपना देश से प्राप्त 

वैचारिक हत्याओं पर पनपते निर्मम व्यापार ......2

     विगत कुछ वर्षों से, लोकतंत्र के रक्षण में लोक व तंत्र के मध्य की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रचार माध्यम अपने उत्तरदायित्व से भटकता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है, तो अब  उत्तरदायित्व का यह भाग भी लोक को ही अपने ऊपर लेना होगा. हिताहित का अन्वीक्षण कर ही "लोक" समर्थ हो सकेगा और तभी वह स्वयं को अपने चारो ओर मंडराते नाना रूपधारी दानवों से बचा सकेगा. सारी बात लोक पर आकर इसीलिए ठहर जाती है क्योंकि अंततः भाग्यविधाता नेताओं और निरंकुश अधिकारियों की तरह ही प्रचार माध्यम के लोग भी तो इसी समाज की उपज हैं. भ्रष्ट शासक की सेवा में रत सेवक कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, उसी का एक अंग बनकर ....या फिर अपंग होकर रह जाता है . इस विषय में नैतिक चरित्र की बात करना भी लोग अव्यावहारिक मानने लगे हैं. भ्रष्टाचार जो इतना फल-फूल रहा है , केवल कुशासकों के ही कारण नहीं है. वह जो क्षीर में नीर की तरह समा गया है, उसमें आमजन की भागीदारी भी कुछ कम नहीं है. कर्तव्यपरायण और निष्ठावान सेवक दुर्लभ होते जा रहे हैं तथापि जो हैं भी , शासन उनके साथ न्याय नहीं कर पाता . किन्तु इसी कारण से यदि वह शिथिल और भ्रष्ट हो जाय तो उसकी निष्ठा और चरित्र पर प्रश्न उठ खड़े होंगे. निष्ठा तो तभी है जब विपरीत परिस्थितियों में भी वह डिगे नहीं ...भले ही टूट क्यों न जाय. मैं ऐसे टूटने को जीवन का श्रेष्ठतम एवं पवित्र उत्सर्ग मानता हूँ. 
    इस गणतांत्रिक ( ? ) देश में कार्यालयीन कार्यपद्यति की विद्रूप भयानकता ने तो दीप जलाने वालों की निष्ठा को मुक्त हो ललकारा है. देश की रचनात्मक ऊर्जा इसी सब से जूझने में व्यर्थ होती जा रही है. प्रतिभा पलायन को रोक पाना इसीलिये तो संभव नहीं हो पा रहा. कार्यालयीन कार्य प्रणाली पर सुसंगठित भ्रष्ट लोगों का पूर्ण आधिपत्य हो गया है. इसे कैसे विस्थाप्तित कर सुप्रणाली सुस्थापित की जाय , यह भी एक ज्वलंत और चुनौती पूर्ण समस्या है. कुतंत्र पीड़ितों को नेक-नेक सी बातों के लिए भी न्यायालय जाना पड़ रहा है....तथापि समस्यायों का कोई अंत नहीं और समाधान का पता नहीं क्योंकि उत्तरदायित्व हीनता का विषाक्त संक्रमण हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था को निगल चुका है. न्यायालयों में नित नए पहुँचने वाले शासन से सम्बंधित प्रकरणों ने शासन को दर्पण दिखाकर असफल व्यवस्था की स्पष्ट घोषणा कर दी है.  आश्चर्य है कि  देश फिर भी चल  रहा है. 
   मुझे इस पर भी आश्चर्य होता है कि इतने बड़े देश के लगभग दो अरब नागरिकों के भाग्य विधाता का गुरुतर भार वहन करने वालों के लिए कोई औपचारिक शिक्षण संस्था खोलने का विचार जन्म तक नहीं ले सका अभी. विकसित, सभ्य एवं तकनीकी क्षमताओं से युक्त इस विशाल समाज की यह भी एक विडम्बना है. नेता और अधिकारी किसी ऐसी पाठशाला से पढ़कर नहीं आते जहां उन्हें सुनीति और राज धर्म की व्यावहारिक शिक्षा दी गयी हो.              

अमर बलिदानी नाथूराम गोडसे के जन्म दिवस पर सत सत नमन



ऐ वीर तुझे है नमन मेरा

तुम राम कृष्ण की हो संतान..

