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समसामयिक उल्लेखनीय कृतियाँ - भूलने के विरूद्ध - गल्प किन्तु सत्य - डॉक्टर मनोहर भंडारी

प्रिय सुधी पाठक बंधुओ ! सादर नमन !!!
इस बार से हम भारतीय संस्कृति पर "समसामयिक उल्लेखनीय कृतियाँ " शीर्षक से एक नया स्तम्भ प्रारम्भ कर रहे हैं. इस स्तम्भ के अंतर्गत विभिन्न रचनाकारों की उन रचनाओं का समावेश किया जाएगा जो भारतीय संस्कृति, सनातन हिन्दू धर्म और भारतीयता के स्वरों के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध होंगी . प्रारम्भ कर रहे हैं डॉक्टर मनोहर भंडारी की संवाद शैली में लिखी कृति " भूलने के विरुद्ध " से .
   
इसके साथ ही ब्लॉग जगत में भी प्रिंट मीडिया की तरह विभिन्न विषयों पर विभिन्न विधाओं में किये गए लेखन को सुव्यवस्थित करने एवं संकलन योग्य बनाने के उद्देश्य से "स्तम्भ " का शुभारम्भ किया जा रहा है. आशा है यह पहल आपको अच्छी लगेगी. हम आपके विचारों के लिए आपके आभारी रहेंगे . धन्यवाद.

महात्मा गान्धी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय इंदौर के फिजियोलोजी विभाग में डिमांसट्रेटर के पद पर कार्यरत डॉक्टर मनोहर भंडारी भारतीय चिंतन के प्रखर पुरोधा हैं. अपनी सांस्कृतिक विरासत को विस्मृत करती जा रही आधुनिक पीढी को जगाने के लिए लेखन के माध्यम से प्रारम्भ किया गया उनका आन्दोलन अनुकरणीय है. इस सांस्कृतिक विस्मृति के विरुद्ध संवाद शैली में लिखी उनकी कृति पर वरिष्ठ पत्रकार एवं चिन्तक कृष्ण कुमार अष्ठाना के विचार कुछ इस तरह हैं -
" ...........संवाद शैली में प्रस्तुत आलेख में सुचिन्तक लेखक ने अनेक विधि गौरवशाली भारतीय अतीत की प्रस्थापना की है , वहीं धूर्त और कूटनीतिज्ञ अंग्रेज तथा दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के साथ एकाधिकार का स्वप्न देख रहे अमेरिकावासियों के भ्रष्ट चरित्र और कुटिल मंसूबों को उद्घाटित किया है .

सैकड़ों वर्षों के अपने साम्राज्य में भी अंग्रेज, भारतीयों को नैतिक गिरावट की जिस चरम सीमा पर नहीं ले जा पाए , उसकी उनके प्रतिनिधि एडवर्ड को जितनी पीड़ा है उससे भी अधिक उसको आश्चर्य है, अमेरिका के प्रतिनिधि सेम से कहने पर की अमेरिका उसमें कैसे सफल हो रहा है . अंग्रेजी शासन का डंडा भी जो कार्य नहीं कर पाया उसमें अमेरिकन फंडा को इतनी ज़ल्दी सफल होते देखकर लेखक ने अपनी अनुभूति को एक वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत कर सबके लिए अत्यंत सुगम तो बनाया ही है, साथ ही चेतावनी भी दी है कि यह फंडा हमको कहाँ ले जा रहा है ?

आत्मविस्मृत भारतीय समाज अपने गौरवशाली स्वर्णिम अतीत से कटकर जिस प्रकार पश्चिम का दीवाना हो रहा है , वह आँखें खोलने वाला है .अपनी भाषा, सभ्यता और संस्कृति, रहन-सहन, वेश-भूषा और चरित्र, शिक्षा-दीक्षा, आचार और व्यवहार में कुछ भी अच्छा नहीं समझने और मानने वाला आम भारतीय पश्चिम के रंग में आकंठ डूबता जा रहा है. उसे अपना "योग" अब "योगा" के रूप में प्रमाणित होकर आने पर अच्छा लग रहा है और अपने आयुर्वेद का महत्त्व उसे पाश्चात्य देशों के सर्टीफिकेट के बाद समझ में आ रहा है .

