समर्थक

साजिश ? मुंबई विस्फोट और कांग्रेस सरकार की सुप्रीम कोर्ट में एस. आई. टी. के खिलाफ याचिका ::: एक गहरा सम्बन्ध....


13 जुलाई को मुंबई विस्फोट के ठीक अगले ही दिन   14 जुलाई को कांग्रेस सरकार की चुपचाप सुप्रीम कोर्ट में काले धन के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका ????????

क्या इसमें कोई बहुत गहरा राज छुपा हो सकता है ?? क्या यह कांग्रेस की कोई साजिश है ???

जी हाँ !  यदि ये याचिका किसी भी सामान्य माहौल में होती तो पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ी खबर बनती . पूरे देश की मीडिया इस खबर को देश की जनता को दिखाते और किसी भी टीवी के टाक शो में कांग्रेस के प्रवक्ताओ के पास इसका कोई जबाब भी नहीं होता .. क्योंकि एक तरफ मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी कहते है कि कालेधन के मामले से सरकार बहुत गंभीर है और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट से अपील कर रहे है कि वो इस मामले की जाँच ही ना करे ?? 


जी हाँ ! मै इस देश की सभी जाँच एजेंशियो से अपील करता हूँ कि वो इस दिशा में भी अपनी जाँच करे ..
     जब पूरा देश मातम मना रहा था तब कांग्रेस के कोर ग्रुप की मीटिंग चल रही थी .. मुंबई विस्फोट के सम्बन्ध में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कालेधन पर बहुत सख्त रुख अपनाया है और एस आई टी के गठन का एलान किया है उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका को लेकर चल रही थी . सरकार ने तर्क दिया है कि न्यायपालिका कार्यपालिका के काम में दखल दे रही है .. वाह ! ....सरकार का तर्क लाजबाब है .. सुप्रीम कोर्ट संबिधान के तहत ही एस आई टी का गठन करता है .. संबिधान में सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार दिया गया है कि यदि वो किसी भी केस की जाँच से संतुष्ट ना हो तो वो अपने निगरानी में एस आई टी का गठन कर सकता है .. और ये प्रक्रिया संबिधान के अनुसार ही होती है ये किसी के काम में दखल नहीं है ..और ये कोई पहली बार नहीं है जब किसी मामले की जाँच सुप्रीम कोर्ट ने SIT से करवाई हो . यदि कालेधन के मामले एस आई टी के  गठन में कांग्रेस सरकार को गलत लगता है तो केंद्र की कांग्रेस सरकार खुद ही क्यो सुप्रीम कोर्ट से अपील करती है  कि वो सोहराबुद्दीन एन्काउंटर , इशरतजहां  केस और गुजरात दंगे की जाँच SIT से करवाए ?? क्या तब गलत नहीं है ? 
    मित्रों , पूरा देश जानता है कि सरकार सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है जैसे दिल्ली में मदनी और अरुंधती राय को जो कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा खुलेआम बता सकते है ... अफजल और कसाब को कांग्रेस पना दामाद बना कर रख सकती है .. आप सरकारी खजाने को खुलेआम लूट सकते है [ बशर्ते महारानी को उसका हिस्सा आप देदे ] लेकिन काले धन औरभ्रष्टाचार के खिलाफ आप कुछ नहीं बोल सकते .....और इतना ही नहीं  सरकार ने रामलीला मैदान में हैवानियत और बर्बरता दिखाकर देश की  जनता को सन्देश भी दे दिया है कि जो भी कालेधन की  बात करेगा उसे जिन्दा नहीं छोड़ा जायेगा .. आखिर सरकार को एस आई टी से आपात्ति क्यो है ?? मेरा कांग्रेस और केंद्र सरकार से निम्न सवाल है :: 
१- आज तक तेरह मामलो में सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के लिए एस आई टी का गठन किया है यहाँ तक की टेलिकॉम घोटाले की जाँच भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT कर रही है तब सरकार को आपति नहीं होती तो काले धन पर ही क्यों होती है ?? आखिर सरकार इस देश के किस बड़े परिवार का नाम सामने आने से डरती है ?? 
२- हसन अली पर २००६ में केस दर्ज होता है फिर जब सुप्रीम कोर्ट सख्त होता है तो उसे २०११ में गिरफ्तार किया जाता है और ३ दिन में रिहा कर दिया जाता है और जमानत का आदेश देने वाले जज तहिलयानी को ४ दिन में ही प्रोमोशन दे दिया जाता है ? इसके पीछे कौन है ?? 
३- हसन अली की बीबी ने इटली के माफियाओ से अपने और हसन अली के जान को खतरा बताया है .. आखिर इटली के ही माफिया क्यों ?? कालेधन और इटली से क्या सम्बन्ध है ?? क्या सरकार इसी बात से डर रही है कि कही कालेधन और इटली से सम्बन्ध देश के सामने ना आ जाये ?? 
४- क्या सरकार दुःख की इस घडी में इस याचिका को बाद में नहीं दाखिल कर सकती थी ?? जबकि सरकार के पास तीन महीने का समय था ..फिर विस्फोट के अगले ही दिन क्यों ?? 
५- देश की जनता का ध्यान हर बार किसी न किसी तरह कालेधन और भ्रष्टाचार से क्यों बटा दिया जाता है ?? कभी रामलीला मैदान में हैवानियत की जाती है तो क्या ये बम विस्फोट भी रामलीला मैदान के आगे का क्लाइमेक्स है ??  
६- इस देश के इतिहास में कभी भी किसी प्रधानमंत्री को कोर्ट में हलफनामा नहीं देना पड़ा [ मनमोहन को सीवीसी के मामले में देना पड़ा ]आज तक किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इतनी सख्त और गंभीर टिप्पणी    नहीं की थी जैसा उसने काले धन पर किया .. और न ही कभी इतने बड़े पैमाने पर और इतने सदस्यों वाली SIT की गठन की थी . [ इसमें देश के सभी महत्पूर्ण संस्थाओ के प्रमुखों को इसका सदस्य बनाया गया है ] क्या इसी बात से सरकार को डर सताने लगा कि वो अब किसी भी कीमत पर उस शक्तिशाली परिवार का नाम नहीं बचा सकती ?? जी हाँ ! मित्रों ये कही ना कही इस देश के लोगो के मन में आ रहा है .. कि सरकार ने इतनी चुपके से और इसी वक्त क्यो ये याचिका दायर किया ?? ये बम विस्फोट क्या इस याचिका के दायर होने का इन्तेजार कर रहा था या ये याचिका इस बम विस्फोट का इंतजार कर रही थी ???  इतना तो जरूर है कि कोई किसी का इंतजार तो जरूर कर रहा था आखिर इस देश के "राजपरिवार " को जो बचाना है ! !

