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अपनी बात

 सभी सनातन धर्मियों और भारत के राष्ट्रवादी भ्राताओं व भगिनियों ! सभी को सादर नमन ! ! !
                                
                                   आज आप सभी से अपनी बात कहने का मन है .....अस्तु ....
           
प्रिय बंधुओ !  इस देश में निवासरत कोटि-कोटि लोगों की तरह हममें से कोई भी वर्त्तमान व्यवस्था और परिस्थितियों से कदाचित ही ....किंचित भी संतुष्ट हो. परिवर्तन की चाह हर किसी में है. पर परिवर्तन हो कैसे ? ...यही यक्ष प्रश्न है. सत्ताओं से हम अधिक आशा नहीं कर सकते .....कलियुग में जहाँ धर्म के सभी पाद लुप्त हो गए हों ....हमें मंथन करना होगा कि परिवर्तन हो कैसे ?  इससे भी पहले का प्रश्न यह है कि परिवर्तन करेगा कौन ? ...इसका उत्तर स्पष्ट है .....हम करेंगे .....हमारे आपके जैसे राष्ट्रवादी लोग करेंगे. पर कोई भी परिवर्तन इतना सहज नहीं होता. परिवर्तन को दीर्घकालीन तपस्या और बलिदान की अपेक्षा होती है ..हमें इसके लिए कटिबद्ध हो तैयार रहना होगा. 

बहुत पहले समुद्र मंथन हुआ था. समुद्र अप्रिय खारेपन और समस्या की विशालता का प्रतीक है. शोध व रचनात्मक कार्यों में लीन रहने वाले महर्षियों के कार्यों में विध्वंसकारी तत्वों द्वारा किये जाने वाले उपद्रव से उत्पन्न खारेपन का फैलाव जब असहनीय हो गया तो मंथन करना पडा. ध्यान रखियेगा ...मंथन में देव और दैत्य दोनों ही लोगों की सहभागिता रही है ...विध्वंसकारी तत्वों के क्रिया कलापों की अनदेखी नहीं की जा सकती. उनकी शक्ति को किसी दिशा में केन्द्रित करना होगा अन्यथा वे अपनी शक्ति का दुरुपयाग करते रहेंगे. स्पष्ट है कि मैं विरोधियों को भी साथ लेने की बात कर रहा हूँ. हमारे मार्ग में आने वाले मूल अवरोध होने से सहलक्ष्य तो वे ही हैं. जो सुधरा हुआ है उसे क्या सुधारना ? सुधार की आवश्यकता तो वहाँ है जहाँ गड़बड़ी है ...अस्तु हमें अपनी यात्रा अपने सहयोगियों और विरोधियों दोनों को साथ लेकर प्रारम्भ करनी होगी. वर्त्तमान स्थितियां बड़ी ही विषम और विचित्र हैं ....हम चरम आदर्श की कल्पना भर कर सकते हैं ..उसे अपना पैमाना बना सकते हैं ....किन्तु चुनाव तो उसी में से करना है जो हमारे सामने उपलब्ध है . तो हमें अपने से भिन्न विचारधारा के लोगों को अपने आँगन में आमंत्रित करना है और शाश्वत सिद्धांतों से उनका अभिषेक करना है ...यही तो तपस्या है ...यह अभिषेक इतना सरल नहीं है...मान अपमान की सीमाओं से परे जाकर बड़े ही शांत भाव से हमें यह तपस्या करनी होगी. उग्रता का परित्याग करना होगा ...अशालीनता का परित्याग करना होगा .....हमें अपने उच्च आदर्शों के अनुरूप ही अपना आचरण बनाना होगा ...यह व्यक्तिगत तपस्या है और इस मार्ग के अनुयायियों के लिए अनिवार्य है ...हममें से जब भी कोई भटके तो दूसरा उसे सही मार्ग दिखाए ...ऐसी निष्ठा बनानी होगी. 

