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हिन्दू मान्यताओं का विरोध - विकास और आधुनिकता का प्रतीक

परिवर्तन प्रकृति की एक अनिवार्य प्रक्रिया है| परिवर्तन की दो दिशाएँ हैं एक ले जाती है विकास की ओर और दूसरी ले जाती है विनाश की ओर| एक दिशा में सृजन होता है तो दूसरी में विघटन | दोनों ही आवश्यक हैं एक दूसरे के लिए. विकास की पराकाष्ठा विनाश का प्रारम्भ है| और विनाश के पश्चात विकास का अंकुरण अनिवार्य . अस्तु विचारक को दोनों स्थितियों पर दृष्टि रखनी होती है,ताकि दिशा को पहचान कर अपने कर्तव्यों का निर्धारण किया जा सके. विचारकों के दो समूह अपने-अपने तर्कों के साथ विकास या विनाश की दिशा में चल पड़ते हैं. हवा किसी भी दिशा में क्यों न बह रही हो,दूसरा समूह अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहता ही है.

आज बहुसंख्य विश्व मानव समुदाय विकास की पराकाष्ठा के उपरांत विनाश के प्रारम्भ की पृष्ठभूमि तैयार करने में जुट गए हैं| विचार बदल रहे हैं,धारणाएं बदल रही हैं ,मान्यताएं बदल रही हैं,मूल्य बदल रहे हैं| परिवर्तन की इस आँधी में हर किसी को अपनी भूमिका निर्धारित करनी होगी| कुछ लोग संस्कृति में निरंतर परिवर्तन चाहते हैं';उन्हें इसका ठहराव स्वीकार नहीं. किन्तु "सांस्कृतिक ठहराव" की उनकी अवधारणा स्वयं में उलझी हुयी है|कुछ शाश्वत सत्य हैं,उनका ठहराव अनिवार्य है|"सांस्कृतिक ठहराव" के विरोध के नाम पर शाश्वत सत्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती |संस्कृति में निरंतर परिमार्जन की बात को स्वीकारा जा सकता है पर उसके मूल्यों में आमूल परिवर्तन
की बात केवल विद्रोह को स्वर देना है जो किसी कुंठा के परिणाम के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता|


इस वैचारिक करवट के अनंतर जहाँ कुछ लोग भारतीय गौरव की रक्षा में लगे हुए हैं वहीं कुछ लोगों ने "यथास्थितिवाद" कहकर इसे अस्वीकार कर दिया है . इन्होंने तय कर लिया है कि उन्हें शाश्वत मूल्यों का हर स्थिति में खंडन करना है,भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को उखाड़ फेकना है ,भारत से जुडी जो भी प्राचीन मान्यताएं हैं उन सभी की धज्जियां उड़ा देनी हैं,क्योंकि वे उनके मूल्यों की परिधि में स्वयं को श्रेष्ठ नहीं बना सके ,क्योंकि वे उन मूल्यों की कठिन परीक्षाओं को उत्तीर्ण नहीं कर सके,.इसलिए वे उस परीक्षा-प्रणाली को बदल देना चाहते हैं,.चाहते हैं कि सारी प्रणालियाँ उनके अनुकूल हों,उनकी क्षमताओं के अनुकूल हों|.बिना किसी उद्यम के उनकी असफलता को ही सफलता स्वीकार कर लेने के अनुकूल हों|वे सुविधाओं के अधिकार में शिथिलता के पक्षधर हैं |

कुछ लोग क्षमता विकास के बिना ही आधुनिक (?) बनना चाहते हैं. इस आधुनिकता के पीछे उनके अपने तर्क हैं. तर्कों के पीछे कुछ विद्रूप हैं,विद्रूपों के पीछे पाखण्ड हैं ,पाखण्ड के पीछे समाज की रूढ़ता है ,और रूढ़ता एक विकृति है . प्रकृति की तरह विकृति भी स्वाभाविक प्रक्रिया है और उसका परिमार्जन किया ही जाना ही चाहिए | परन्तु परिमार्जन के स्थान पर उस सम्पूर्ण मौलिक सोच के प्रति ही विद्रोह कर देना इन तथाकथित आधुनिकों की हठधर्मिता है | उन्हें हमारी प्राचीन परम्पराएं अवैज्ञानिक और बर्बर लगती हैं|.वे परम्पराएं जिनके कारण हम कभी पूरे विश्व में अपनी श्रेष्ठता की ध्वजा फहरा चुके हैं,वे अब पाखण्ड और धर्मांध लोगों के षड्यंत्र के रूप में चिन्हित की जा चुकी हैं| लोगों को परिवर्तन चाहिए ,परिमार्जन नहीं और इसके लिए वे विद्रोह की किसी भी लज्जास्पद और निंदनीय सीमा तक जा सकते हैं| अपने कथन में कुछ विशेष शब्दों के अयुक्तिपूर्वक समावेश के द्वारा विद्वता प्रदर्शित करने का छलपूर्वक हठ,अभद्र शब्दों का प्रयोग,एक वर्ग विशेष को अपमानित करने के लिए सदा अधीरता और हिन्दुओं को अपमानित करने के सभी दूषित उपायों के द्वारा स्वयं को धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करने की पारस्परिक प्रतियोगिता के पीछे हमारी वर्त्तमान शासन व्यवस्था का वरद हस्त किसी से छिपा नहीं है| समानता और सम्मान की भूख ने इन्हें अंधा बना दिया है| हीनता के बोध से ग्रस्त इस वर्ग ने जिसका विरोध करना प्रारम्भ किया है उसी का अपने तरीके से अनुसरण करने की घोषणा भी कर दी है|

