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वैचारिक हत्याओं पर पनपते निर्मम व्यापार ....१

     मध्यप्रदेश विधान सभा के पूर्व सचिव अशोक चतुर्वेदी द्वारा रचित पुस्तक "संसदीय लोकतंत्र और पत्रकारिता" भारतीय परिवेश में निष्पक्ष राजनीति को दिशा देने में महत्वपूर्ण हो सकती है ......बशर्ते पुस्तक का कलेवर पुस्तक से बाहर निकलकर पसर जाय.
      कुव्यवस्थित तंत्र के तीक्ष्ण शरों से बिंध कर अंग-अंग में व्याप्त हुयी देश की पीड़ा का अनुभव कर एक वैचारिक क्रान्ति के प्रयास के लिए निश्चित ही अशोक जी साधुवाद के पात्र हैं. ऐसे दुरूह व नीरस .....किन्तु अपरिहार्य विषयों पर लेखनी को मुखर करना हर किसी के लिए शक्य नहीं हो पाता. अशोक जी की अन्वेषी व सजग दृष्टि से ही यह संभव बन पडा है . काश ! ऐसी ही दृष्टि उन्हें भी मिली होती जो अहर्निश राजनीति में ही डूबे रहते हैं. 
      अपनी पुस्तक में अशोक जी ने भंड-जनादेश को अखंड बनाने के लिए के लिए एक मात्र उपाय के रूप में वैदिक व्यवस्था का अवलंबन प्रस्तुत किया है. हम इसका अर्थ यह निकालते हैं कि वैदिक व्यवस्था आज भी प्रासंगिक है. प्रश्न यह है कि जब अशोक जी जैसे, इसे प्रासंगिक मानने वाले चिन्तक उपलब्ध हैं तो इसके क्रियान्वयन के लिए अवरोध कहाँ पर हैं ? भटकते समाज को दिशा देने के गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वहन जिन धर्माचार्यों को स्व स्फूर्त चेतना से करना चाहिए.....कदाचित ऐसा कर पाने में वे असफल रहे हैं.....और यह अत्यंत शोचनीय विषय है. 
     सामाजिक-राजनीतिक सुधार की तृषा का जन मानस में अभाव भी एक बड़ी समस्या है, इसके अभाव में क्रान्ति की बात सोची भी नहीं जा सकती. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जिस चेतना का निरंतर प्रवाह होते रहना चाहिए वह प्रतिक्षण की सजगता एवं निरंतर परिमार्जन के अनिवार्य संघर्ष के अभाव में संभव नहीं . इसीलिये हम एक वर्ज्य "अव्यवस्थित व्यवस्था" में जीने के लिए बाध्य हो गए हैं . गुणी जनों के सद्विचार, चिंतन और सुझाव Utopiya मात्र बनाकर रह जाते हैं ...यह भी एक कटु सत्य है. तथापि दीपक तो जलते ही रहना चाहिए. 
      मुझे कई बार ऐसा लगा है कि गांधी तो अपनी ह्त्या से पहले ही मर चुके थे. .....और गांधी ही क्यों !  बड़े-बड़े विचारक और मनीषी भी जीते जी ही मर जाया करते हैं. गैलीलियो की चर्च से क्षमा याचना पाखण्ड के सामने विज्ञान की पराजय नहीं अपितु जीते जी उनकी मृत्यु ही थी. मथुरा से कृष्ण का पलायन, जीसस का मृत्युदंड, सुकरात का विषपान और ऐसी ही न जाने कितनी घटनाएँ एक पल में तो नहीं हो जातीं. मानव समाज के इस स्वभाव को भी समझना होगा जो विचारों की तो ह्त्या कर देता है किन्तु विचारक को अस्त्र बना कर अपने लक्ष्य की पूर्ति का साधन बना लेता है. यह मानव चरित्र का अत्यंत विद्रूप पक्ष है. प्रायः मैं इससे बहुत व्यग्र हो उठता हूँ .
     सन २००७ में महिला सरपंच सुखिया बाई उसी कुतंत्र की बलि चढ़ गयी जिसका पूर्वानुमान लगा कर ही डॉक्टर आम्बेडकर ने संविधान सभा में पंचायतों को भ्रष्टाचार, संकीर्णता, दकियानूसी और पिछड़ेपन का पर्याय माना था......तथापि पंचायती राज को "सर्व-जन-हिताय" बनाने के क्रम में निचले पायदान पर राजनीति की पाठशाला प्राम्भ हो चुकी है. नव-जागरण के इस शैशव काल में अधिकार और कर्तव्य के कठिन पाठों को पढ़ते-सीखते कुछ को तो नीव का पत्थर बनना ही होगा. सत्ता के आदर्श विकेंद्रीकरण का लक्ष्य श्रेष्ठ है...पवित्र है ...किन्तु प्रारम्भिक तैयारी के बिना भ्रष्टाचार और कबीला तंत्र में वृद्धि के अतिरिक्त कुछ और मिलने की आशा कम ही है. ओलम सीखे बिना स्नातक होने की कल्पना क्या परिणाम दे सकती है भला ?           ....... क्रमशः  
   

1 टिप्पणी:

आशुतोष की कलम ने कहा…

बहुत सुन्दर ज्ञान..अगली कड़ी का इंतजार रहेगा...