गाँधी को तूने दिया मोक्ष

ये याद रखेगा हिंदुस्तान......


भारत माता की जय...

नाथूराम गोडसे ...अमर रहे



सभी भाई को चलना है ....जय श्री राम




चित्र को पढने के लिए चित्र पर क्लीक करें.



क्या ऐसे ही होने चाहिए भारतीय मुसलमान ...?

मित्रो मैं आज अपना सामुदायिक ब्लॉग "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" पढ़ रहा था. वहा पर हमारे ब्लोगर भाई "अनवर जमाल खान साहब " की पोस्ट दिखाई दी, उन्होंने किसी अज़ीज़ बर्नी जी का ख़त लगाया था. और लिंक दिया था. अनवर भाई अज़ीज़ बर्नी मैंने इसलिए लिखा क्योंकि मैं उनकी शख्सियत से वाकिफ नहीं हूँ. आप कौन से अज़ीज़ बर्नी का लेख दिखाए हैं, मैं जिस बर्नी साहब को समझ रहा हूँ उनकी मैं बहुत इज्ज़त करता हूँ. 
दोस्तों यह पोस्ट मैं यहाँ लगा रहा हूँ. इस सोच के साथ की भारत में रहने वाले सभी मुसलमानों की सोच ऐसी ही होनी चाहिए. मैं सही हूँ या गलत इसका फैसला आपके कमेन्ट करेंगे.... 

आतंकवाद समर्थक के रूप में उभरता भारत


यह पोस्ट प्रवक्ता.काम  से ली गयी है जिसके लहक माननीय मयंक चतुर्वेदी जी..बहुत ही वैचारिक प्रश्न उठाया है इन्होने..कृपया आप सभी विचार दें अपने..

