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लोकपाल बिल +अन्ना का आन्दोलन +कमेटी का गठन +बैठकों की शुरुआत = चूँ-चूँ का मुरब्बा

...और अंततः लोकपाल बिल बन गया चूँ-चूँ  का मुरब्बा. बड़ी ही चतुरता से केंद्रीय सरकार ने अन्ना के साथ-साथ पूरे देश को ठग लिया है. यह आज की बिलकुल ताज़ी खबर है. 
     बिल के मसौदों पर कुछ मत भिन्नता के बाद एक सहमति के आसार नज़र आ रहे थे कि शिकार को लेकर गंभीर मत-भिन्नता सामने आ चुकी है. ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब सरकार की सोची-समझी चाल थी. जिस समय अन्ना भूख हड़ताल पर थे पूरे देश में एक जोश सा आ गया था .......सरकार को उस समय अन्ना की बात मानने में ही अपनी भलाई नज़र आयी, पर जैसे हिन्दी सिनेमा का खलनायक अंत तक अपनी दुष्टता से बाज़ नहीं आता उसी तरह सरकार ने अपनी चाल चल ही दी. सरकार को पता है कि भारतीय जन मानस का उबाल थोड़ी देर का होता है .....उबाल के समय कैसे भी थाम लो ...फिर बाद में कौन पूछता है ! और वही हुआ, तत्काल तो जन विरोध को थामने के लिए आनन-फानन में बात मान ली गयी पर जब वास्तविक काम की बात आयी तो प्रारम्भ से ही रोड़ेबाजी शुरू हो गयी. जैसे-तैसे उस अवरोध को पारकर आगे बढे तो अब शिकार को लेकर असहमति का झंडा बुलंद हो गया है. लोकपाल का कोड़ा किस पर नहीं चलेगा इस लाख टके के सवाल पर सत्ता में मंथन हुआ ...और निष्कर्ष निकाला गया कि बड़ी-बड़ी मछलियों को किसी भी तरह इस जाल से मुक्त रखा जाना चाहिए. 
    अब अन्ना को चाहिए कि अपने दल के साथ उस दलदल से बाहर आकर फिर से एक नया आन्दोलन प्रारम्भ करें, क्योंकि यदि लोकपाल बिल की अधिकार सीमा से बड़ी मछलियों को मुक्त रखा गया तो इस बिल का कोई अर्थ नहीं होगा. लोकतंत्र में लोक से बड़ा कोई भी नहीं होना चाहिए. चाहे वह कितना भी बड़ा पदाधिकारी क्यों न हो. सांसदों और प्रधानमंत्री को भी उस बिल की अधिकार सीमा के अंतर्गत होना ही चाहिए. 
      इस पूरे मामले में एक बात ध्यान देने योग्य है...और वह यह कि लोकपाल बिल के निर्माण और फिर उसके क्रियान्वयन के प्रति सरकार की इच्छा शक्ति की पोल खुल चुकी है. इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार में बैठे हमारे माननीय लोग अभी और घोटाले करने पर आमादा हैं. 
     निष्कर्ष यह कि भारत में लोकतंत्र एक छलावा ही सिद्ध होता जा रहा है ...देश की जनता को इसके स्वरूप और विकल्प पर मंथन करना होगा. 
    और चलते-चलते........
   छतीसगढ़ में पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध की गयी जांच में उनके पास से अरबों की अनुपात हीन संपत्ति के प्रमाण सामने आये हैं. अब सरकार उस अनुपातहीन संपत्ति पर आयकर लेने पर विचार कर रही है ......इतना दंड काफी है, अर्थात आयकर ले लेने के बाद प्रकारांतर से उस अवैध संपत्ति को उस अधिकारी की वैध संपत्ति घोषित कर दिया जाएगा . 
    पता नहीं सरकार और हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी अनुपात हीन संपत्तियों को राष्ट्रीय संपत्ति स्वीकार कर राष्ट्र को समर्पित क्यों नहीं कर देना चाहती ?        

5 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

हमें तो पहले से ही अंदेशा था,

Abhishek ने कहा…

मुझे तो शुरू से ही लग रहा था की दल में कुछ काला है. ये अन्ना कांग्रेस के दलालों की ही कठपुतली है. जन आक्रोश और उबाल को ठंडा करने के लिए अन्ना का उपयोग किया गया है. जन आक्रोश के शांत होते ही अन्ना ने पहली १-२ मीटिंगस में ही अपनी असलियत दिखा दी थी जब उसने कांग्रेस की दलालों की बोहोत ही बाते मन ली थी जैसे 1) संयुक्त समिति की पहली ही बैठक में भ्रष्ट जजों और मंत्रियों को निलम्बित नहीं करने की शर्त अण्णा ने मान ली है, 2) दूसरी खबर आज आई है कि अण्णा ने कहा है कि "संसद ही सर्वोच्च है और यदि वह जन-लोकपाल बिल ठुकरा भी दे तो वे स्वीकार कर लेंगे…" 3) लोकपल मंत्रियो और प्रधानमंत्री पर बिना प्रधानमंत्री की इजाजत के कोई कारवाही नहीं करेगा. 4) सुप्रीम कोर्ट के जजों पर लोकपाल कोई कारवाही नहीं करेगा.

बोले तो भ्रष्टाचार के मूल स्रोतों का लोकपाल बिल कुछ नहीं बिगड़ सकता है. अब एक बात तो पक्की है ये बिल केवल जनता के आक्रोश को ठंडा करने के लिए बनाया जा रहा है और इससे भी आम जनता का ही खून चूसा जायेगा जो आजादी से अब तक इन काले अंग्रेजो द्वारा किया जा रहा है.

rubi sinha ने कहा…

स्वामी अग्निवेश जैसे घटिया आदमी के साथ रहने वाले आन्ना से और क्या उम्मीद की जा सकती है.

आशुतोष की कलम ने कहा…

सहमत हूँ कौशलेन्द्र जी..
आना इनके जल में फस गए और दलाली की अग्निवेश जैसों ने..
नहीं तो संसद का विशेष सत्र बुलाकर लोकपाल पास हो सकता था जैसा अन्ना चाहते वैसा

हरीश सिंह ने कहा…

बाल मजदूरी के नाम पर धंधा करने वाले स्वामी अग्निवेश जैसे कायरो से दुरी बनाकर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है.