समर्थक

सुपात्र-कुपात्र

रायपुर से प्रकाशित दैनिक भास्कर के आंचलिक पृष्ठ पर पिछले कई महीनों से परलकोट विलेज के एक शिक्षक के बारे में अपने ही स्कूल की छात्राओं से अश्लील कृत्य किये जाने के समाचार प्रकाशित होते रहे हैं ......यह भी प्रकाशित होता रहता है कि गाँव वाले उस शिक्षक को दण्डित किये जाने के लिए आन्दोलन कर चुके हैं.सुपद दास नामक ये गुरुदेव सन १९८८ से परलकोट क्षेत्र की विभिन्न शालाओं में पदस्थ रहे हैं ..छात्राओं से अपनी अश्लील हरकतों के कारण २१ वर्ष की सेवावधि में ८ बार दंड स्वरूप स्थानांतरित होने वाले गुरुदेव सुपद दास ने कदाचित किसी कीर्तिमान की ठान ली है ...और शायद सरकार ने भी कुछ ऐसा ही सोच रखा है. अश्लील कृत्यों का दंड शासन की दृष्टि में केवल स्थानान्तरण ही है. दोनों ही प्रशंसनीय हैं. वाह ....वाह ...वाह ....वाह ...क्या राम राज्य है. आनंद ही आनंद है.
    किन्तु मेरे जैसे लोगों को यह व्यवस्था भी रास नहीं आ रही है. इस उत्त्तम दंड विधान ने मुझे प्राचीन भारतीय परम्पराओं और ऋषि निर्देशों के औचित्य पर विचार करने के लिए पुनः बाध्य कर दिया है. विद्या दान को हमारे देश में सर्वोत्तम दान की प्रतिष्ठा प्राप्त थी. इस प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए दान के सुपात्र-कुपात्र का विचार अपरिहार्य हुआ करता था. पात्रता का यह विचार गुरु और शिष्य दोनों के लिए था. गुरुकुल में प्रवेश लेना जहाँ छात्र के लिए टेढ़ी खीर हुआ करता था वहीं छात्रों को भी यह अधिकार था कि वे सुपरीक्ष्य गुरु से ही विद्या ग्रहण करें. आज यह पात्रता विचार मनुवादी व्यवस्था का अंग मानकर त्याज्य है. विश्वविद्यालयों में ली जाने वाली प्रवेशपूर्व परीक्षाओं के स्वरूप में सुपात्रता का वह सुविचार नहीं है जो प्राचीन महर्षियों का अभिप्रेत था. यही कारण है कि उच्च शिक्षित लोग उत्कोच की आधुनिक निकृष्ट परम्परा के पोषक बन गए हैं...और केवल उत्कोच ही क्यों ...हर प्रकार के भ्रष्टाचार के जनक और पोषक भी तो यही लोग हैं. मंत्रालयों के सचिव हों या न्यायाधीश सभी तो अंग हो गए हैं इन परम्पराओं के .....
     भारत विकास के आंकड़ों के ढेर में दबा एक प्रश्न सुलग रहा है कि शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए  .....मानव सभ्यता पोषक स्वरूप या शोषक स्वरूप ? और सबको ज्ञान की पंजीरी बांटने वाली व्यवस्था के जनकों और व्यवस्थापकों से एक प्रश्न मेरी ओर से भी कि क्या पात्रता के मानदंडों में किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है ? 
     सभ्यता के शीर्ष पर बैठे होने का दावा करने वाली शासन व्यवस्था यदि ज्ञान को यूं ही बांटती रहेगी तो दुष्टों की ज़मात में भी यूं ही कमाल की वृद्धि होती रहेगी.  

9 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

सटीकता से समस्या पर अंगूली रखी है आपने।
शिक्षा चरित्र का मूल है, और यहाँ मूल में ही भूल है।

विषैले पात्रों में दूध सुरक्षित नहीं रहता।

आशुतोष की कलम ने कहा…

कितनी गहन बात की आप ने..
वर्तमान में मैकाले के पुजारी इसे क्यों नहीं समझते??

