समर्थक

पुनर्मूषको भव......ड़ा श्याम गुप्ता

रहते थे जब हम जंगल में ,
कंद मूल फल खाया करते |
नर-नारी,फल-फूल जुटाने ,
 दोनों ही वन जाया करते |

जीवन कठिन, सरल मानव था ,
 हिंसक जीव राह में मिलते |
 वर्षा धूप शीत को सहते,
 जीवन कठिन बिताया करते |

  हंसी खुशी से सारे ही तो ,
   जीवनके व्यवहार थे चलते |
   सुख-दुःख के वे सारे ही स्वर, 
   खुले गगन में ही थे ढलते  |


 उन्नत हुए वनों को तजकर ,
 कुटियों का जब हुआ था चलन |
संतति-निर्वल की रक्षा-हित,
श्रम का सब में हुआ विभाजन |

 नारी को स्वयमेव ही अपना ,
क्षेत्र घरों में रहना भाया |
नर ने घर से बाहर जाकर,
कठिन कार्य करना अपनाया |

नव पीढ़ी का पालन पोषण ,
शिक्षा दीक्षा के भाव सभी |
कुटिया आँगन और संतति की,
रक्षा  तत्पर  थीं नारि  सभी |

व्यापार  राज्य मंत्रणा सभी में,
नारी नर का साथ निभाती | 
पर दास्य भाव के हित लेकिन,
थी  कभी नहीं बाहर जाती |

हर  कदम साथ पुरुषों के रह,
माँ पुत्री भगिनी भाव बना |
वह देवी बनी व मातृ-शक्ति ,
पूजन का था शुचि भाव घना |

शुचि सौम्य सरल सुंदर जीवन,
मानव मन समतल में बहता |
न्याय ज्ञान सत पावनता से,
शिव सुंदर था समाज रहता |

फिर अति उन्नति की चाह उठी ,
अति भौतिकता सुख ले आयी |
अति सुख, अति वैभव चाह लिए ,
प्रतिद्वंद्विता भाव लेकर आयी |

नारी पर-दास्य कर्म करने,
घर से बाहर अब जाती है 
और अन्य नारियाँ दासी बन् ,
उस घर के कर्म निभाती हैं |

दो सौ प्रतिशत सेवा योजन,
क्या देश कोई दे पायेगा |
आधा जग भूखारहे सदा,
आधा तर माल उडाएगा |

मंजिलों माल बाज़ारों  के ,
जंगल हर ओर खड़े मिलते|
हर  गली मोहल्ले राहों में,
हिंसक मानव-पशु हैं पलते |

हम पुनः आगये हैं वन में,
जब कंद मूल फल खाते थे |
अपने अपने भोजन के लिए,
नर नारी जंगल जाते थे |

सभ्यता चक्र पूरा करके ,
हम पुनः वहीं पर आये हैं |
मानव की सहज, सरलता पर,
राहों में ही खो आये हैं ||

4 टिप्‍पणियां:

vidhya ने कहा…

अति सुन्दर

कौशलेन्द्र ने कहा…

उन्नत हुए वनों को तजकर ,
था कुटियों का जब हुआ चलन |
संतति-निर्वल की रक्षा-हित,
श्रम का सब में हुआ विभाजन |

डॉक्टर साहब ! सभ्यता का पूर्ण चक्र एक ही रचना में ! कमाल है ....गागर में सागर ! ! !

drshyam ने कहा…

---धन्यवाद विद्याजी ...
--धन्यवाद कौशलेन्द्र जी...आभार ....

drshyam ने कहा…

मेरे ब्लॉग.....vijaanaati-vijaanaati-vigyaan & श्याम स्मृति the world of my thoughts..पर .पढ़ें...
'स्त्री-पुरुष विमर्श गाथा'--आदि काल से अब तक....