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वे और हम....कविता...डा श्याम गुप्त....

वो दिखाए जारहे हैं ,
टीवी पर, सिनेमा में, उपन्यास , वीडियो गेम्स में -
अपनी महानता,
अपनी राष्ट्र-भक्ति,
अपनी कल्चर,
अपनी शक्ति ||

आदिबासी या निवासी ,
चाहे पूर्व का हो या पश्चिम का ,
उत्तर का या दक्षिण का |
भारत का हो या चीन का हो,
योरोप का हो , अफीकी हो,
कहीं का भी हो ,
जीतता सिर्फ अमेरिकी हीरो है,

मान्यताएं, आस्थाएं, संस्कृति ,
या सामाजिकतायें,
नई हों या पुरानी ,
वे ही हीरो हैं ;
उनके सम्मुख बाकी संसार जीरो है ||

झूठ मक्कारी और दंभ ,
अशौच और पाखण्ड ,
अनैतिकता नग्नता की होड,
रोटी और पैसे की दौड ,में रत-
वे कल्चर्ड हैं ,
बाकी सब अनकल्चर्ड हैं ||

हम परोस रहे हैं यहाँ ,
पिस्टल गोली बन्दूक से युक्त,
हिंसा तांडव नग्नता उन्मुक्त,
विदेशी फ़िल्में सीरियल, उपन्यास ,
कंसर्ट सौंदर्य-प्रतियोगिता नाच ||

हम व्यस्त हैं,
विदेशी नक़ल पर संगीत, अन्त्याक्षरी और-
अंग प्रदर्शनकारी सीरियलों में |
पिज्जा बर्गर मार्केटिंग और-
ब्रांडेड कमीजों में |
होटलों पब केसीनो और मयखानों में |
केम्प फोर्ट,शापर्स स्टॉप , और फोरम, क्रास रोड -
व वेव में समय गुजारने में |
अपनी क्षमता से,
विदेशी कंपनियों को संवारने में ||

हम बेहाल हैं ,
महवे ख्याल हैं,
उनकी अक्ल में, उनकी शक्ल में ,
हम मस्त हैं अभ्यस्त हैं,
उनकी नक़ल में ||

हम लगे हैं,
अपना सब कुछ हारने में,
कान्हा की बांसुरी को,
सस्ते मनोरंजन और-
विदेशी गीतों पर न्योछारने में |
या लकुटी और कामरिया को ,
विदेशी नक़ल पर वारने में ||

7 टिप्‍पणियां:

किलर झपाटा ने कहा…

वाह वाह क्या बढ़िया कटाक्ष किया जी आपने। बहुत शानदार।

drshyam ने कहा…

आपके रोबोट ने थप्पड़ तो नहीं जड़ा झपाटा जी...

आशुतोष की कलम ने कहा…

आदिबासी या निवासी ,
चाहे पूर्व का हो या पश्चिम का ,
उत्तर का या दक्षिण का |
भारत का हो या चीन का हो,
योरोप का हो , अफीकी हो,
कहीं का भी हो ,
जीतता सिर्फ अमेरिकी हीरो है,



गुलाम मानसिकता पर चोट करती पंक्तियाँ..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

कौशलेन्द्र ने कहा…

कुछ भी स्थायी नहीं, न संस्कृति ...न अपसंस्कृति. आज हम अपसंस्कृति के दौर से गुज़र रहे हैं. यही हमारी नियति है. आश्चर्य यही है कि मनुष्य कितना विचित्र प्राणी है कि वह संस्कृति से भी ऊब जाता है ...नवीनता के लिए उसे पसंस्कृति ही अभीष्ट लगती है ! शायद पूरा विश्व कबीला संस्कृति की ओर अग्रसर है...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

एक दम सही और खरा.

drshyam ने कहा…

सभी विद्वतजनों को धन्यवाद..

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एक नियम जो सदा सर्वदा,
स्थिर है, परिवर्तन ही है...