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अहिंसा क्या है ?


साधारण अर्थ में मन , वचन और कर्म के द्वारा किसी भी प्राणी को कष्ट न देना , न सताना , न मारना अहिंसा कहलाता है । अहिंसा परमधर्म है । किन्तु अहिंसा की यह परिभाषा बहुत ही अपूर्ण और असमाधान कारक है । केवल शब्दार्थ से अहिंसा का भाव नहीं ढूँढा जा सकता , इसके लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई व्यवहारिक शिक्षा का आश्रय लेना पडेगा ।
जिस पुरूष के अन्तःकरण में ' मैं कर्ता हू ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थ और कर्मो में लिप्त नहीं होती है , वह पुरूष सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न ही पाप से बंधता है । जिस हिंसा से अहिंसा का जन्म होता है , जिस लडाई से शान्ति की स्थापना होती है , जिस पाप से पुण्य का उद्भव होता है , उसमें कुछ भी अनुचित या अधर्म नहीं है । वास्तव में मानवता की रक्षा के लिए दुष्टों का प्राण हरण करना तो शुद्ध अहिंसा है । अत्याचारी के अत्याचार को सहन करने का नाम अहिंसा नहीं यह तो मुर्दापन है । मृत शरीर पर कोई कितना ही प्रहार करता रहे , वह कोई प्रतिकार नहीं करता । इसी प्रकार जो मनुष्य चुपचाप अत्याचार सह लेता है , वह मृत नहीं तो और क्या है ?
भारतीय वैदिक संस्कृति में अत्याचार सहने का नहीं बल्कि अत्याचारी को दण्ड देने का विधान है जैसा कि मनुस्मृति के निम्नलिखित श्लोक से प्रकट है -


गुरूं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मण वा बहुश्रुतम् ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ।।
गुरू हो , बालक हो , वृद्ध हो , ब्राह्मण हो अथवा बहुश्रुत ( बहुत शास्त्रों का श्रोता ) ही क्यों न हो - यदि आततायी के रूप में अत्याचार करने अथवा मारने आ रहा हो तो उसको बिना सोचे - विचारे मार देना चाहिये । इसलिए अहिंसा का सही भाव है कि जो निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरों को हानि पहुँचाता है , या किसी के प्राण लेता है , तो वह हिंसा है , और जो परमार्थ के लिए या सार्वजनिक हित के लिए अत्याचारी को हानि पहुँचाता , या उसको मार डालता है , तो वह हिंसा न होकर सच्ची अहिंसा है । क्योंकि उससे सार्वजनिक हित होता है ।
जैसे यदि कोई अत्याचारी चोर , डाकू , लुटेरा , बलात्कारी आदि - आदि जब किसी पर आक्रमण करता है , उस समय उसके विरूद्ध वह व्यक्ति , जिस पर उसका आक्रमण है , अथवा अन्य कोई समर्थ व्यक्ति , अथवा राज्य द्वारा नियुक्त पुलिस विभाग का कर्मचारी , कोई भी सुरक्षात्मक रूप में आक्रामक पर वार करता है , जिससे वह मारा जाता है , तब वह कर्म वहाँ पर हिंसा नहीं है ? क्योंकि मारने वाले का लक्ष्य उसे मारना नहीं था , वरन् अपनी सुरक्षा हेतु अथवा बुराई को हटाने के लिए ही प्रत्याक्रमण करना था । अतः यह सिद्ध होता है कि मन , वचन और कर्म तीनों से ही दूसरों को हानि न पहुँचाना अहिंसा है ।
सूक्ष्म दृष्टि से विचार करे तो अहिंसा की प्रतिष्ठा इसलिए नहीं है कि उससे किसी जीव का कष्ट होता है । कष्ट होना न होना कोई विशेष महत्व की बात नहीं है , क्योंकि शरीरों का तो नित्य ही नाश होता है और आत्मा अमर है , इसलिए मारने न मारने में हिंसा - अहिंसा नहीं है । अहिंसा का अर्थ है - ' द्वेष रहित होना । ' निजी राग - द्वेष से प्रेरित होकर संसार के हित - अहित का विचार किये बिना जो कार्य किये जाते है , वे हिंसा पूर्ण है । यदि लोक कल्याण के लिए , मानवता की रक्षा के लिए किसी को मारना पडे तो उसमें दोष नहीं है , वास्तव में वह शुद्ध अहिंसा है ।
- विश्वजीत सिंह

4 टिप्‍पणियां:

सुज्ञ ने कहा…

विश्वजीत जी,

अहिंसा की इस परिभाषा से सहमत नहीं!!!!

