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"धर्मनिरपेक्षता" -- एक घातक विष

 धर्मनिरपेक्षता   ...एक हानिकारक विचार

प्रिय बंधुओ ! आज हम धर्मनिरपेक्षता की छद्मता पर चिंतन करेंगे, किन्तु इससे पूर्व एक शुभ समाचार नेपाल से,"हिन्दू शिव सेना" के गठन के साथ ही नेपाल ने एक बार फिर हिन्दूराष्ट्र के चिंतन के स्वर प्रखर कर दिए हैं. राजशाही के अवसान के साथ ही विश्व का एक मात्र घोषित "हिन्दूराष्ट्र" इतिहास का एक अध्याय बन गया. परन्तु वहाँ के लोगों ने इसे इतिहास न बनने देने के प्रति अपना संकल्प व्यक्त किया है . नेपाल की हिन्दू जनता को मेरी कोटि-कोटि शुभकामनाएं |


हमारे देश के कर्णधारों ने भारत के इतिहास, संस्कृति और गौरव की उपेक्षा करते हुए भारतीय समाज को विषकन्या की तरह पोषित करने के उद्देश्य से उसे "धर्मनिरपेक्षता" नामक एक घातक विष का पान कराया जाना सर्वसम्मति से स्वीकार किया था | मैं इसे विष ही कहता हूँ, एक मंदविष, जो मृत्यु नहीं देता, जीने भी नहीं देता; जीवन भर रक्तपान का साधन भर उपलब्ध कराता है. मैं पूरे संकल्प के साथ यह घोषित करता हूँ कि विश्व का कोई भी व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता , इक्कीसवीं शताब्दी के इस वैज्ञानिक युग में इससे बड़ा असत्य कदाचित ही कोई दूसरा हो जो इतनी सरलता से जनमान्य हो गया हो |
हमारी धर्म की अवधारणा अत्यंत विशद और स्पष्ट है |

कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में कई धर्मों का पालन करने के लिए नैसर्गिक रूप से बाध्य होता है . भौतिक संसार में भौतिक पदार्थों के साहचर्य में रहते हुए हम धर्म निरपेक्ष रह ही नहीं सकते | कोई भी नहीं रह सकता. हर पदार्थ अपने नैसर्गिक गुणों के साथ उसके अपने धर्मानुशीलन की अपेक्षा करता है जिसकी उपेक्षा असंभव है |

अपने पूरे जीवन में ही देखिये बाल-धर्म से प्रारम्भ कर छात्र-धर्म, गृहस्थ-धर्म, राष्ट्र-धर्म, समाज धर्म...किस-किस का पालन नहीं करना पड़ता है हमें ! कोई भी व्यक्ति इनसे निरपेक्ष कैसे रह सकता है | इनकी उपेक्षा कैसे कर सकता है ?

वस्तुतः धर्मनिरपेक्ष शब्द भारतीय एकता, समग्रता, राष्ट्रवाद और भारत की चारित्रिक उत्कृष्टता को नष्ट करने के साथ-साथ वैज्ञानिक सनातन-धर्म पर कुठाराघात करने के लिए गढ़ा गया एक छद्म शब्द है जो भारत पर यूरोपीय प्रभुत्व को चिरकाल तक बनाये रखने के लिए है. यह थोपा हुआ शब्द और इसका कोई भी मंतव्य हमें किंचित भी स्वीकार्य नहीं है. हमें वह कोई भी सिद्धांत स्वीकार नहीं है जो भारत के सांस्कृतिक गौरव और चरित्र को पदावनत कर शोषण का पथ प्रशस्त करे |

बंधुओ ! सर्वधर्म समभाव के लिए ही तो भारत में विश्वबंधुत्व की अवधारणा प्रतिष्ठित हुयी थी. यह अवधारणा तो विश्व के सभी धर्मों की स्वतंत्रता की स्पष्ट पक्षधर है, देश के राजनीतिज्ञों को अब और क्या चाहिए जो इससे भी अधिक स्पष्ट हो,इससे भी अधिक उत्कृष्ट हो ? हमें किसी और अवधारणा, किसी और सिद्धांत की कोई आवश्यकता नहीं. जब यह छद्म सिद्धांत नहीं था तब क्या भारत ने किसी धर्म या किसी राष्ट्र के अस्तित्व पर कभी कोई उंगली उठायी ? किसी को पराभूत करने का प्रयास किया ? किसी को पद दलित किया ? तब देश के स्वतन्त्र होते ही ऐसी क्या विवशता उत्पन्न हो गयी कि अपने विश्वबंधुत्व के सिद्धांत को तिलांजलि देकर इस छद्म सिद्धांत को अपनाने की आवश्यकता आ पड़ी ?

अब यह वैचारिक जुगाली का समय नहीं है  | हमें कुछ स्पष्ट निर्णय लेने होंगे अन्यथा विश्व की अनेकों लुप्त हो चुकी संस्कृतियों में एक संस्कृति का नाम और भी जुड़ जाएगा | आगामी चुनावों में हमें अपनी बात पूरे आत्मविश्वास और संकल्प के साथ रखनी होगी |

2 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

कौशलेन्द्र जी,

हिन्दु संस्कृति और भारतीय श्रेष्ठ विचारधारा को समाप्तप्राय: करने के उद्देश्य से गढा गया एक सोचा समझा दूरपरिणामी षड़यन्त्र है 'धर्म-निरपेक्षता'

दिखावटी समानता में से हिन्दु-द्वेष को चुन चुन कर प्रकट करने वाले विद्वान सुरेश चिपलूनकर जी इस 'धर्म-निरपेक्षता' को 'शर्म-निरपेक्षता' कहते है। यह शब्दारोपण सार्थक और अर्थ-गम्भीर है। हर संस्कारशील हिन्दु यदि धर्मनिरपेक्षता के दुष्परिणामो को समझ जाय तो इस षड़यंत्र को निष्फल किया जा सकता है।

सुज्ञ ने कहा…

कईं दिग्भ्रमित हिंदु भी इस धर्मनिरपेक्षता को समानतावादी समझते है जबकि यह अपने पैदाईशी ही हिन्दु-द्वेष पर आधारित है। वे मानते है सारे साम्प्रदायिक विवादों का इस धर्मनिरपेक्षता से निवारण होगा। पर भेदभावपूर्ण मंशा के परिणाम स्वरूप उत्पन्न यह धर्मनिरपेक्षता स्वयं साम्प्रदायिक विवादों के बीज बोती है।

अच्छा बुरा एक भाव बेचने वाली यह विचारधारा, मूर्खता से कार्बन तत्व के कारण हीरे व कोयले के मूल्य में अन्तर नहीं करती।

समानता के नाम पर हिन्दु-संस्कृति,और श्रेष्ठ आचार विचारों को महत्वहीन करने का यह प्रयोजन है। सदाचार और अनाचार को साथ बिठानें और सदाचार की उपयोगिता खत्म करने का अनैतिक प्रयास है धर्मनिरपेक्षता। जड़ बुद्धि से ऐसा समानता का झंड़ा अनाचार को आश्रय देने कुत्सित मानसिकता से उठाया जाता है। इसीलिए यह शर्मनिरपेक्षता है। क्योंकि ऐसी दुर्भावनाओं में जी कर भी उन्हें रत्तिभर शर्म नहीं आती।