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युवाओँ के प्रेरणा स्रोत धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द भाग - दो

1897 मेँ भारत वापस आकर स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयोँ को हजारोँ वर्षो के आलस्य को छोडकर नए आत्मविश्वास के साथ भारत को विश्व गुरू बनाने के लिए उठ खडे होने तथा समाज के वंचित वर्गो व स्त्रियोँ को शिक्षित करने और विद्या एवं स्वालम्बन द्वारा उनके उत्थान के माध्यम से देश का उत्थान करने का संदेश दिया । स्वामी विवेकानन्द ने स्वदेश मन्त्र देते हुए कहा -
हे भारत ! तुम यह मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियोँ का आदर्श सीता, सावित्री, दमयन्ती है , मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्वत्यागी उमानाथ शंकर है, मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, धन और जीवन, इन्द्रिय - सुख के लिये, अपने व्यक्तिगत सुख के लिये नहीँ है, मत भूलना कि तुम जन्म से ही ' माता ' के लिये बलिस्वरूप रखे गये गए हो, तुम मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र हैँ, मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, चमार और मेहतर तुम्हारे रक्त हैँ, तुम्हारे भाई हैँ । हे वीर ! साहस का आश्रय लो । गर्व से कहो कि मैँ भारतवासी हूँ और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्रह्मण भारतवासी, चाण्डाल भारतवासी - सब मेरे भाई हैँ । भारतवासी मेरे प्राण हैँ, भारत की देव - देवियाँ मेरे ईश्वर हैँ, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, जवानी की फुलवारी और बुढापे की काशी है । भाई, बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग हैँ, भारत के कल्याण से मेरा कल्याण हैँ, और रात - दिन कहते रहोँ - हे गौरीनाथ ! हे जगदम्बे ! मुझे मनुष्यत्व दो, माँ ! मेरी दुर्बलता और कापुरूषता दूर कर दो । माँ मुझे मनुष्य बना दो ।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने कार्य को दृढ आधार प्रदान करने के लिए 1 मई 1897 को कलकत्ता मेँ ' रामकृष्ण मिशन ' और 9 दिसम्बर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर मेँ ' रामकृष्ण मठ ' की स्थापना की । निवेदिता गर्ल्स स्कूल की स्थापना की गई तथा अनेक पत्रोँ का प्रकाशन एवं साहित्य का सृजन किया गया । उनके अंग्रेज शिष्य कैप्टेन सर्वियर तथा श्रीमती सर्वियर द्वारा स्वामी विवेकानन्द की इच्छानुसार मायावती ( अल्मोडा ) मेँ ' अद्वैत आश्रम ' की स्थापना की गई । स्वामीजी के अनुयायी उनके निर्देशानुसार ' नर सेवा, नारायण सेवा ' के काम मेँ लग गये ।
4 जुलाई 1902 को बेलूर के रामकृष्ण मठ मेँ उन्होँने ध्यान की अवस्था मेँ महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिये । उनका पार्थिव शरीर चला गया, किन्तु अपनी चिर, अमरता का संदेश देने के लिए उनके वे शब्द स्थाई एवं चिर व्याप्त है जो उन्होँने मिस्टर एरिक हैमंड को लन्दन मेँ कहे थे, - ' सम्भवतः यह अच्छा होगा कि मैँ अपने इस शरीर के बाहर निकल आऊं और इसे जीर्ण वस्त्र की भांति उतार फेकूं, किन्तु फिर भी मैँ कार्य करने से रूकूंगा नहीँ । मानव समाज मेँ मैँ तब तक सर्वत्र प्रेरणा प्रदान करता रहूंगा जब तक कि संसार यह भाव आत्मसात न कर लेँ कि वह ईश्वर के साथ एक है । '
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, कवि रविन्द्रनाथ टैगोर और महर्षि अरविन्द घोष जैसे महान व्यक्तियोँ ने धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द को भारत की आत्मा को जाग्रत करने वाला और राष्ट्रवाद के युगनायक के रूप मेँ देखा । भारत सरकार ने भी उनके सम्मान मेँ उनके जन्मदिन 12 जनवरी को ' राष्ट्रीय युवा दिवस ' के नाम से घोषित किया है । स्वामी विवेकानन्द के कुछ अमर संदेश प्रस्तुत है -
