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हिन्दू स्थान में हिन्दुओं की तारीफ़ गवारा नहीं मज़लिस ए शूरा को


धर्मांध जड़ता के शिकार मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी


चार के मुकाबले नौ लोगों की धर्मांध जड़ता के शिकार हुए दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी|गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ़ करने के कारण उत्तरप्रदेश के मुसलमानों के रहनुमाओं ने मज़लिस ए शूरा की बैठक में दारुल उलूम के कुलपति वस्तानवी को उनके पद से हटा कर एक बार फिर अपनी कट्टरता का परिचय दे दिया है. क्या इसे उनकी ओर से एक खुला ऐलान माना जाय कि उन्हें भारत में रहने वाले किसी हिन्दू की तारीफ़ किसी मुसलमान द्वारा किया जाना पसंद नहीं ? आखिर क्या वज़ह है कि वस्तानवी पर लगाए गए आरोप सिद्ध न होने पर भी उन्हें पद से हटा दिया गया ? अब कोई धर्म निरपेक्ष व्यक्ति इस प्रकरण पर क्या तर्क देगा ?



यदि वस्तानवी को हटाये जाने का कारण उनके द्वारा मोदी की तारीफ़ किया जाना था तो क्या यह विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण नहीं है ? दारुल उलूम ने क्या कभी अफ़ज़ल गुरू और कसाब के प्रकरण पर कोई बैठक की ? तथाकथित सेक्युलर लोग कया इन बातों के ज़वाब दे सकेंगे ? हमें ज़वाब चाहिए


आरोपों की जाँच करने वाली तीन सदस्यीय टीम द्वारा दिए गए निष्कर्ष और नौ के मुकाबले चार लोगों द्वारा वस्तानवी के पक्ष में दिए गए मत यह राहत देने वाले हैं कि हर मुसलमान सत्य का विरोधी नहीं है भले ही वे अल्प मत में क्यों न हों .

3 टिप्‍पणियां:

drshyam ने कहा…

यह मुस्लिमों का वह आतंकवादी चेहरा है जो अन्य सेक्यूलर मुस्लिमों की व अपनी कौम की भी बदनामी कराते हैं...

आशुतोष की कलम ने कहा…

मुझे लगता है की कुछ लोग कभी सुधरने वाले नहीं है..
जो ऐसा कर रहें हैं उनकी जगह पाकिस्तान में हैं न की हिन्दुस्थान में..

कौशलेन्द्र ने कहा…

आशुतोष भाई ! सुर-असुर का संघर्ष तो हर युग में होता रहा है....वास्तव में इन असुरों की असली जगह भारत में तो नहीं ही है .......इन्हें किसी टापू में जाकर बस जाना चाहिए या फिर सीधे मक्का- मदीना में. वहीं मोहम्मद की खिदमत करते रहें. आज सुना है कि सिमी ने अपना नाम बदलकर सिम रख लिया है. कुछ मोहम्मद लोग रायपुर में भी पकडे गए हैं...उनसे बड़े-बड़े रहस्य उजागर हो रहे हैं. सबसे दुखद रहस्य यह है कि उच्च शिक्षित लोग भी मोहम्मद बन रहे हैं जिनमें युवतियां भी शामिल हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि आधुनिक शिक्षा संस्कार दे पाने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुयी है. यह पूरे समाज के लिए एक चिंतनीय विषय है. नुसरुल ईमान मोहम्मदों को जगाने का एक पुनीत कार्य कर रहे हैं पर उनकी कोई सुने तब न !