आतंकवाद समर्थक के रूप में उभरता भारत




विश्व के सभी मुस्लिम बाहुल्य एवं अन्य देशों में भले ही ओसामा बिन लादेन के समर्थन में नमाज अता नहीं की गई हो, किन्तु आतंक के इस जहरीले नाग को अमेरिका ने जब अपनी सैन्य, कूटनीति और गुप्तचर शक्ति के बल पर कुचला तो विश्व ने देखा कि भारत के अंदर जगह-जगह उसकी आत्मा की शांति के लिए विशेष नमाज का आयोजन किया गया। एक आतंकवादी के समर्थन में उसकी आत्मा की शांति की बात करना जिसने कि बारूद के ढेर पर न जाने कितने बेहुनाहों को मौत के घाट उतार दिया, उसके समर्थन में नमाज की यह व्यवस्था साफ संकेत दे रही है कि भारत में अन्य देशों की अपेक्षा इस्लामिक कट्टरपंथी तेजी से बढ़ रहे हैं, जो कि आतंकवादी गतिविधियों को इस्लाम के विस्तार के लिए आवश्यक मानते हैं।
जम्मू-कश्मीर में तो इसके कारण एक बार फिर स्थिति भारतीय सैनिकों की सूझ-बूझ के कारण बेकाबू होने से बच गई। लेकिन देश के अन्य रायों में इस विशेष नमाज पढ़ने के समय जो अन्य धर्मावलम्बियों पर भय का वातावरण बना, उससे यही संकेत गया कि भारत में आज न केवल आतंक का बल्कि आतंकवादियों का विस्तार वृहद स्तर पर चल रहा है। कोलकता में टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम मौलाना नूरुर रहमान बरकती से लेकर चेन्नई की बड़ी मस्जिद, लखनऊ, हैदराबाद में मौलाना मोहम्मद नसीरुददीन के नेतृत्व में उजाले शाह ईदगाह पर हुई विशेष दुआ, जम्मू-कश्मीर की अनेक मस्जिदों तथा देश के अन्य प्रमुख शहरों व रायों में जिस तरह इस्लाम के अनुयायियों ने आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन के लिए विशेष नमाज अता की! आखिर इनका इसके अलावा क्या आशय निकाला जाय कि जो सभी लोग इसमें शामिल हुए वह ओसामा के कार्य को उचित मानते थे? यदि ओसामा सही है तो फिर ओबामा गलत ? जिसने अपने देश के नागरिकों की मौत का बदला ओसामा की मौत से लिया।
वास्तव में विश्व व्यापार केन्द्र न्यूयार्क के दोनों टावरों को 9-11 के दिन विध्वंस करके अलकायदा ने अमेरिका को झकझोर कर रख दिया था। इस घटना के बाद ही सही अर्थों में यूरोपिय देश विशेषकर अमेरिका ने आतंकवाद के दंश का अनुभव बहुत नजदीक से किया। इसके पहले तक वर्षों से इस जहर को पी रहे भारत की उन सभी बातों को अमेरिका खारीज करता रहा है जिसमें अनेक बार इस्लामिक हिंसा और आतंक के कारण सैकडों भारतीय अपनी जान गवा चुके थे। 9/11 की घटना के बाद ही इस्लाम और इससे जुड़े आतंकवाद पर सैकड़ों अध्ययन हुए व खुली चर्चा शुरू हुई।
वस्तुत: इसकी गहराई में जायें तो जिहाद और इस्लामिक आतंकवाद की जड़ में कुरान की वो 25 आयते हैं जो अल्लाह पर यकीन नहीं करने वालो की हत्या को जाया ठहराती हैं। मिश्र और इजराईल के अलावा अन्य किसी देश में मूल ग्रंथ कुरान की इन आयतों में संशोधन नहीं किया गया है। एकाधिक देश में इन आयतों पर रोक लगी हुई है। ओसामा-बिन-लादेन और उन जैसे लोग पूरे विश्व में जहाँ भी कभी इस्लामिक राय रहा वहाँ तुरंत इस्लाम का राय चाहते हैं। यह आयते ऐसे लोगों के लिए शस्त्र का कार्य करती हैं। इनके सहारे जेहादी आतंकवादी दुनियाभर के मुसलमानों को एकजुट करने का स्वप्न देखते हैं। इसीलिये ही तो अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने वाले मोहम्मद अट्टा और मरवान अल किसी अभाव से पीड़ित होकर धन के लालच में या अन्य किसी भौतिक संसाधन का स्वप्न देखकर आतंकवादी हिंसा को अंजाम नहीं देते, न ही किसी ने इनका राजनैतिक उत्पीड़न किया, जिसका बदला देने के लिये यह सैकड़ों निरीह लोगों की जान लें। ये पढ़े-लिखे तकनीकी के छात्र नौजवान हैम्बर्गर में एक अपार्टमेंट में रहकर सारी सुख-सुविधाओं का भोग करते है, किन्तु जैसे ही यह हिंसक, इस्लामिक संप्रदाय के संपर्क में आते हैं इस्लाम और मजहबी अधिनायकवादी विचारधारा के सिपाही बन जाते हैं।
