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साथ मरने की कसम खा लो जो खाई जाए..........

वन्दे मातरम बंधुओं,

प्यार सेहरा में रहे या की गुलिस्ताँ में रहे,
प्यार की तान ही सुननी है सुनाई जाए........

चार सू दिखती हैं लाशें यहाँ चलती फिरती,
जो पुर सुकून लगे शैय वो ही दिखाई जाए.........

वाद रुखसत के मेरी मैयत पर,
बड़ी महंगी है कोई चादर ना चड़ाई जाए.......

राह से भटके है जो भाई अपने,
राह पुर अमन की उनको है बताई जाए........

साथ जीने की कसम खाना बड़ा मुश्किल है,
साथ मरने की कसम खा लो जो खाई जाए..........

सरहदों के पार भी रहते तो इन्सां ही हैं,
हुक्मरानों को सिखाओ जो ये बात सिखाई जाए...........
पैसा जन्नत में किसी काम नही आयेगा,
हरेक सौदे पे कमिशन क्यों फिर खाई जाये ...........

विश्व गुरु जबकि रहा दुनियां में मेरा हिन्दोस्तां,
प्यार ओ तहजीब की अलख फिर से जगाई जाए........

संस्कारों पे अपने जो चलेंगे हम सब,
खून की नदी ना फिर धरती पे बहाई जाये.......


हाल बेहाल हुआ नाशाद वतन "दीवाना",
आओ मिल जुल के कोई बात बनाई जाए.........

4 टिप्‍पणियां:

आशुतोष की कलम ने कहा…

राह से भटके है जो भाई अपने,
राह पुर अमन की उनको है बताई जाए.....

राकेश जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
इश्वर आप की लेखनी को प्रखर बनाये

rakesh gupta ने कहा…

वन्दे मातरम आशुतोष जी,
हौसला अफजाई के लिए आपका हार्दिक आभार.

हरीश सिंह ने कहा…

राकेश जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
इश्वर आप की लेखनी को प्रखर बनाये

rakesh gupta ने कहा…

वन्दे मातरम भाई हरीश जी,
हौसला अफजाई के लिए आपका हार्दिक आभार.