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देसी धन क्यों भयो बिदेसी ?

प्रिय बंधुओ ! कल प्रातःकाल से एक बड़े आन्दोलन का प्रारम्भ होने जा रहा है......भारत के आमआदमी का आन्दोलन....... आन्दोलन की पूर्ण सफलता के लिए ईश्वर से कोटि-कोटि प्रार्थना है. इस अवसर पर बड़ी विनम्रता के साथ आज पूरे देश को समर्पित कर रहा हूँ  यह गीत. इसे तरन्नुम में पढ़ेंगे तो और भी आनंद आयेगा. जय माँ भारती ! ! !    

जुग बीते, तुम मोहें भरमावत /
पर वापस नहिं, धन काहे लावत //

देसी धन क्यों, भयो बिदेसी ?
सकल तंत्र सुनि, भयो कलेसी  //

दे-दे नारे, लोक-लुभावन /
अपने ही घर, धन बरसावत //

पूजित हैं क्यों, भ्रष्ट आचरण ?
नागरपति, क्यों फाँसी धावत ?

काले धन में, तू पारंगत /
अब न करेंगे तेरा स्वागत // 

बजत शंख ध्वनि, दुंदुभि बाजत /
सुनि-सुनि नगर, समर को आवत // 

4 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

सोचना पडेगा इनके बारे में
वैसे मैं आज गया था, आयोजन स्थल पर,

हरीश सिंह ने कहा…

अच्छी रचना

drshyam ने कहा…

कौशलेन्द्रजी जब जब आवत
सुन्दर सुन्दर वचन सुनावत ।

कौशलेन्द्र ने कहा…

क्या बात है ...........डॉक्टर साहब ! बहुत-बहुत धन्यवाद ! ! !