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वैचारिक हत्याओं पर पनपते निर्मम व्यापार ......2

     विगत कुछ वर्षों से, लोकतंत्र के रक्षण में लोक व तंत्र के मध्य की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रचार माध्यम अपने उत्तरदायित्व से भटकता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है, तो अब  उत्तरदायित्व का यह भाग भी लोक को ही अपने ऊपर लेना होगा. हिताहित का अन्वीक्षण कर ही "लोक" समर्थ हो सकेगा और तभी वह स्वयं को अपने चारो ओर मंडराते नाना रूपधारी दानवों से बचा सकेगा. सारी बात लोक पर आकर इसीलिए ठहर जाती है क्योंकि अंततः भाग्यविधाता नेताओं और निरंकुश अधिकारियों की तरह ही प्रचार माध्यम के लोग भी तो इसी समाज की उपज हैं. भ्रष्ट शासक की सेवा में रत सेवक कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, उसी का एक अंग बनकर ....या फिर अपंग होकर रह जाता है . इस विषय में नैतिक चरित्र की बात करना भी लोग अव्यावहारिक मानने लगे हैं. भ्रष्टाचार जो इतना फल-फूल रहा है , केवल कुशासकों के ही कारण नहीं है. वह जो क्षीर में नीर की तरह समा गया है, उसमें आमजन की भागीदारी भी कुछ कम नहीं है. कर्तव्यपरायण और निष्ठावान सेवक दुर्लभ होते जा रहे हैं तथापि जो हैं भी , शासन उनके साथ न्याय नहीं कर पाता . किन्तु इसी कारण से यदि वह शिथिल और भ्रष्ट हो जाय तो उसकी निष्ठा और चरित्र पर प्रश्न उठ खड़े होंगे. निष्ठा तो तभी है जब विपरीत परिस्थितियों में भी वह डिगे नहीं ...भले ही टूट क्यों न जाय. मैं ऐसे टूटने को जीवन का श्रेष्ठतम एवं पवित्र उत्सर्ग मानता हूँ. 
    इस गणतांत्रिक ( ? ) देश में कार्यालयीन कार्यपद्यति की विद्रूप भयानकता ने तो दीप जलाने वालों की निष्ठा को मुक्त हो ललकारा है. देश की रचनात्मक ऊर्जा इसी सब से जूझने में व्यर्थ होती जा रही है. प्रतिभा पलायन को रोक पाना इसीलिये तो संभव नहीं हो पा रहा. कार्यालयीन कार्य प्रणाली पर सुसंगठित भ्रष्ट लोगों का पूर्ण आधिपत्य हो गया है. इसे कैसे विस्थाप्तित कर सुप्रणाली सुस्थापित की जाय , यह भी एक ज्वलंत और चुनौती पूर्ण समस्या है. कुतंत्र पीड़ितों को नेक-नेक सी बातों के लिए भी न्यायालय जाना पड़ रहा है....तथापि समस्यायों का कोई अंत नहीं और समाधान का पता नहीं क्योंकि उत्तरदायित्व हीनता का विषाक्त संक्रमण हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था को निगल चुका है. न्यायालयों में नित नए पहुँचने वाले शासन से सम्बंधित प्रकरणों ने शासन को दर्पण दिखाकर असफल व्यवस्था की स्पष्ट घोषणा कर दी है.  आश्चर्य है कि  देश फिर भी चल  रहा है. 
   मुझे इस पर भी आश्चर्य होता है कि इतने बड़े देश के लगभग दो अरब नागरिकों के भाग्य विधाता का गुरुतर भार वहन करने वालों के लिए कोई औपचारिक शिक्षण संस्था खोलने का विचार जन्म तक नहीं ले सका अभी. विकसित, सभ्य एवं तकनीकी क्षमताओं से युक्त इस विशाल समाज की यह भी एक विडम्बना है. नेता और अधिकारी किसी ऐसी पाठशाला से पढ़कर नहीं आते जहां उन्हें सुनीति और राज धर्म की व्यावहारिक शिक्षा दी गयी हो.              

4 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

शिक्षा पर आपका यह दूसरा भाग भी ला-जवाब है।

"कुतंत्र पीड़ितों को नेक-नेक सी बातों के लिए भी न्यायालय जाना पड़ रहा है"

"नेता और अधिकारी किसी ऐसी पाठशाला से पढ़कर नहीं आते जहां उन्हें सुनीति और राज धर्म की व्यावहारिक शिक्षा दी गयी हो."

आशुतोष की कलम ने कहा…

इस शिक्षा ब्यवस्था से मैकाले का तत्व निकले बिना इस दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल है..
वो हमारे देश के कर्णधार होंने नही देंगे...उसके लिए सम्पूर्ण क्रांति आवश्यक होगी जो शस्त्र उठाये बिना असंभव सी प्रतीत होती है

हरीश सिंह ने कहा…

sundar prastuti, vichar karna hoga,

rubi sinha ने कहा…

समसामयिक रचना, जागृत होना होगा,