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हिना रब्बानी की भारत यात्रा




भीषण रक्तपात और अमानुषिक अत्याचारो के बूते भारत का सांप्रदायिक विभाजन करवाकर अस्तित्व में आए , विभाजित भारत को भी पूर्णतया इस्लामिस्तान बनाने की योजना और षणयंत्रो में दिन रात संलग्न एवं कश्मीर सहित सम्पूर्ण भारत में आतंककारी षणयंत्रो के सूत्रधार, हमारे जन्मजात तथा आमरण शत्रु पाकिस्तान की विदेशमंत्री बेगम हिना रब्बानी की भारत यात्रा ने भारतीय राजनय की मेरुदंडहीनता और भारतीय प्रसार माध्यमों की स्वाभ...िमान शून्यता के इतिहास में एक और लज्जाजनक अध्याय जोड़ दिया है। 

हिना के आकर्षण बाहुव्यक्तित्व के विषय में मेरी टिप्पणी व्यर्थ है , क्यो की भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने चार दिन तक उसका अखंड और अनवरत स्तुतिगान किया है । मेरे लिए महत्वपूर्ण ये है की केवल 34 वर्ष 6 मास की तरण वय में पाकिस्तान प्रथम महिला विदेश मंत्री के महत्वपूर्ण पद पर पहुचने वाली हिना किसी भी भारतीय राजनेता से अधिक योग्य, निर्भीक , कूटनीतिज्ञ और अपने देश तथा मजहब के प्रति समर्पिता राजनेत्री है। पाकिस्तान के हितो से हिना की प्रतिबध्यता , भारत को अधिक से अधिक हानी पहुचाने के लिए उसकी सतर्कता इस्लाम के प्रति उसका समर्पण निसंदेह प्रशंसनीय है।

 राजनैतिक शिष्टाचार की धज्जिया उड़ाकर भारतद्रोही , खतरनाक अपराधियो के साथ , भारत सरकार के ही प्रबंध में, भारत की राजधानी में , पाकिस्तानी दूतावास के बंद कमरे में, आधी रात गोपनीय गुफ्तगू करने का धृष्टतापूर्ण दुस्साहस करने वाली यह पाकिस्तानी राजनेत्री अपने भारत-भंजन और पाक-पुष्टीकरण मिशन में शत प्रतिशत सफल रही। पालम विमान-पत्तन से पूरे लवाजमे के साथ सीधे पाकिस्तानी दूतावास में जाकर अपनी शानदार उपस्थिती दर्ज कराने वाली हिना ने यो तो भाजपा नेता श्री आडवाणी और श्रीमती सुषमा स्वराज से भी औपचारिक भेट कर ली, किन्तु महत्वपूर्ण थी आधी रात को उसकी भारतद्रोही पाकिस्तान-परस्त हुर्रियत-सरगना सैयद अलीशाह गिलानी , मीर वाईज , फारुख, बिलाल लोन , आगा सैयद और अब्दुलगनी बट्ट से मुलाक़ात ,जिन्हे हिना की फरमाइश पर खास तौर पर , कश्मीर की जेल से निकालकर भारत सरकार द्वारा बड़ी हिफाजत के साथी हिना के ‘दरबार ‘ में पेश किया गया ।

 हिना ने पाक के इस फरमाबरदार बंदो से किस मकसद और मुद्दे पर मशविरा किया ..इसकी कोई जानकारी , मेहमान नवाजी के सारे रेकॉर्ड तोड़ डालने पर आमादा हिन्दुस्तानी हुकूमत के पास नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है की बेगम हिना ने कश्मीर के मुख्यमंत्री उम्र अब्दुल्ला को घास तक नहीं डाली क्योकि वह भारत का राष्ट्रपति बनने का स्वप्न देखने वाले फारुख अब्दुल्ला का शहजादा है, और कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने के बजाय, आजाद इस्लामी मुल्क बनाकर उसका सुल्तान बनने के मंसूबे रखता है। हिना के लिए उमर अब्दुल्ला से उमर फारुख अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि वह गिलानियों कि तरह पाकिस्तानपरस्त है और हुक्म का बंदा है। इन पांचों से गुप्त विचार-विनिमय का परिणाम स्पष्ट हो गया जब हिना ने जम्मू कश्मीर और तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के बीच मुक्त आवागमन और मुक्त व्यापार को भी विदेशमंत्रीय वार्ता का एक विषय बनाया , किन्तु हिना के पिता कि आयु वाले भारत के विदेश मंत्री कृष्णा महोदय ने हिना से ये पूछने का साहस नहीं किया कि, मोहतरमा हमारे अंदरूनी मामले में टांग अड़ाने वाली आप कौन होती हो? स्पष्ट है कि हिना अर्थात पाकिस्तान की नजरो में ‘आजाद कश्मीर ‘तो पाकिस्तान का है ही, जम्मू कश्मीर भी भारत का भाग नहीं है।