Dr. shyam gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर....सटीक व्याख्या....शिक्षा के दूषित होने से ही यह परिस्थिति है....
---एक बात बहुत काल से मेरे संग्यान में आरही है कि...आज़ादी के बाद से ही इस देश में शिक्षा मन्त्री प्राय: ’मुसलमान ही रहे है...जो भारत की वास्तविक सन्स्क्रिति से पूर्णत: अनभिग्य थे...अन्य बाम पन्थी, छद्म-सेक्यूलरवादी, यथास्थित वादी, अन्ग्रेज़ी दां लोगों की भांति ( मैकाले की योज़ना में फ़ंसे ) बस कल ही पैदा हुई गन्गा-जमुनी सन्स्क्रिति को ही सन्स्क्रिति मान बैठे थे ---मुझे लगता है भारतीय सन्स्क्रिति के ह्रास मे यह एक महत्वपूर्ण बिन्दु है....

कौशलेन्द्र ने कहा…

भाई सुज्ञ जी ! आशुतोष जी ! एवं डॉक्टर साहब ! शिक्षा की सर्व सुलभता हमारे देश का एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक पाखण्ड है. हर किसी को ज्ञानवान नहीं बनाया जा सकता . इस सुलभता ने बन्दर के हाथों में कई उस्तुरे पकड़ा दिए हैं. हमारे यहाँ हैं एक बड़े बाबू ......एम. ए. , एल.एल.बी. कई बार डॉक्टर्स को धमकी दे चुके हैं कि यदि उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी ने कोई कार्यवाही की तो वे सवर्ण डॉक्टर्स को हरिजन उत्पीड़न में फंसा देंगे. हम लोग उस बाबू से भयभीत रहते हैं....एक बार प्रयास किया था.....सारे सबूत देने के बाद भी जांच अधिकारी ने डॉक्टर्स के बयानों और प्रमाणों को न मानकर बाबू के बयान को ही सच माना. जांच अधिकारी भी आरक्षित समुदाय से थे. यह दो वर्ष पहले की घटना है. अभी फिर उत्कोच के मामले में गंभीर रूप से मार-पीट हुयी, तीन लोगों के सर फटे . दोषियों के विरुद्ध शासन ने कोई कार्यवाही नहीं की जबकि जिससे आडिट के नाम पर तीस हजाए मांगे गए थे उसे ही सस्पेंड कर दिया गया है. ऐसी शिक्षा कई बार प्रश्न खड़े करती है. हमें गंभीरता से मंथन कर एक आन्दोलन करना होगा. शिक्षा का यह पाखण्ड भ्रष्ट तंत्र के हथियार के अतिरिक्त समाज के किसी काम का नहीं. सम्पूर्ण साक्षरता का अभियान अयोग्य और कुपात्रों पर लादी गयी एक व्यवस्था है जिसका परिणाम भोगने के लिए सारा समाज बाध्य है.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

पति द्वारा क्रूरता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव अपने अनुभवों से तैयार पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में दंड संबंधी भा.दं.संहिता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव विधि आयोग में भेज रहा हूँ.जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के दुरुपयोग और उसे रोके जाने और प्रभावी बनाए जाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए गए हैं. अगर आपने भी अपने आस-पास देखा हो या आप या आपने अपने किसी रिश्तेदार को महिलाओं के हितों में बनाये कानूनों के दुरूपयोग पर परेशान देखकर कोई मन में इन कानून लेकर बदलाव हेतु कोई सुझाव आया हो तब आप भी बताये.

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

इस विषय पर बिल्कुल आपसे सहमत हैं। जो शिक्षा चरित्र निर्माण में सहायक न हो, उसे शिक्षा का दर्जा ही नहीं देना चाहिये।

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

ऐसे महाशय को नरक में भेज दो। दूसरा रास्ता नहीं है।

किलर झपाटा ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,
आपने बिल्कुल सही बात बतलाई।
मेरे खयाल में तो ऐसे दुष्ट जंतुओं को खल-बट्टे मे रखकर अच्छे से कूटना चाहिये, हाँ नहीं तो।

हरीश सिंह ने कहा…

इस विषय पर बिल्कुल आपसे सहमत हैं।