4 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

बेशक ! एक गहरी साजिश .......पूरे देश के लिए चिंतनीय विषय .......सत्तामद में मदांध हो गए हैं सब.
आँखें खुली रखिये सभी लोग .....और याद भी रखिये ....वरना पछताने से भी कुछ नहीं होने वाला ..........

Abhishek ने कहा…

इस्लामाबाद।। लाहौर में सिख समुदाय को एक गुरुद्वारे में धार्मिक समारोह मनाने से रोक दिया गया। एक धार्मिक समूह ने अधिकारियों को यह समझा दिया कि मुस्लिमों के पवित्र दिन ' शब-ए- बरात ' को मनाना सिख समारोह से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

द एक्सपेस ट्रिब्यून में छपी खबर के अनुसार, बरेलवी समूह के प्रयासों के कारण सिखों के संगीत यंत्रों को बाहर फेंक दिया गया और और अनुयायियों को गुरुद्वारे में प्रवेश करने से रोक दिया गया। पुलिस को गुरूद्वारे के बाहर तैनात कर दिया गया ताकि वे शब ए बरात से पहले धामिर्क समारोह नहीं मना पाए।

सिख समुदाय 18वीं शताब्दी के एक संत की याद में एक समारोह का आयोजन करना चाह रहे थे। लाहौर के नौलखा बाजार में गुरुद्वारा शहीद भाई तारू सिंह सिख संत की याद में बनवाया गया था। सिख संत को 1745 में पंजाब के क्षत्रप जकरिया खान के आदेश पर फांसी पर चढ़ा दिया गया था। प्रत्येक जुलाई में सिख उनकी शाहदत की बरसी के मौके पर धार्मिक समारोह मनाते हैं।

हालांकि, विभाजन के बाद गुरुद्वारे पर खाली की गई संपत्ति की निगरानी करने वाले बोर्ड का नियंत्रण हो गया था, सिखों को कुछ प्रतिबंधों के साथ इसका उपयोग करने की इजाजत दे दी गई थी। चार साल पहले दावत-ए-इस्लामी ने दावा किया था कि गुरुद्वारा 15वीं शताब्दी के मुस्लिम संत पीर शाह काकू की मजार स्थल पर बनाया गया है। अखबार की खबर के अनुसार, समूह ने दावा किया कि काकू बाबा फरीदुद्दीन गंजशक्कर के पौत्र थे।

समूह के इस दावे को अखबार ने अनुचित दावा बताया कि क्योंकि गंजशक्कर का निधन 1280 में हुआ था जबकि काकू का निधन उसके करीब 200 साल बाद 1477 में हुआ था। सिख समुदाय ने गुरुद्वारे का नियंत्रण रखने वाले बोर्ड से संपर्क किया। बोर्ड ने दोनों समुदायों को अपनी मान्यताओं के अनुसार गुरुद्वारे में अपनी धार्मिक परंपराएं निभाने का मौका दे दिया। दावत-ए-इस्लामी प्रत्येक बृहस्पतिवार को दुआ करने के लिए इस स्थल का इस्तेमाल करता है, जबकि सिख साल में एक बार तारू सिंह की शहादत पर इसका प्रयोग करते हैं।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9258938.cms

हरीश सिंह ने कहा…

देशद्रोही केंद्र सरकार सिर्फ इसाईयत और इस्लाम को बढ़ावा देने में लगी है, यदि हिन्दू नहीं जागा तो एक दिन यहाँ मुसलमानों की संख्या अधिक होगी, हम अल्पसंख्यक होंगे और धीरे धीरे हिन्दुओ का यहाँ भी वही हाल होगा जो पाकिस्तान में हो रहा है. कश्मीर इसका उदाहरण है.

हरीश सिंह ने कहा…

विचारणीय मुद्दे प्रस्तुत किये हैं आपने.