अर्जुन के लिए, अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित का भेद करने वाले स्वयं श्री कृष्ण थे। साधारण के लिए भले - बुरे का निर्णय दोषपूर्ण होने की पूरी सम्भावनाएं होती है।

फिर जगह जगह कहा गया है कि नाश पाप का करना है, पापी का नहीं।
द्वेष, बदला और हिंसा की इस प्रकार जस्टिफाय परिकल्पना बाहरी जेहादी विकृति है।

आप भी अहिंसा का अर्थ करते है 'द्वेष रहित' तो निर्णायक अवस्था के पहले द्वेष क्यों।

आत्मा अमर है मारने से नहीं मरती का आशय यह नहीं है। कि प्राणांत नहीं होता और वेदना नहीं होती अथवा दुख नहीं पहुंचता। अत्याचारी को मारने के पिछे मंशा तो उसे दर्द पहुंचाना ही तो है।

किसी के अत्याचारी हिने का फैसला हम करने लगे तोऽअवेश में अधिकांशबार हम निर्दोष को दण्डित कर बैठेगे।

सुज्ञ ने कहा…

(सुधार युक्त)

विश्वजीत जी,

अहिंसा की इस परिभाषा से सहमत नहीं!!!!

अर्जुन के लिए, अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित का भेद करने वाले स्वयं श्री कृष्ण थे। साधारण के लिए भले - बुरे का निर्णय दोषपूर्ण होने की पूरी सम्भावनाएं होती है।

फिर जगह जगह कहा गया है कि नाश पाप का करना है, पापी का नहीं।
द्वेष, बदला और हिंसा की इस प्रकार जस्टिफाय परिकल्पना बाहरी जेहादी विकृति है।

आप भी अहिंसा का अर्थ करते है 'द्वेष रहित' तो निर्णायक अवस्था के पहले द्वेष क्यों।

आत्मा अमर है मारने से नहीं मरती का आशय यह नहीं है। कि प्राणांत नहीं होता और वेदना नहीं होती अथवा दुख नहीं पहुंचता। अत्याचारी को मारने के पिछे मंशा तो उसे दर्द पहुंचाना ही तो है।

किसी के अत्याचारी होने का फैसला हम करने लगे तो आवेश में अधिकांशबार हम निर्दोष को दण्डित कर बैठेगे।

Swati Garg ने कहा…

1 thing is sure, Ahinsa se har cheez nai ki ja sakti aaj ke zamane main ;-)

कौशलेन्द्र ने कहा…

कई बार हम अपने उद्देश्यों के अनुरूप परिभाषाओं को व्याख्यायित कर लेते हैं. यह एक सुविधाजनक स्थिति है और मनोवैज्ञानिक भी. हर व्यक्ति अपनी स्थितियों, क्षमताओं, और उद्देश्यों के अनुरूप ही व्याख्याएं करता है.
यह बड़ा ही गंभीर विचार है कि पापी को नहीं पाप को ख़त्म करो. एक पापी को मार देने से दूसरा पापी सामने आ जाएगा....क्योंकि पाप की विचारधारा तो समाप्त हुयी ही नहीं. हमें विचारधारा को रिप्लेस करना है ...पापियों के सिलसिले पर विराम तभी लग पायेगा. ओसामा के मरने के बाद भी तालिबानी आतंक समाप्त नहीं हुआ , उसका स्थान एक दूसरे आतंकवादी ने ले लिया .....कलुषित विचारधारा ही राक्षसत्व का रक्तबीज है .....इसी राक्षस को मारना होगा, तथापि जब समाज और शासन की बात आती है तो दंड विधान का पालन आवश्यक हो जाता है...निश्चित ही न्यायपूर्ण दंड विधान पीड़ादायी होते हुए भी स्वीकार्य है और आवश्यक भी.
भारतीय समाज में वर्ण की अपेक्षा किये बिना ही दोषी को दण्डित करने का स्पष्ट प्रावधान था तथापि कुछ लोग मनुवाद को हेय दृष्टि से देखने से बाज नहीं आते. यह उनकी अपनी व्यक्तिगत कुंठा ही है जिससे वे आजतक मुक्त नहीं हो सके हैं.