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चैतन्य विज्ञान बनाम जड़ विज्ञान ! जड़ जगत की सृष्ठी हैं पदार्थ, जबकि प्राण जगत की तरंगे ।

    जड़ विज्ञान पदार्थों की क्रिया प्रतिक्रिया का शास्त्र हैं जिसका प्रकृति और स्वास्थ्य से बहुत ही सीमित संबंध हैं इसका स्थूल उदाहरण होम्योपैथिक औषधियाँ हैं जैसे किसी के शरीर मे आइरन की कमी हो जाये और डॉक्टर उसे फेरम फॉस 200 लेने को कहें तो आप देखेंगे की आइरन फेरस से बनी होने पर भी उसमें आइरन न होकर केवल अल्कोहल ही होगा । 


     होम्योपेथिक औषधियों मे पदार्थ रहता ही नहीं है केवल शक्तिरूप में तरंगे रह जाती हैं इसलिए इसका विलक्षण प्रभाव होता हैं अब सूक्ष्म उदाहरण लें । 

    खुद को खाने को न मिले लेकिन बच्चो को खाने को मिल जाये तो माँ संतुष्ट हो जाती हैं । जबकि यही माँ जब कुवारी थी तब हिस्सा मांगने के नाम पर लड़ती-झगड़ती थी.  दूसरे शहर मे रह रहे बच्चो को कुछ हो जाये तो यहाँ माँ बिना समाचार मिले ही बैचेन होने लगती है । ऐसा क्यों होता है जड़ विज्ञान इसका उत्तर नहीं दे सकता इसका उत्तर चैतन्य विज्ञान ही दे सकता है.  माँ की प्राण सीमा में उसका बेटा भी रहता है इसलिए बेटे के सुख दुख से माँ भी सुखी दुखी रहती है । 

किसी पदार्थ का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह जानने के लिए करोड़ो मूक  प्राणियों पर क्रूर प्रयोग किए जाते है और फिर उनकी  हत्या कर दी जाती है । फिर मनुष्यों पर ये प्रयोग किए जाते है और 10-20 वर्षों बाद उस पदार्थ को अत्यंत हानिकारक घोषित कर दिया जाता है यह है जड़ विज्ञान का क्रूर तमाशा 

     आजकल टीवी पर हम देखते है जब कंपनियों की लूट की इच्छा पूरी नहीं होती तो नित नए नए स्वांग रचते है पहले बोर्नविटा, फिर बोर्नविटा को नई पेकिंग मे सजा कर उसे New Improved Bornvita, New होर्लिक्स ! With Calcium, New.......! With Iron, ..... With फलाना....फलाना.... झूठ बेचते है . न्यू होर्लिक्स तो पहले झूठ क्यूँ बेचा ? 

ऐसा क्यूँ नहीं होता 
New Improved त्रिफला चूर्ण ? 
त्रिफला चूर्ण with Calcium ? 
त्रिफला चूर्ण with Iron ? 
च्यवनप्राश with Iron ?.... Milk प्रोटीन ... फलाना .... फलाना .... 

    ऐसा तो नहीं होता ! ये औषधियाँ तो प्राचीन काल से ही वैसी की वैसी चली आ रही है सोचो महान आज के ये वेज्ञानिक या हमारे ऋषि मनीषी ? 

     आज के वैज्ञानिक औषधियाँ बनाते है तो 5-6 वर्षों मे ही वे या तो प्रतिबंधित हो जाती है या फिर डॉक्टर खुद उन्हें नकारने लगते है अखबारों मे लेख भरे रहते है ये औषधि खाने से मोटापा बढ़ता है ये औषधि खाने से ये प्रतिकूलता आती है.... वो आविष्कार किया .... फलाना फलाना 

     हम च्यवनप्राश जैसी सैकड़ों जड़ीबूटियों से निर्मित औषधि कितने सेकड़ों सालो से खाते आ रहे है उसमे तो कोई नई जड़ीबूटी नहीं मिलाई ? किसी वटी या किसी चूर्ण मे तो कोई केल्सियम और प्रोटीन नहीं मिलाया ? ..... क्यों ? हम लुटेरे नहीं है ..... 