विश्व में सबसे बड़ा मुस्लिम देश इंडोनेशिया है। उसके बाद दुनिया का दूसरा बड़ा मुस्लिम देश भारत है जहाँ 15 करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं। भारत में पिछले 63 साल से सफल लोकतंत्र में मुसलमानों को वह सभी अधिकार मिले जो एक लोकतंत्रतात्मक गणराय में आम नागरिक के अधिकार हैं। भारत में मुस्लिम पुरूषों के अलावा महिलाएँ न केवल राजनीत के सर्वोच्च शिखर पर पहुँची हैं बल्कि संवैधानिक न्याय प्रणाली के तहत सर्वोच्च न्यायालय की जज तक बनी हैं। जबकि इस्लामिक देशों में ऐसा नहीं है, वहाँ महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार नहीं दिए गए हैं।
इसके अलावा इस्लामिक देशों में जो अधिकार अल्लाह पर ईमान रखने वालों के लिए मुकर्रर किये गये, वह अधिकार अन्य किसी धर्माम्वलंबियों के लिए नहीं हैं। इस्लामिक देशों में अन्य धर्मों पर आस्था रखने वाले अपने धार्मिक प्रतीक चिन्ह तिलक, चोटी, पगडी आदि का खुलेआम प्रदर्शन नहीं कर सकते। भारत और इस्लामिक देशों में नागरिक समानता के स्तर पर ऐसे अनेक भेद हैं, जो अपने नागरिकों में केवल धर्म के आधार पर अंतर करते हैं।
बावजूद इसके भारतीय मुसलमानों में अलकायदा और सिमी जैसे आतंकवादी संगठनों के प्रति लगाव और सहानुभूति का होना समझ के परहे है। जिन संगठनों का भारत की संवैधानिक न्याय प्रणाली पर विश्वास नहीं, केवल शरीयत के कानून में ही विश्वास है। ऐसे लोगों के प्रति अपना विश्वास प्रदर्शित करना हिन्दुस्तान के उन मुसलमानों को कटघरे में जरूर खड़ा करता है, जो भारत की इस संवैधानिक व्यवस्था में प्रदत्त उन सभी अधिकारों का उपभोग तो करते हैं, जो उन्हें अल्पसंख्यक होने के नाते प्रदान किये गये हैं, किन्तु एक राष्ट्र के नागरिक होने के नाते अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करना चाहते।
गोधरा नरसंघार, मुम्बई ब्लास्ट, दिल्ली, ब्लास्ट, बनारस ब्लास्ट, पूर्व उत्तर प्रदेश में हुए रेल बम बिस्फोट, कश्मीर ब्लास्ट जैसी अनेक आतंकी घटनाएँ हैं जिनमें जिहादी किस्म के भारतीय मुसलमानों ने कई निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया था। आज भी भारत के मुस्लिम बहुल रायों व क्षेत्रों में अलकायदा, सिमी जैसे संगठनों से जुड़ी सामग्री खुले आम पढ़ने और इलेक्ट्रॉनिक रूप में देखने को मिल जाती है। क्या इसके लिए यह माना जाय कि भारत में ऐसा देवबंद,वहाबी, बरेलवी जैसे इस्लामिक विद्यालयों के कारण हो रहा है या इसके अन्य कारण जिम्मेवार हैं। भारत में पिछले वर्षों में 2 लाख से अधिक लोग इस्लामिक आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं। अकेले जम्मू-कश्मीर में ही 80 हजार से अधिक निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। जिहाद आधारित इस आतंकवाद से देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था और धार्मिक मूल्यों को जो क्षति पहुँचती है उसका तो आंकलन ही नहीं किया जा सकता।
आज यह बात भारत के प्रत्येक मुसलमान को सोचने की जरूरत है कि आखिर क्या कारण है जो उनके समुदाय के लोग देश की ओर से मिलने वाली हर सुविधा के बावजूद गैर इस्लामिक लोगों के प्रति कट्टरता और नफरत का दृष्टिकोण पाल लेते हैं। भारत में मिले सभी अधिकारों के बावजूद क्यों वह विशेष दर्जा रखना चाहते हैं। आखिर बार-बार उनके समान नागरिक-समान आचार संहिता का विरोध करने के पीछे का उद्देश्य क्या है। जबकि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मुस्लिम जनसंख्या वाले देश भारत में उन्हें वो सब अधिकार मिले हुए हैं, जिनकी आवश्यकता एक सुखद समाज के लिए अपरिहार्य है। जिस तरह ओसामा-बिन-लादेन की मृत्यु के बाद से समाचार आ रहे हैं और देश भर में उसके समर्थन में मुस्लिम लोग खड़े हो रहे हैं वो अनायास ही अन्य धर्माम्वलम्बियों के अंदर इस तरह के कई प्रश् खड़े कर रहे हैं। आखिर क्यों भारत में किसी आतंकवादी के मारे जाने पर इतना शोक व्यक्त किया जा रहा है। आतंकवादी या जिहादी का न कोई धर्म होता है, न कोई सकारात्मक विचार दर्शन, उसका उद्देश्य केवल आतंकी साम्राज्‍य की स्थापना ही है।