विडम्बना ही है कि यौन शिक्षा जैसे विषय अब अमेरिका से पिटकर भारत में महत्त्व पा रहे हैं और हमारी सरकार उसे किशोर और युवकों को नियमित पाठ्यक्रम के रूप में परोसने के लिए बेसब्र है . जिन विकृतियों ने अमेरिका के सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर दिया है, उन्हें हम आमंत्रित कर रहे हैं, फख्र के साथ. पता नहीं क्यों वहाँ के टूटते परिवार , कुंआरी माओं का बढ़ता प्रतिशत और किशोरों का हिंसाचार हमारी आँखें नहीं खोल पा रहा ? ........"
इस रचना के दो पात्र हैं, एडवर्ड अंग्रेजों का और डॉक्टर सेम अमेरिकी समाज का प्रतिनिधि है. "एडवर्ड" समाज विज्ञान का प्रोफ़ेसर है जबकि "सेम" चिकित्सा शास्त्री और मनोवैज्ञानिक है . शनिवार का दिन होने से , शाम होते ही वे दोनों नयी दिल्ली के पांच सितारा होटल के टैरेस में जाम टकराते हुए बतिया रहे हैं , सुनिए उनके संवाद -भूलने के विरूद्ध - गल्प किन्तु सत्य - डॉक्टर मनोहर भंडारी
( यह विश्वगुरु कहलाये जाने वाले भारत के नैतिक पतन की परोक्ष कथा है. इस रचना में सच्चाई का कसैलापन भी है जो मिठास पर भारी पड़ रहा है. इस कथा को दिल थामकर पढ़ें और फिर गंभीरता से सोचें , मनन और अमल भी करें , अन्यथा ........! ! )
एडवर्ड - हैलो डॉक्टर सेम ! तुम लोग कमाल कर रहे हो. हमने इस सो काल्ड विश्वगुरु के लोगों को तीन सौ साल तक गुलाम बनाकर खूब लूटा ...नोचा-खसोटा ...मारा-पीटा ...अपमानित किया ..और खरीदा भी , पर कुछ खास नहीं कर पाए . ज़रूर कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं है इनकी...... हाँ ! यह तो बताओ कि तुम आखिर किस फार्मूले से इन्हें बरबाद कर पा रहे हो ?

डॉक्टर सेम - हाँ एडवर्ड ! यह बात तो पूरी तरह सच है. इनकी खासियत सुनोगे तो हैरानी में पड़ जाओगे . गजब का जीवट, कमाल की ताकत, अतुलनीय बुद्धिमत्ता, अनूठी श्रमशीलता , अद्वितीय सहनशीलता, बेमिसाल पारिवारिकता, बलिहारी राष्ट्र निष्ठा , डीप रूटेड फेथ इन रिलीजन, जीवन साथी के प्रति एकनिष्ठा, दया , करुणा, संयम , कार्य-कौशल्यता, दक्षता, धीरज ...और न जाने क्या-क्या गुण अधिकाँश भारतीयों में भरे पड़े हैं .

एडवर्ड - बिलकुल सच है.हमने खूब भोगा है. वो मंगल पांडे ....पिद्दा सा वफादार सिपाही, गाय की चर्बी के चक्क्कर में आज़ादी की बगावत का हीरो बन बैठा. वो लक्ष्मीबाई, उसने तो हमारे छक्के छुडा दिए . मोहनदास करमचंद गांधी, सिंपल स्टिक, जिसे ये लोग लाठी कहते हैं - हाथ में लिए-लिए पैदल घूमता रहा और उसने कभी लाठी चलाई भी नहीं ...वो भी गज़ब का साहसी आदमी था. पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को धोती के पल्लू में बंधी सुपारी समझता था. तोपों से भी नहीं डरता था. गोलियों की बौछारें, भीषण आगजनी, दिल दहलाने वाले खूनी नारों की गूँज और लपलपाती तलवारों के बीच, बिना हथियार, चरखा काटते हुए शान्ति से अपनी बात कह डालता था और उसे मनवाकर ही मानता था. उसके चरखे की आवाज़ हमारी तलवारों की झंकार, गोलियों की सनसनाहट और तोपों के धमाकों को भी दबा देती थी. हम जितना गुस्से से वार करते थे, वह उतनी ही चुप्पी से हमें तिलमिला देता था|