     हमारे ऋषियों के काम करने की पद्धति अलग थी वे किसी वनस्पति के पास जाते उसके प्राण से संबंध स्थापित कराते और तब उसकी तरंगो का दर्शन कराते, फिर रोगी की तरंगो पर उसके प्रभाव का दर्शन करते । तब किस रोग में कौनसी वनस्पति औषधि का कार्य करेगी और किस मुहूर्त में किस प्रार्थना से उस बनस्पति की प्राणिक ऊर्जा अपने चरम पर होगी इसे अपने ग्रंथो में लिखते । 

       प्रसिद्ध गौ विज्ञानी : गौरीशंकर माहेश्वरी ने कहा है की अलग अलग दिन उखाड़े गए कुश (एक झाड़ी - औषधि) की शक्ति अलग अलग होती है । सामान्य दिन उखाड़े गए कुश की शक्ति एक दिन, पुर्णिमा के दिन कुश की शक्ति 15 दिन, अमावस्या के दिन की कुश की शक्ति 1 माह व कुशोत्पाटनी अमावश्य के दिन कुछ की शक्ति एक 378 दिन तक रहती है 

       कुश के उत्पाटन (उखाड़ना) के पहले कुश से प्रार्थना करें और दूसरे दिन पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर कुश की पुजा कर 'ॐ हुं फट्' इस मंत्र का उच्चारण करते हुए धातु का स्पर्श न करते हुए उखाड़े इस कुश मे विलक्षण शक्ति होती है . उदाहरण के लिए प्रसव काल में माता के पेट पर इसे बांधने से प्रसव सामान्य व सरलता से हो जाता है 

      वट सावित्री के दिन बड़ की पूजा, पूनम के दिन पीपल की पूजा, देवोत्थान एकादशी के दिन तुलसी पूजा आदि का सामान्य जन में प्रचलन इसी विज्ञान का परिणाम है 

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याद रहे जड़ विज्ञान हमेशा आकड़ों पर ज़ोर देता है जो हमेशा किसी उदेश्य के कारण जोड़े तोड़े (Manipulated) गए हो

2 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

जय हिन्दू जी ! आपने विज्ञान के मूल तत्व को पकड़ा है ...काश ! आम भारतीय भी इसे समझ पाता. आधुनिक विज्ञान विश्लेषणात्मक होता है, विश्लेषण द्रव्य के मूल स्वरूप को ही विकृत कर देता है. अतः analysis के परिणाम भी एकांगी आते हैं जिन्हें पूर्ण सत्य मानकर विज्ञान के रेतीले महल खड़े किये जाते हैं. आधुनिक औषधियाँ कुछ समय बाद resistance उत्पन्न करती हैं जिसके कारण वे नित्य परिवर्तनशील प्रकृति की होती हैं. सत्य कभी परिवर्तनशील नहीं होता. जो पर्वर्तानशील है वह विज्ञान नहीं होता. इसलिए आधुनिक विज्ञान सत्य से बहुत दूर है यह तथ्य लोगों को समझना चाहिए.
एक रहस्य यह भी है कि कई एलोपैथिक चिकित्सक अब स्वयं आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करने लगे हैं ...भले ही वे अपने रोगियों को एलोपैथिक दवाइयां ही लिखते हैं.

drshyam ने कहा…

सही तथ्य प्रस्तुत किये गए हैं..यद्यपि वे आज के विज्ञान विज्ञान चिल्लाने वालों को विचित्र लगेंगे...परन्तु यह भाव-विज्ञान है जो आधुनिक विज्ञान के मनोविज्ञान से भी बहुत आगे की बात है जहां तक अभी आधुनिक विज्ञान नहीं पहुँच पाया है ..यह जड़ विज्ञान की भांति जड़ात्मक विश्लेषण क्रियाओं की बजाय ..भावात्मक अतीन्द्रिय अनुभवजन्य विश्लेषणों पर आधारित होता है...