    यह जो कुछ  हमारे ही बन्धु लोग कहते हैं कि ...."सड़ांध मारते दिमाग वाले लोग"....... "आस्था को वैज्ञानिकता का चोला पहनाकर समाज का बर्बरतापूर्वक शोषण कर रहे हैं" .....वस्तुतः वे स्वयं कुंठित मानसिकता के शिकार हैं..... वे न तो विज्ञान के बारे में जानते हैं और न आध्यात्म के बारे में. हमारी प्राचीन मान्यताओं का कुतर्कों के साथ परिहास उड़ाना कुंठा व अज्ञान का ही द्योतक है ....पर ऐसे ही लोग समाज के लिए और हमारे लिए चुनौती हैं. ऐसे ही लोगों के कारण समाज को घातक दैहिक, दैविक और भौतिक संतापों (रोगों) से मुक्ति नहीं मिल पा रही है. पहले होटल में भोजन करना हेय दृष्टि से देखा जाता था .....आज जब आधुनिकता के अंध प्रवाह में इसका व्याप्तिकरण हो गया है तो इसके उपद्रव सामने आने लगे हैं. तांबे के सिक्के को नदी या किसी जलराशि में डालना ऐसे लोगों के लिए हमारी जड़ मानसिकता का परिचायक है पर यूरोप में जब ताम्र पात्र में जल को रखने के लिए संस्तुति की जाती है तो यही वैज्ञानिकता हो जाती है. अब विदेशों में यह चर्चा होने लगी है कि स्वस्थ्य जीवन के लिए औषधियों की नहीं बल्कि जीवनशैली को बदलने की आवश्यकता है. पश्चिमी देशों में यह प्रमाणित किया जा चुका है कि गाय का मांस मनुष्य के लिए हानिकारक है और गाय का पंचगव्य कैंसररोधी है . ( हमारे द्वारा गाय को दिए जाने वाले चारे के कारण गोमांस में कीटनाशकों और हानिकारक खनिजों की प्रचुर मात्रा पायी गयी है . प्रसंगवश यह भी निवेदन करना चाहूंगा कि माँ का स्वभाव अपनी संतान को स्वास्थ्यकर भोजन देने का होता है. गाय अपने शरीर में पहुंचे हुए हानिकारक तत्वों को अपने मांस में एकत्र कर लेती है पर अपने दुग्ध, मूत्र या शकृत  में स्रवित  नहीं होने देती ...भारतीयों ने इसी कारण उसे माँ का सम्मान  दिया है ) ...कदाचित अब भारत के ये तथाकथित बदलाव ( ? ) चाहने  वाले लोग भी इसे स्वीकार करलें . अभिप्राय यह कि हम आधुनिकता के प्रवाह में जिन आदर्शों और आचरणों का परित्याग करते जा रहे हैं विदेशियों ने उनकी शाश्वतता को पहचान कर उन्हें अपने जीवन में अपनाना प्रारम्भ कर दिया है.  
किंचित विषयांतरण के लिए क्षमा  चाहूंगा. मूल विषय पर आते हैं ....हमें इस मंच को सार्थक बनाने के लिए ...देश को अर्पित करने के लिए अपना कुछ समय देना ही होगा. हमें एक ऐसी वैचारिक क्रान्ति के लिए लोगों को तैयार करना होगा जो भारतीय-राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना में अपनी आहुति दे सकें ....आहुति की कोटि कुछ भी हो सकती है ......और इसके लिए हमें स्वयं का भी परिमार्जन करना होगा. ध्यान रखिये स्वामी विवेकानंद जी का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है .....उनके लक्ष्य तक अभी इस देश को पहुँचना शेष है . आज इस मंच से मैं उन सभी लोगोंका आह्वान करता हूँ और उन्हें सादर आमंत्रित करता हूँ जो ब्लॉग जगत में किसी न किसी रूप में मुझे जानते हैं कि वे अपने परिचितों, सहियोगियों और विरोधियों के साथ इस मंच पर आयें और इस पवित्र यज्ञ में अपने विचारों की आहुति दें. शीघ्र ही प्रबंध मंडल के संशोधित स्वरूप एवं उसके संविधान के बारे में आप सबको अवगत  करा दिया जाएगा.  सविनय ....  आपका अपना - कौशलेन्द्र 
         ॐ शांतिः शान्तिः शान्तिः ! ! !  

3 टिप्‍पणियां:

हरीश सिंह ने कहा…

अति उत्तम विचार, क्या बात कही है आपने, उच्चकोटि चिंतन की आवश्यकता सभी को है. निश्चित रूप से हम कट्टर होकर विचारो में परिवर्तन नहीं ला सकते, हमें निष्ठावान बनना होगा. विवेकानंद के विचारो को आत्मसात करना होगा. आज परिस्थितिया बहुत विकट हो चुकी है. इस मंच का उद्येश्य तभी फलीभूत होगा जब जब विभिन्न विचारधारा के लोंगो को हम अपने विचारो में समाहित कर ले. परिवर्तन लाना बहुत ही कठिन होता है. यह एक ऐसा कार्य है, जिसे एक दिन में पूरा नहीं किया जा सकता, इसके लिए कठिन संघर्ष करना होगा. हमें अपने जज्बातों और भावनाओ पर नियंत्रण रखना होगा. आपकी विचारधारा को हम नमन करते हुए समर्थन करते है. ओम

आशुतोष की कलम ने कहा…

आप के विचारो से प्रभावित एवं समर्थन में हूँ..
अभी जरा व्यस्तता है ७-८ दिन तक..
उसके बाद सक्रिय हो पाउँगा..
जय श्री राम शुभकामनायें

Om Prakash ने कहा…

कौशलेन्द्र जी आपके लेख के लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद, मैं आपसे १०० प्रतिशत सहमत हूँ यही सही तरीका है और सफलता का मूल मंत्र भी.