* " उतिष्ठित, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत् " - उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये ।
* ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है । सभी जीवन्त ईश्वर है - इस भाव से सबको देखोँ । मनुष्य का अध्ययन करोँ, मनुष्य ही जीवन काव्य है । जगत मेँ जितने ईसा या बुद्ध हुये हैँ, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्यमान है । इस ज्योति को छोड देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीँ रह सकेँगे, मर जायेँगे । तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहोँ ।
* जिसका जो जी चाहे कहे, अपने आप मेँ मस्त रहोँ- दुनियां तुम्हारे पैरोँ तले आ जाएगी, चिन्ता मत करोँ । लोग कहते है - इस पर विश्वास करोँ, उस पर विश्वास करोँ, मैँ कहता हूँ - अपने आप पर विश्वास करोँ । अपने पर विश्वास करोँ - सब शक्ति तुम मेँ है, इसको धारण करोँ और शक्ति जगाओँ - कहो हम कुछ भी कर सकते हैँ ।
* हे मेरे युवक बन्धुगण ! बलवान बनोँ - यहीँ तुम्हारे लिए मेरा उपदेश है । गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्वर्ग के अधिक नजदीक पहुंचोगे । मैने अत्यन्त साहसपूर्वक ये बाते कही है और इनकोँ कहना अत्यावश्यक हैँ, कारण मैँ तुमको प्यार करता हूँ । मैँ जानता हूँ कि कांटा कहाँ चुभता हैँ । मैँने कुछ अनुभव किया है । बलवान शरीर से और मजबूत पुट्ठोँ से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे ।
* मन का विकास करो और उसका संयम करोँ, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो - उससे अतिशीघ्र फल प्राप्ति होगी । यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय । एकाग्रता सीखो और जिस और इच्छा हो, उसका प्रयोग करो । ऐसा करने पर तुम्हे कुछ खोना नहीँ पडेगा ।
* वीरता के साथ आगे बढो । एक दिन या एक वर्ष मे सिद्धी की आशा न रखो । उच्चतम आर्दश पर दृढ रहो । स्थिर रहो । स्वार्थपरता और ईष्या से बचो । आज्ञा-पालन करो । सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे । याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय कुछ भी नही ।
* संसार का इतिहास उन थोडे से व्यक्तियोँ का इतिहास है जिनमेँ आत्मविश्वास था । विश्वास-विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा पर विश्वास - यही उन्नति करने का एकमात्र उपाय है । यदि पुराणो के तेँतीस करोड देवताओँ के ऊपर और विदेशियो ने बीच - बीच मे जिन देवताओँ को तुम्हारे बीच मे घुसा दिया है, उन सब पर तुम्हारा विश्वास हो और अपने आप पर विश्वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नही हो सकते ।
- विश्वजीतसिँह

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुन्दर विचार, स्वामी जी की बातो का मनन करके ही हम सच्चे हिन्दू व सच्चे भारतीय बन सकते हैं.

दीपक बाबा ने कहा…

विश्वजीतसिंह जी, हकदार है आप बधाई के..... बहुत खूबी से अपने विवेकानंद जी के आदर्शों से परिचय करवाया... और आज के परिपेक्ष में स्वामीजी के आदर्शों की परीक्षा की घडी है.

युवा वर्ग के प्रति स्वामी जी को बहुत आशाएं थी... पर ये दुर्भाग्य का विषय है की वर्तमान में युवा पीड़ी ही पथ-भ्रष्ट हो गयी है...... रास्ता दिखाए भी तो कौन?

माना की अन्धकार बहुत है ... पर, लगे रहिये... यूँ ही छोटे छोटे ज्ञान के दिए जलाते रहिये ...... एक दिन ये अन्धकार भी छंट जाएगा.... और

वो सुबह कभी तो आएगी.....
वो सुबह कभी तो आएगी.....

दीर्घतमा ने कहा…

विबेकानंद हमारे प्रेरणा के श्रोत है.