 पाकिस्तान का 64 वर्षीय सांप्रदायिक पूर्वाग्रह या दुराग्रह अपने जेहन में लेकर हिन्दुस्तानी सरजमी पर तशरीफ लाने वाली पाकिस्तान कि इस 34 वर्षीय युवा विदेश मंत्री ने , कश्मीर पर भारतीय दृष्टिकोण पर, पाकिस्तान से संचालित और भारतीय भूमि में सक्रिय आतंकवाद पर , भारत के भगोड़े और पाकिस्तान में पनाह पा रहे देशद्रोहियों के प्रत्यर्पण पर, अथवा भारतीय मछुआरो पर किए जाने वाले पाकिस्तानी अत्याचारो पर कोई चर्चा नहीं की, या तो भारत के महान विदेश मंत्री ने इन विषयो पर बल ही नहीं दिया या चालाक पाक खातून ने उनको हवा में उड़ा दिया । हिना ने ज़ोर दिया भारत और पाकिस्तान के बीच प्रतिबंध रहती आवागमन की सुविधा पर जिसका परिपूर्ण लाभ पाकिस्तान को ही मिलेगा क्यो कि भारतीय हिन्दुओ के लिए तो पाकिस्तान में बचा ही क्या है? भारतीय मुसलमान अवश्य इस सुविधा से लाभान्वित होंगे जिन्हे अपने पाकिस्तानी रिश्तेदारों से चाहे जब बगलगीर होने कि सहूलियत हासिल हो जाएगी और पाकिस्तान को भी , अजमेर कि जियारत और आजाद तिजारत के बहाने, अपने दहशतगर्दो को हिंदुस्तान में भेजने और भेजते रहने कि आजादी मिल जाएगी। बेगम हिना ने, भारत पाकिस्तान के बीच मुक्त व्यापार पर भी ज़ोर दिया। 

बेगम साहिबा, भारत के घोषित राष्ट्रपिता गांधी कि समाधि पर गयी या नहीं इसका विवरण नहीं मिल पा रहा है किन्तु अपने त्रिदिवसीय प्रवास में वे निज़ामुद्दीन औलिया कि मजार पर चादर चढ़ाने गयी और ख्वाजा के अजमेरी दरगाह कि जियारत करने से भी नहीं चूकी, दोनों जगहो पर उन्होने पाकिस्तान कि बुलंदी, कश्मीर पर उसकी फतह और हिंदुस्तान की तबाही की दुआये जरूर मांगी होगी- “ या मौला , या गरीब नवाज , अपने बंदो पर करम फरमा , उनकी दुआ कबूल कर , काफिरो को शिकस्त देने की , और हिंदुस्तान कि सरजमी पर इस्लामी परचम फहराने कि ताकत, हिम्मत और कुव्वत हमे बख्श दे। “ में बेगम हिना रब्बानी खार कि वफादारी, मुल्कपरस्ती और दीनदारी का कायल हो गया हु , उन्होने भारत के किसी भी महापुरुष का स्मरण नहीं किया, धर्म निरपेक्षता कि दुहाई नहीं दी, वे दुश्मनों के मुल्क में आई , घूमी, जियारत की, और शत प्रतिशत अपनी शर्तो पर, अपने एजेंडा पर , कामयाबी के साथ अपने फर्ज को मुकम्मल अदा करके शान से लौट गयी।

 जिन्ना कि तारीफ में कसीदे गढ़ने वाले हमारे आडवाणी जी से, “राम मंदिर का मुद्दा एक चैक था , जो हमने भुना लिया है , एक चैक दुबारा नहीं भुनाया जा सकता” , जैसे आर्ष वाक्यो कि वर्षा करने वाली सुषमा बहुरानी और हिन्दुत्व को अपनी पार्टी का एक लोक लुभावन नारा मात्र घोषित करने वाले स्वयंसेवक अरुण जेतली जी कि तुलना में हीना बेहद बेखोफ , ईमानदार, वफादार, दीनदार , और काबिल सियासतदा साबित हुयी है, आडवाणी जी , जेतली जी, सुषमा जी तीनों भले ही भारत का प्रधानमंत्री बनने कि योग्यता रखते है या नहीं ये भविष्य तय करेगा, किन्तु 34 वर्षीय हिना पाकिस्तान कि वजीरे आजम बनने कि पूरी काबिलियत रखती है, यह उन्होने बखूबी जाहिर कर दिया है।

 भारत के मीडिया को धन्य है कि उसमे हिना के खौफनाक इरादो को ‘फोकस’ करने की तकलीफ गवारा नहीं की, वह तो बस हिना की जिस्मानी खूबियो पर फिदा होकर शायराना अंदाज में ‘में हु खुशरंग हिना’ का फिल्मी राग अलापता रहा, खुशरंग हिना की खुसबू सूँघता रहा , पिछली सदी में बेगम बेनजीर कि भारत यात्रा के समय भी भारतीय मीडिया शायराना अंदाज में उनके पीछे पीछे दम हिलाता फिरता नजर आया था, शत्रु –नेत्रियों के रक्तरंजित षणयंत्रो को आनावृत करने कि अपेक्षा, उनके सौन्दर्य पर कुर्बान होने का ऐसा लज्जा जनक दृश्य केवल भारत में ही देखा जा सकता है  आचार्य श्री धर्मेंद्र जी महाराज

1 टिप्पणी:

कौशलेन्द्र ने कहा…

अलगाववादी राष्ट्रद्रोहियों से हिना की मुलाक़ात यूं ही नहीं हो गयी ......सब कुछ पूर्व निर्धारित था. एजेंडा हिना का था ....जिसका क्रियान्वयन भारत की सरकार ने किया ...पूरी दरियादिली के साथ. हिना भारत आयीं , निश्चित ही भारत के लिए नहीं पाकिस्तानी हितों के लिए ...और वे अपने इरादों में सफल रहीं. यह तो भारतीय नेताओं को चाहिए था कि वे अपनी रणनीति से हिना की यात्रा से भारत का कितना हित साध पाते हैं ...बेशक ! हिना सबको मेहंदी लगा के चली गयीं. एक बार फिर भारतीय राजनीति अपने पड़ोसी से मात खा गयी.