समर्थक

संविधान मांग लाये


बगिया के फूल सारे जाने किसे बाँट आये 
आबरू के बदले में जाने क्या-क्या माँग लाये /


राम जी का लोक तंत्र कृष्ण का है साम्यवाद 
पायी गणतंत्र की भी वैशाली से ही सौगात /


नीति है विदुर की कौटिल्य का है अर्थशास्त्र
मनु की व्यवस्था ही तो विश्व में हुयी है व्याप्त /


सात फेरे लेने को वो दौड़े आते हैं यहाँ 
और तुम जाके वहाँ सब कुछ भूल आये /


प्रेम परिवार का वो सीखते हैं हमसे आ 
वृद्धाश्रम का ये नया चलन काहे माँग लाये /


प्रेम का सन्देश देके बंधु विश्व को बनाया  
भाईचारे-भाईचारे में है देश को गंवाया / 


पानी से धो लेने में क्या कष्ट होता है तुम्हें 
पिछवाडा पोछने को कागज़ भी माँग लाये /


करने कंगाल हमें जी भर-भर के सबने लूटा 
सोना लूटा, मान लूटा, झूठ बोल वोट लूटा /


जोगी मेरे गाँव का सिद्ध आन गाँव का 
फूलों की तौहीन कर काँटों के ही गीत गा /


झोली भरी छोड़ आये वेदों को बिसार आये 
बदले में दूसरों से जाने क्या-क्या माँग लाये /

ज्ञान है विज्ञान है धर्म है आध्यात्म है फिर भी म्लेच्छ लोगों के 
द्वार-द्वार जाके तुम स्वाभिमान देके काहे संविधान माँग लाये ?




9 टिप्‍पणियां:

किलर झपाटा ने कहा…

झोली भरी छोड़ आये वेदों को बिसार आये
बदले में दूसरों से जाने क्या-क्या माँग लाये

बहुत ही सुन्दरता से बहुत ही बड़ी बात कही कौशलेन्द्र जी। अक्षय तृतीया महापर्व और ब्राह्मणों तथा हिन्दू धर्म के परम आदरणीय परम पूज्यनीय परमगुरू भगवान परशुरामजी की जयंती पर आप सभी को कोटि कोटि शुभकामनायें।

मालिनी गौतम ने कहा…

कौशलेन्द्र जी, इस एक कविता में हमारा वैभवशाली अतीत है, हमारे वर्तमान की विसंगतियाँ हैं, हमारा खोया हुआ स्वाभिमान है जिसे हम तिनके के मोल गिरवी रख आये हैं, कहीं कटाक्ष है तो कहीं खुद पर ही नजर डालने की गुजारिश....यह हर सच्चे देशभक्त के हृदय की पीड़ा है,जिसे आपने शब्दों का जामा पहनाया........बहुत कुछ नहीं बल्कि सब कुछ आपने एक साथ समेट लिया........सुन्दर अभिव्यक्ति......बधाई.......

अब घर की मुर्गी को दाल बराबर समझने से काम नहीं चलेगा......हम तो युग-युगांतर से दूसरों को देनें में समर्थ रहे हैं..........आयातित लोगों के आयातित विचारों की हमें कोई जरूरत नहीं है.......इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है...

आव्हान की जरूरत है......

देश माँगता तुम से निज इतिहास पुराना।
वही स्वर्ण युग, गुप्तकाल का वही जमाना॥

दृढ़ प्रतिज्ञ चाणक्य बने
भारत का हर नर
समय छेड़ दे स्वाभिमान हित
अखिल धरा पर

वही विश्व सम्मान तुम्हें फिर से है पाना।
वही स्वर्ण युग, गुप्तकाल का वही जमाना॥

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

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आशुतोष की कलम ने कहा…

हम अपनी संस्कृति हो हीन समझते हैं और गोरों की संस्कृति का अनुसरण..
जबकि राजनीती और संस्कृति का ककहरा भू उन्होंने यहीं से सिखा..
गर्व से कहो हम हिन्दू हैं..

कौशलेन्द्र ने कहा…

डॉक्टर मालिनी जी ! स्वास्थ्य लाभोपरांत हल्ला मंडली में आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है. आपने रचना की सुखद समीक्षा कर डाली .......सादर आभार !
@ वही विश्व सम्मान तुम्हें फिर से है पाना।
वही स्वर्ण युग, गुप्तकाल का वही जमाना॥
इसीलिये तो हल्ला करके सबको जगाने की चेष्टा की जा रही है ....
निश्चित ही हमें आयातित विचारों या धर्मों की कोई आवश्यकता नहीं...बस केवल जागने की आवश्यकता है.

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

काश नया संविधान बने और आज के ये नेता उसे दूर से ही देखे, फिर से कोई चाणक्य आयेगा लेकिन कब?

गंगाधर ने कहा…

एक बार फिर वैचारिक क्रांति की जरुरत है और उसकी शुरुआत हल्ला बोल ने कर दी है.

नेहा भाटिया ने कहा…

kranti ki jarurat, sahi kaha

स्वाती गुप्ता ♥ श्री राधे ♥ ने कहा…

..•♥•.श्री राधे !!.•♥•.