डॉक्टर सेम - क्यों , क्या तुम भूल गए हो , सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, मदनलाल धींगरा को जो अकेले ही तुमको चुनौती देते रहे .....भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खान , तात्याटोपे, खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, चाफेकर बन्धु , सआदत खान ......
एडवर्ड- बस करो . इनके नाम सुनते ही एक अजीब सा भय लगने लगता है ,मुझे तो सन १८५७ से लेकर १९४७ तक के सारे हिन्दुस्तानी महाबली,ओह ,इनविंसीबल्स ( अपराजेय ), पूरी तरह याद हैं. एक का नाम शुरू करो तो दिमाग में सारे घूमने लगते हैं . सचमुच इन लोगों की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. देश के नाम पर सीने पर गोलियां खाकर और फांसी पर चढ़कर मर-मिटने का जुनून भी गज़ब का था. हम तो डंडों की मार से ही कांपने लगते हैं और मौत का खौफ तो हमें ठीक से जीने भी नहीं देता. इस देश की औरतें भी ....ओ माय गाड ! लक्ष्मी बाई से दुर्गा भाभी तक और फिर आज़ादी के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी के बुलंद हौसलों का लोहा सारी दुनिया ने माना है. जब उसने एशिया पेसिफिक ट्रीटी साइन करने से साफ इनकार कर दिया तो ब्रेझनेव की भी हिम्मत नहीं हुयी कि साइन कर दे,सच तो यह है कि भारत में जब बगावत सब तरफ फ़ैलने लगी थी तब से ही मौत का डर हमें दिन-रात सताने लगा था. इन्हें हम लूट चुके थे पर समझ में आ गया था कि यह दादागीरी अब ज़्यादा दिन नहीं चलने वाली. बस बहाने बनाकर खिसक आये . कुछ भारतीयों को देशद्रोही, भ्रष्ट और आलसी बनाया और कुछ हमें देखकर खुद ही भ्रष्ट , धोखेवाज़ और अय्याश हो गए. मगर हम इन तीन सौ सालों में कुछ ख़ास नहीं बिगाड़ पाए तुमने आखिर किया क्या ?
डॉक्टर सेम - हम ध्यान से देख-समझ रहे थे ,क्योंकि धूर्तता, मक्कारी, चालबाजी, अहसान फरामोशी, कायरता और ठगी में हम तुमसे अव्वल हैं. हमने अपने जासूस भारत में भेज दिए|उन जासूसों ने बताया कि भारत का द ग्रेट इन्डियन मिडिल क्लास अर्थात अधिकाँश पढ़े-लिखे लोग अपने गौरवशाली इतिहास को पूरी तरह भूल चुके हैं . वे तुम अंग्रेजों द्वारा प्रचारित इस भ्रम को एकमात्र सच मानने लगे हैं कि भारत सपेरों और मदारियों का देश है . भारतीयों की इस मानसिकता का श्रेय हम तुम्हीं को देते हैं . भारतीय अपने आप को विदेशियों की तुलना में हीनतम मानने लगे हैं. ऐसा लगता है जैसे कि उनके स्मृतिकोषों को पूरी तरह साफ ( इरेज़ ) कर दिया गया है. इनके दिमाग में यह बात गहराई से बैठ गयी है कि भारतीयों का अतीत सिर्फ अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता से ही भरा पड़ा है . तुम अंग्रेजों ने भारतीयों की हालत पोखर से कुँए में पहुंचाए गए मेढक जैसी कर डाली है.
एडवर्ड - इस कहानी से भारतीयों का क्या सम्बन्ध है ?
डॉक्टर सेम - अधिकाँश भारतीय अपने शास्त्रों में लिखे विराट वैज्ञानिक तथ्यों को बकवास और अंधविश्वास भरी कपोल-कल्पित बातें कहकर अपने आपको पढ़े-लिखे और विज्ञान का पक्षधर सिद्ध करने पर तुले हुए हैं. भारत की सदियों पहले हुयी सैकड़ों मौलिक खोजों, आविष्कारों और जानकारियों को पूरी तरह भूलकर वे आत्म विस्मरण की स्थिति में पहुँच चुके हैं. उन्हें यह भी याद नहीं कि जींस और शैम्पू ही नहीं, शून्य की खोज भी भारत में ही हुयी थी. अब हम, उन्हें यह दे रहे हैं.






एडवर्ड - अच्छा , तभी गणित , तारा विज्ञान, योग, आयुर्वेद, आध्यात्म आदि में अपने सुविकसित ज्ञान के बावजूद उनमें आत्म गौरव नाम की चीज़ है ही नहीं .


( कृपया शेष वार्तालाप के लिए प्रतीक्षा करें ......)









2 टिप्‍पणियां:

सुनील दत्त ने कहा…

अधिकाँश भारतीय अपने शास्त्रों में लिखे विराट वैज्ञानिक तथ्यों को बकवास और अंधविश्वास भरी कपोल-कल्पित बातें कहकर अपने आपको पढ़े-लिखे और विज्ञान का पक्षधर सिद्ध करने पर तुले हुए हैं. भारत की सदियों पहले हुयी सैकड़ों मौलिक खोजों, आविष्कारों और जानकारियों को पूरी तरह भूलकर वे आत्म विस्मरण की स्थिति में पहुँच चुके हैं. उन्हें यह भी याद नहीं कि जींस और शैम्पू ही नहीं, शून्य की खोज भी भारत में ही हुयी थी

सुज्ञ ने कहा…

अद्भुत निरीक्षण!! सच्चाई!!