वैचारिक हत्याओं पर पनपते निर्मम व्यापार ....१

     मध्यप्रदेश विधान सभा के पूर्व सचिव अशोक चतुर्वेदी द्वारा रचित पुस्तक "संसदीय लोकतंत्र और पत्रकारिता" भारतीय परिवेश में निष्पक्ष राजनीति को दिशा देने में महत्वपूर्ण हो सकती है ......बशर्ते पुस्तक का कलेवर पुस्तक से बाहर निकलकर पसर जाय.
      कुव्यवस्थित तंत्र के तीक्ष्ण शरों से बिंध कर अंग-अंग में व्याप्त हुयी देश की पीड़ा का अनुभव कर एक वैचारिक क्रान्ति के प्रयास के लिए निश्चित ही अशोक जी साधुवाद के पात्र हैं. ऐसे दुरूह व नीरस .....किन्तु अपरिहार्य विषयों पर लेखनी को मुखर करना हर किसी के लिए शक्य नहीं हो पाता. अशोक जी की अन्वेषी व सजग दृष्टि से ही यह संभव बन पडा है . काश ! ऐसी ही दृष्टि उन्हें भी मिली होती जो अहर्निश राजनीति में ही डूबे रहते हैं. 
      अपनी पुस्तक में अशोक जी ने भंड-जनादेश को अखंड बनाने के लिए के लिए एक मात्र उपाय के रूप में वैदिक व्यवस्था का अवलंबन प्रस्तुत किया है. हम इसका अर्थ यह निकालते हैं कि वैदिक व्यवस्था आज भी प्रासंगिक है. प्रश्न यह है कि जब अशोक जी जैसे, इसे प्रासंगिक मानने वाले चिन्तक उपलब्ध हैं तो इसके क्रियान्वयन के लिए अवरोध कहाँ पर हैं ? भटकते समाज को दिशा देने के गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वहन जिन धर्माचार्यों को स्व स्फूर्त चेतना से करना चाहिए.....कदाचित ऐसा कर पाने में वे असफल रहे हैं.....और यह अत्यंत शोचनीय विषय है. 
     सामाजिक-राजनीतिक सुधार की तृषा का जन मानस में अभाव भी एक बड़ी समस्या है, इसके अभाव में क्रान्ति की बात सोची भी नहीं जा सकती. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जिस चेतना का निरंतर प्रवाह होते रहना चाहिए वह प्रतिक्षण की सजगता एवं निरंतर परिमार्जन के अनिवार्य संघर्ष के अभाव में संभव नहीं . इसीलिये हम एक वर्ज्य "अव्यवस्थित व्यवस्था" में जीने के लिए बाध्य हो गए हैं . गुणी जनों के सद्विचार, चिंतन और सुझाव Utopiya मात्र बनाकर रह जाते हैं ...यह भी एक कटु सत्य है. तथापि दीपक तो जलते ही रहना चाहिए. 
      मुझे कई बार ऐसा लगा है कि गांधी तो अपनी ह्त्या से पहले ही मर चुके थे. .....और गांधी ही क्यों !  बड़े-बड़े विचारक और मनीषी भी जीते जी ही मर जाया करते हैं. गैलीलियो की चर्च से क्षमा याचना पाखण्ड के सामने विज्ञान की पराजय नहीं अपितु जीते जी उनकी मृत्यु ही थी. मथुरा से कृष्ण का पलायन, जीसस का मृत्युदंड, सुकरात का विषपान और ऐसी ही न जाने कितनी घटनाएँ एक पल में तो नहीं हो जातीं. मानव समाज के इस स्वभाव को भी समझना होगा जो विचारों की तो ह्त्या कर देता है किन्तु विचारक को अस्त्र बना कर अपने लक्ष्य की पूर्ति का साधन बना लेता है. यह मानव चरित्र का अत्यंत विद्रूप पक्ष है. प्रायः मैं इससे बहुत व्यग्र हो उठता हूँ .
     सन २००७ में महिला सरपंच सुखिया बाई उसी कुतंत्र की बलि चढ़ गयी जिसका पूर्वानुमान लगा कर ही डॉक्टर आम्बेडकर ने संविधान सभा में पंचायतों को भ्रष्टाचार, संकीर्णता, दकियानूसी और पिछड़ेपन का पर्याय माना था......तथापि पंचायती राज को "सर्व-जन-हिताय" बनाने के क्रम में निचले पायदान पर राजनीति की पाठशाला प्राम्भ हो चुकी है. नव-जागरण के इस शैशव काल में अधिकार और कर्तव्य के कठिन पाठों को पढ़ते-सीखते कुछ को तो नीव का पत्थर बनना ही होगा. सत्ता के आदर्श विकेंद्रीकरण का लक्ष्य श्रेष्ठ है...पवित्र है ...किन्तु प्रारम्भिक तैयारी के बिना भ्रष्टाचार और कबीला तंत्र में वृद्धि के अतिरिक्त कुछ और मिलने की आशा कम ही है. ओलम सीखे बिना स्नातक होने की कल्पना क्या परिणाम दे सकती है भला ?           ....... क्रमशः  
   

