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मेकाले का स्वप्न अब भी ढल रहा है---नए रूप में ....हम कब समझेंगे .ड़ा श्याम गुप्त



....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
पिज्जा हट, केप्यूचिनो -काफी, विदेशी डिशों से सजे -- हाइपर सिटी , फेन-माल... माल संस्कृति का प्रचार..... जस्ट डांस, डांस इंडिया डांस, डांस-डांस , कौन बनेगा करोडपति.......आदि से नग्नता व धन लोलुपता का बाज़ार...... नंगे पन के टी वी सीरियल,....बदन- दिखाती हुईं तारिकाएं...... व नंगे होते हुए हीरो,....... नग्नता से भरपूर फ़िल्में ..... हेरी-पोटर के मूर्खतापूर्ण ..उपन्यास व चल-चित्र ....... महिला-उत्थान का नकली चेहरा....महिलाओं के सभी क्षेत्रों में दिन व रात रात भर कार्य-संस्कृति व ..उसकी आड में वैश्यावृत्ति का फैलता हुआ ख़ूबसूरत धंधा .... ब्रांडेड कमीज़-पेंट व दैनिक उपयोग के सामान की भोगी संस्कृति ..... तरह तरह के कारों के माडलों की भारत में उपलब्धिता...... विदेशी कंपनियों द्वारा स्व-हित में खूब-मोटी मोटी पगार...... फिर महंगे होटलों में खाना रहना, व विदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रलोभन..... आसानी से मिलने वाले क़र्ज़.......सस्ती विदेश यात्रा के आफर.......... चमचमाते हुए हाई-टेक आवासों के विज्ञापन..... महंगी व विदेशी होती शिक्षा .... भारतीय संस्कृति व रीति-रिवाजों को गाली देता भारतीय युवक......भारतीय व -पुरातन सब पिछडा है , पुराण पंथी है, आउट डेटेड है..कहता हुआ विदेशी कल्चर में ढला नव-युवा ....मारधाड वाले अंग्रेज़ी 

पिक्चरों , वीडियो- गेम्स के पीछे बिगडते हुए बच्चे .... अर्ध नग्नता के कपडे पहने ..तेजी से माल, शापिंग सेंटरों, सड़कों, बाजारों, आफिसों में मोबाइल पर लगातार बात करती लडकियां .......


ये सब उसी निम्नांकित पुराने उद्देश्य -------


की पूर्ति हित- के नवीन हथकंडे हैं...... हम कब समझेंगे...?????????

7 टिप्‍पणियां:

हरीश सिंह ने कहा…

nahi samjhenge.

abhishek1502 ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
abhishek1502 ने कहा…

ye samaj me cancer ki tarha fail gaya hai.
jaab sochta hu to apne ko aasahay pata hu .
behad kam log hi jagrat hai

कौशलेन्द्र ने कहा…

पराई थाली के भोजन के प्रति आकर्षण किसी सामान्य व्यक्ति का एक सहज मानवीय स्वभाव है/...किन्तु समाज के विशिष्ट लोगों का भी यह स्वभाव बन जाय तो यह उस समाज का दुर्भाग्य ही है. इस मामले में अपनी तमाम उच्च विरासतों के बावजूद हम अति दुर्भाग्यशाली रहे हैं. जहां तक मैकाले का प्रश्न है मुझे लगता है कि विश्व इतिहास में किसी भी संस्कृति को दीर्घकालिक और इतने बड़े पैमाने पर नष्ट करने का कलंक मैकाले के अतिरिक्त और किसी को नहीं जाता. उसे मानवता और संस्कृति का घोरशत्रु माना जाना चाहिए. तथापि यदि मैकाले को छोड़ दें तो हमारी नयी पीढियां भी विवेकहीन ही प्रमाणित हो रही हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक हम ब्रिटेन की तरह नैतिक-सामाजिक पतन के गर्त में नहीं चले जायेंगे तब तक कोई सुधार संभव नहीं होगा. बिन ब्याही माताओं और अवैध संतानों की बहुलता वाले देश -ब्रिटेन की राह पर चल रहे हैं हम. मैकाले अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल हुआ है. और हम बुरी तरह असफल. हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारी नयी पीढी को सद्बुद्धि दे.

drshyam ने कहा…

सही विश्लेषण है कौशलेन्द्र जी.....परन्तु एक बात यह भी है कि इसके लिए शायद हमारी( वर्तामान् प्रौढ़ व आजादी के एक दम बाद की पीढ़ी भी काफी हद तक जिम्मेदार है..क्योंकि हम स्वयं अपने खाने-पीने व स्वतन्त्रता के फल, सुख-साधन बटोरने के चक्कर में..भविष्य की पीढ़ी के सामने कोई उत्कृष्ट राष्ट्रवाद, उच्च आदर्श व संस्कृति और इतिहास के उदाहरण नहीं रख पाए....

drshyam ने कहा…

--और आज भी हममें से अधिकाँश माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को उपरोक्त सब करते देख कर आधुनिकता से चकाचौंध व प्रसन्न होते है और स्वयं भी वह सब करने का प्रयत्न करते हैं....

किलर झपाटा ने कहा…

बहुत सही आकलन किया है आपने। ये सनक अब हमारी पूरी अवाम पर सवार हो गई है। धोबी पछाड़ के बिना मानेंगे नहीं ये लोग।