समर्थक

अगीत ---ड़ा श्याम गुप्त...



वे राष्ट्र गान गाकर,गाकर ,
भीड़ को देश पर मर -मिटने की ,
कसम दिलाकर ;
बैठ गए लक्ज़री कार में जाकर ;
टोपी पकडाई पी ऐ को-
अगले वर्ष के लिए ,
रखे धुलाकर |




लेलो हमसे, हमारे .
हाट  बाज़ार दुकानें ,
स्वागत  है ,
बहु  राष्ट्रीय कंपनियां ,
हमें अपना गुलाम ही जानें |


यह अ जा का,
यह अ ज जा का,
यह अन्य पिछडों का,
यह सवर्णों का ,
कहाँ है मेरा देश ?


मेरे देश ,
आज़ादी के समय हुआ,
तुम्हारे साथ-
अन्याय अपार ;
बाँट दिया दो टुकड़ों में,
खींच कर बीच में ,
खून की धार |



2 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

यह अ. जा. का,
यह अ. ज. जा. का,
यह अन्य पिछडों का,
यह सवर्णों का ,
कहाँ है मेरा देश ?

कहीं नहीं है मेरा देश ! कुछ आरक्षण खा गया ...कुछ लूट लिया है लोगों ने. लूट का माल बरामद करना होगा. पर करेगा कौन ?
आइये, आज प्रतिज्ञा करें कि हम हर उस बात का विरोध करेंगे जो देश और समाज हित में नहीं है.

drshyam ने कहा…

हाँ प्रतिज्ञा करते हैं...सभी को करना चाहिए....और न करें पर हमें करना चाहिए...