जब वे भारतीय "वर्ण" व्यवस्था पर "कुछ बर्बर लोगों की सत्ता की भूख का परिणाम " होने का आरोप लगा रहे होते हैं,"जाति" के विषय पर समाज को बांटने का आरोप लगा रहे होते हैं,ठीक उसी समय वे स्वयं श्रेष्ठ होने के सारे छद्म उपाय अपना रहे होते हैं, और वे ब्राह्मणों और क्षत्रियों के उपनामों को स्वयं धारण कर रहे होते हैं| वे भूल जाते हैं कि वैदिक व्यवस्था गुणात्मक वर्गीकरण की सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है कुछ जाति विशेष के लोगों ने अपने परम्परागत उपनामों का परित्याग कर दिया, क्योंकि वे परम्पराओं के विरोधी हैं|यहाँ तक तो ठीक है पर वे क्षत्रियों और ब्राह्मणों के उपनाम अपनाकर समाज में भ्रम उत्पन्न करने की कूट परम्पराओं को अपना रहे होते हैं. बड़ी ही निर्लज्जतापूर्वक और धूर्ततापूर्वक इन लोगों द्वारा उपाध्याय, चतुर्वेदी, शर्मा, व्यास , अग्निहोत्री, मिश्र, शुक्ल, चौहान, भदौरिया, तोमर , बघेल चंदेल, परिहार आदि उपनाम अपना लिए गए हैं|

आश्चर्य तो तब होता है जब ये तथाकथित विकासवादी समाज में स्वयं के क्षत्रिय या ब्राह्मण होने का भ्रम फैला कर भी आरक्षण का भौतिक लाभ लेने से नहीं चूकते. अर्थात वे वह भी बने रहना चाहते हैं जिससे उन्हें भौतिक लाभ की प्राप्ति होती रह सके . यह अवसरवादिता ही उनके वैचारिक स्तर की पोल खोल देती है .

वर्ग भेद समाज का एक अनिवार्य सत्य है . सभी युगों में ,सभी समाजों में,किसी न किसी नाम से यह वर्ग भेद रहता ही है| जहाँ इसे मिटाने के प्रयास किये गए ,मिटाने वाली वह व्यवस्था ही समाप्त हो गयी| बौद्धिक समानता की मांग करना एक मूर्खतापूर्ण हठ है| बिना पर्याप्त योग्यता के किसी अधिकार विशेष को पाने का हठ आधुनिक विकासवादी सिद्धांत का विद्रूप है. योग्यता को अर्जित करने की तपस्या के मार्ग की सर्व सुलभता उदारवादी विचार है,एक वैदिक परम्परा है ,फिर लोग तप करना क्यों नहीं चाहते ?


शिक्षा, संस्कार और वैचारिक स्तर से तय होती है व्यक्ति की जीवन शैली जो किसी के लिए स्वीकार्य हो सकती है और किसी के लिए अस्वीकार्य.|स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के लिए मूल्यहीन बाध्यता निजी स्वतंत्रता का हरण है. और इस प्रकार की कोई भी बाध्यता केवल और केवल जड़ता का ही प्रतीक है|

वर्ग विहीन समाज की कल्पना करने वाले बुरी तरह असफल हो चुके हैं. पर हमारे देश के कुछ लोग अभी भी इस अवैज्ञानिक कल्पना के साथ किसी स्वप्नलोक में विचरण कर रहे हैं| स्वयं को नास्तिक , धर्म निरपेक्ष और समतावादी घोषित कर देने वाले ये लोग अपनी सारी विद्वता हिन्दू धर्म और ब्राह्मणों को अपमानित करने में लगा देते ,पर अन्य विदेशी धर्मों के समुदाय में पहुंचते ही अपनी सारी शक्ति स्वयं को उनके जैसा प्रदर्शित करने में लेश भी संकोच तक नहीं करते|यह कैसी समानता और धर्म निरपेक्षता है ?हम इस छद्म समानता को अवसरवादिता कहते हैं| भारतीय श्रेष्ठ परम्पराओं का परिहास करते हुए उनका अपमान करने से प्रगतिशीलता नहीं आती |तप करना पड़ता है इसके लिए. आर्ष चिंतन नें तो जन्मना जायते शूद्र ..कर्मणा जायते द्विजः कह कर इस प्रतियोगिता के द्वार हर किसी के लिए खोल दिए हैं|


फिर आर्ष चिंतन को अपमानित करने का कौन सा आधार रह जाता है ? भारत के इतिहास में यत्र-तत्र इसके प्रमाण बिखरे पड़े हैं कि ब्राह्मणों ने वर्ण या जाति को नहीं बल्कि व्यक्ति के कर्म को उसके सम्मान का आधार बनाया है| वाराह और कच्छप में भी गुणों को देख कर उसे अवतार स्वीकार करने की हमारी श्रेष्ठ परम्परा में जड़ता कहाँ दिखाई दे रही है लोगों को ? वर्ण तो आगे बढ़ने का मार्ग बताता है, यह बताता है कि अभी तुम्हें और भी आगे जाना है|तुम्हारा लक्ष्य पूरा नहीं हुआ अभी. यह दुर्भाग्य है हमारा कि हमारे ही बीच के लोग हमारी श्रेष्ठ परम्पराओं की जड़ें खोदने में लगे हुए हैं. ईश्वर सद्बुद्धि दे उन्हें|








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