सुपात्र-कुपात्र

रायपुर से प्रकाशित दैनिक भास्कर के आंचलिक पृष्ठ पर पिछले कई महीनों से परलकोट विलेज के एक शिक्षक के बारे में अपने ही स्कूल की छात्राओं से अश्लील कृत्य किये जाने के समाचार प्रकाशित होते रहे हैं ......यह भी प्रकाशित होता रहता है कि गाँव वाले उस शिक्षक को दण्डित किये जाने के लिए आन्दोलन कर चुके हैं.सुपद दास नामक ये गुरुदेव सन १९८८ से परलकोट क्षेत्र की विभिन्न शालाओं में पदस्थ रहे हैं ..छात्राओं से अपनी अश्लील हरकतों के कारण २१ वर्ष की सेवावधि में ८ बार दंड स्वरूप स्थानांतरित होने वाले गुरुदेव सुपद दास ने कदाचित किसी कीर्तिमान की ठान ली है ...और शायद सरकार ने भी कुछ ऐसा ही सोच रखा है. अश्लील कृत्यों का दंड शासन की दृष्टि में केवल स्थानान्तरण ही है. दोनों ही प्रशंसनीय हैं. वाह ....वाह ...वाह ....वाह ...क्या राम राज्य है. आनंद ही आनंद है.
    किन्तु मेरे जैसे लोगों को यह व्यवस्था भी रास नहीं आ रही है. इस उत्त्तम दंड विधान ने मुझे प्राचीन भारतीय परम्पराओं और ऋषि निर्देशों के औचित्य पर विचार करने के लिए पुनः बाध्य कर दिया है. विद्या दान को हमारे देश में सर्वोत्तम दान की प्रतिष्ठा प्राप्त थी. इस प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए दान के सुपात्र-कुपात्र का विचार अपरिहार्य हुआ करता था. पात्रता का यह विचार गुरु और शिष्य दोनों के लिए था. गुरुकुल में प्रवेश लेना जहाँ छात्र के लिए टेढ़ी खीर हुआ करता था वहीं छात्रों को भी यह अधिकार था कि वे सुपरीक्ष्य गुरु से ही विद्या ग्रहण करें. आज यह पात्रता विचार मनुवादी व्यवस्था का अंग मानकर त्याज्य है. विश्वविद्यालयों में ली जाने वाली प्रवेशपूर्व परीक्षाओं के स्वरूप में सुपात्रता का वह सुविचार नहीं है जो प्राचीन महर्षियों का अभिप्रेत था. यही कारण है कि उच्च शिक्षित लोग उत्कोच की आधुनिक निकृष्ट परम्परा के पोषक बन गए हैं...और केवल उत्कोच ही क्यों ...हर प्रकार के भ्रष्टाचार के जनक और पोषक भी तो यही लोग हैं. मंत्रालयों के सचिव हों या न्यायाधीश सभी तो अंग हो गए हैं इन परम्पराओं के .....
     भारत विकास के आंकड़ों के ढेर में दबा एक प्रश्न सुलग रहा है कि शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए  .....मानव सभ्यता पोषक स्वरूप या शोषक स्वरूप ? और सबको ज्ञान की पंजीरी बांटने वाली व्यवस्था के जनकों और व्यवस्थापकों से एक प्रश्न मेरी ओर से भी कि क्या पात्रता के मानदंडों में किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है ? 
     सभ्यता के शीर्ष पर बैठे होने का दावा करने वाली शासन व्यवस्था यदि ज्ञान को यूं ही बांटती रहेगी तो दुष्टों की ज़मात में भी यूं ही कमाल की वृद्धि होती रहेगी.  

कौन कहता है कि अब सुकून है,





      कौन कहता है कि अब सुकून है,


           कौन कहता है कि अब चैन है,
  

    अभी तो बस गिनती हुई शुरू है,
  
           जाने कितने कसाब हैं, जाने कितने लादेन हैं...!!!!!!!!!!!!!!1