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पर भारत की बात निराली....ड़ा श्याम गुप्त....



                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
पर  भा की बात निराली 

सारा जग सुंदर अति सुंदर,
पर भारत की बात निराली |
गूंजे  प्रेम-प्रीति की भाषा ,
 वन उपवन तरु डाली डाली |
मेरे देश की बात निराली,
भारत की हर बात निराली ||



गली गली है गीत यहाँ की ,
गाँव शहर संगीत की थिरकन |
पगडंडी सी   नीति -कथाएं ,
हाट डगर मग प्रीति की धडकन |
नदी नहर जल मधु की प्याली , 
पथ पथ सत् की कथा निराली |

प्रेम की भाषा डाली डाली .
इस भारत की बात निराली ||

अपने अपने नियम धर्म सब,
अपने अपने ब्रह्म ईश सब |
अपनी अपनी कला कथाएं ,
अपनी अपनी रीति व्यथाएँ |
अलग अलग रंग प्रीति निराली ,
भिन्न भिन्न हर ड़ाली डाली |

एक तना जड़ एक निराली,
इस भारत की बात निराली ||

कर्म के साथ धर्म की भाषा ,
अर्थ औं काम मोक्ष अभिलाषा |
जीवन की गतिमय परिभाषा |
विविधि धर्म मत जाति के बासी ,
बहु विचार बहु शास्त्र कथा सी |
भोर-सांध्य की प्रेम-व्यथा  सी |

बहुरंगी संस्कृति की थाली,
प्रेम की भाषा डाली डाली ||

गीता स्मृति वेद उपनिषद ,
गूढ़  कथाएं ये पुराण सब |
विविधि शास्त्र इतिहास सुहाना,
 कालिदास प्रभृत्ति विद्वाना |
सुर  भूसुर  भूदेव  महीसुर,
नर-नारायण, संत कवीश्वर |

प्रथम भोर ऊषा की लाली ,
प्रिय भारत की छटा निराली ||

2 टिप्‍पणियां:

vidhya ने कहा…

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

drshyam ने कहा…

धन्यवाद विद्या जी....