समर्थक

एक हिंदू को अपनी धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने से क्या लाभ ......!

   

कहने की बात नहीं है,

हिंदुओं में विद्वानों की कमी नहीं है .

हिदू बड़े बड़े डाक्टर , इंजिनिअर , वज्ञानिक , I A S, ओर देश विदेश में हैं.

पुरे हिंदू रीती रिवाजों का पालन करते हैं.

पर जब हिंदू शाश्त्र पढ़ने की बात आती है ,
तो कहेते हैं इसकी क्या आवश्यकता , यानि अपने सांसारिक पढ़आई के लिए तो उन्हें १२+३+२+३= २० साल , रोज ८ से १० घंटे पढ़ना पड़ा .

मगर हिंदू का ज्ञान तो उन्हें बिना पढ़ए , अपने आप हो गया !

यानि वो लोग जो हिंदू शाश्त्र पढ़ते हैं वो तो सनकी लोग ही हुए . वे साम्प्रदायिक ही हुए.

हिंदू शाश्त्रों में है ही क्या , वो ही झूटी -सच्ची , अविश्वाश पूर्वक कहानियां .  हमें साब पता है , हमने टी.वी . पर सब देखा हुआ है, पढ़ने से कोई खास बात हो जायेगी .

भगवान तो मन में है, भगवान तो भाव से मिलते हैं.  ज्ञानी बन के क्या मिल जायेगा ? इस प्रकार के तर्क उनके पास होते हैं. बेकार समय व्यर्थ करना . क्या पुस्तक पढ़ने से विशेष हिंदू बन जायेंगे.

मुझे लगता है वे सही हैं,

क्या आप बता सकते हैं , कि हिंदू यदि आपनी कुछ पुस्तकें पढ़ ले तो उसको कोई लाभ है . जैसे गीता , रामायण , महाभारत , भगवत, पुराण , उपनिषद इत्यादि .

ये मेरे लिए भी एक महत्वपूर्ण आंकड़ा हो जायेगा. ओर में उनको संकलित करके सबके सामने पेश कर दूँगा.

आप जैसा ही एक हिंदू,
अशोक गुप्ता
दिल्ली
    

3 टिप्‍पणियां:

आशुतोष की कलम ने कहा…

अशोक जी
जितना आप को जानता हूँ कुछ संदेह हो रहा है..
स्पष्ट करें प्रश्न का मतलब..हिन्दू धर्मग्रंथो का विरोध करना चाहते हैं तो खुल कर आयें हम आप से तर्क करेंगे..
मगर मंतव्य स्पस्ट करें

कौशलेन्द्र ने कहा…

अशोक जी का आक्रोश इस बात को लेकर है कि हम सनातनी लोग अपने आर्ष ग्रंथों की उपेक्षा कर रहे हैं जो कि हमें नहीं करनी चाहिए. सांसारिक विषयों की पढाई तो हम बड़े यत्न पूर्वक करते हैं पर जो हमें संस्कारित करने वाला ज्ञान है उसे हम रीति रिवाजों के माध्यम से अधकचरे रूप में प्राप्त करते हैं. सांसारिक ज्ञान के बोझ से हम तथाकथित विद्वान तो बन जाते हैं पर इस विद्वता पर प्रश्न तब उठता है जब यही विद्वान डाक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, या सचिव घोटालों में पकड़ा जाता है. अशोक जी ने व्यंग्यात्मक शैली में पूछा है कि हम अपनी आर्ष परम्पराओं और उच्च आदर्शों के ज्ञान के लिए अपने आर्ष ग्रंथों को क्यों पढ़ें जबकि वह यूँ ही चलते फिरते टी.वी देख कर ही प्राप्त हो जाता है ( भले ही भ्रामक और अधकचरे रूप में ही क्यों न हो ). अशोक जी की लेखन शैली हमारे समाज के पथ भ्रष्ट होने के कारण आक्रोश और व्यंग्य से पूर्ण है. वस्तुतः वे कहना यह चाहते हैं कि हमें आर्ष ग्रंथों को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए क्योंकि उनमें कथा कहानियों के माध्यम से गूढ़तम विषयों के बारे में उपदेश दिए गए हैं. पंचतंत्र की कहानियों में पशुपक्षियों के माध्यम से जीवन के गूढ़ सिद्धांतों की रोचक व्याख्याएं की गयी हैं. यह भारतीय मनीषियों की उपदेश की शैली थी जो कठिनतम विषयों को भी रोचक और सुबोध बना देती थी. श्लोक के माध्यम से गेय पदों में गणित के नीरस सूत्रों की रचना भारतीय मनीषियों का ही कमाल है जो विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा. गीता जैसा मानव-शास्त्र, समाज-शास्त्र, राजनीति-शास्त्र, कर्म-शास्त्र और आध्यात्म-शास्त्र विश्व में और कहाँ मिलेगा! यही कारण है कि गीता की सर्वाधिक भाषाओं में प्रतियां प्रकाशित की गयी हैं.
अशोक जी ! हम आपसे पूर्ण तयः सहमत हैं कि हमें अपनी परम्पराओं और नैतिक ज्ञान के लिए आर्ष ग्रंथों का अध्ययन करना ही चाहिए. जो हमारे जीवन के लिए इतना महत्वपूर्ण है उस ज्ञान के लिए केवल टी.वी. सीरियल्स या इस जैसे अन्य अशास्त्रीय माध्यमों को पर्याप्त समझ लेना हमारी नासमझी है.

Ankit.....................the real scholar ने कहा…

मित्रों , मुझे इस मंच पर सलाहकार का दायित्व दिया गया है अतः मेरे कुछ कर्तव्य हिं इस मंच के प्रति | मैं इस मंच पर अशोक जी द्वारा लगातार इस मंच की भावना के विपरीत पोस्ट लगाये जाने की सार्वजनिक रूप से अत्यंत कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ और अशोक जी तथा उनके लेखों को इस मंच पर बनाये रखने के प्रबंध तंत्र के निर्णय से असहमति जताते हुई इस निर्णय पर पुनर्विचार करने के निवेदन के साथ इस निर्णय का भी विरोध करता हूँ क्यों की मुझे लगता है की यां निर्णय और यह निष्क्रियता इस मंच के लिए हानिकर है |
वन्दे मातरम