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मुसलमानों के साथ क्यों जुड़ गया पिछड़ापन


विभिन्न कांग्रेसी प्रधानमंत्री मुसलमानों की कमजोर आर्थिक हालत का हवाला देते हुए उनके लिए नई योजनाएं और नए अवसरों की बात करते हैं। सच्चर आयोग सहित कई आयोगों और समितियों ने भी इसी तरह की बात कही है। लेकिन ये संस्थाएं और नेता सारे हालात को उनकी पूरी पृष्ठभूमि और समग्रता के चश्मे से देखने में प्रायः नाकाम ही रहे हैं। मुसलमानों के आर्थिक पिछड़ेपन की असलियत को जानने के लिए इस मुद्दे को राजनैतिक पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखने की जरूरत है।


अच्छा होगा अगर हम आरक्षण से सम्बंधित संविधान सभा की कार्रवाई के कुछ भागों को देख लें। लेकिन उससे पहले मैं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के देश के तमाम मुख्यमंत्रियों के नाम लिखे गए 27 जून 1961 के पत्र की कुछ पंक्तियां उद्धत कर रहा हूं- ‘‘अगर हम लोग साम्प्रदायिकता और जातीय आधार पर आरक्षण की ओर बढ़ते चले गए तो हम लोग मेधावी और योग्य लोगों को दूसरे और तीसरे दर्जे पर फेंक देंगे। जब मैं सुनता हूं कि आरक्षण का यह व्यापार साम्प्रदायिकता के आधार पर कितनी दूर तक चला गया है तो मुझे वेदना होती है। यह जानकर मैं और चकित होता हूं कि पदोन्नति के मामले में भी साम्प्रदायिक और जातीय आधार पर वरीयता मिलने लगी है। यह केवल गलती का ही नहीं, विनाश का रास्ता भी है।’’

अब मैं संविधान सभा के कुछ प्रमुख मुसलमान प्रतिनिधियों को उद्धृत करूंगा। पश्चिम बंगाल के निजामुद्दीन अहमद ने और बातों के अलावा कहा था- ‘‘मुस्लिम आरक्षण मनोवैज्ञानिक रूप से पृथक निर्वाचक मण्डल से जुड़ा है और उसका सर्वनाशी परिणाम हमने देख लिया है। इसलिए मैं कहूंगा कि साम्प्रदायिक आरक्षण को आगे बढ़ाने से अप्रिय यादें ताजा होती रहेंगी। जिससे यह कदम हर तरफ कड़वाहट घोलने वाला साबित होगा और मैं कहना तो ये भी चाहूंगा कि अगर ऐसा दस साल के लिए भी आ जाता है तो बहुत ही बुरा होगा। मैं अपनी पूरी ताकत से मुस्लिम आरक्षण का विरोध करता हूं।

उत्तर प्रदेश की बेगम एजाज रसूल- ‘‘मैं सोचती हूं कि आरक्षण आत्मघाती हथियार साबित होगा। जो अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से हमेशा के लिए दूर कर देगा। इससे अल्पसंख्यकों के साथ बहुसंख्यकों के सद्भाव की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। यह अलगाववाद और साम्प्रदायिकता की धारणा को बनाए रखेगा, जिसे समाप्त हो जाना चाहिए। दस वर्षों के लिए भी इसे लागू नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह दस वर्ष देश के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होंगे। मेरा दूसरा तर्क यह है कि अभी भी भारत में अलगाववाद की धारणाएं विभिन्न समुदायों के बीच है। उसे समाप्त होना चाहिए। मैं ऐसा सोचती हूं कि यह अल्पसंख्यकों के हित में होगा कि वह बहुसंख्यकों की धारणा के साथ मिलजुल जाएं।’’

महमूद इस्माइल खां- मैं बहुत प्रसन्न हूं कि अगर सीटों का यह आरक्षण होता तो साम्प्रदायिकता में जीवन संचार होता। मैं बहुसंख्यक समुदाय को इसके लिए धन्यवाद देता हूं। मैं बहुसंख्यक समुदाय को अपनी संख्या बल का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल न करने के लिए भी धन्यवाद देता हूं।’’

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट तरह-तरह की उन मिथ्या धारणाओं पर सरकारी ठप्पा लगाती हैं जो पहले से ही विद्यमान हैं। जैसे मुसलमान शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। क्या केवल मुसलमान ही पिछड़े हुए हैं? अपने इस देश में 3000 से ज्यादा जातियां हैं। उसमें दर्जन-दो-दर्जन ऐसी जातियां हैं जो शैक्षिक या आर्थिक रूप से पिछड़ी नहीं हैं। बाकी सारा समाज पिछड़ा है, इसमें मुसलमान भी हैं। राजनैतिक भागीदारी के लिए भी यही सच है। हजार से अधिक पिछड़ी जातियां होंगी, जिनको राजनैतिक भागीदारी संख्याबल कम होने के कारण नहीं मिल पाती। अंग्रेजी राज के दौरान मुस्लिम मानसिकता में यह बात घर कर गई थी कि मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा का बहिष्कार करना चाहिए। वैसी अंग्रेजी-विरोधी बलबती धारणा हिन्दुओं में नहीं थी। सर सैयद अहमद खां ने मुसलमानों के लिए अंग्रेजी शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। इस दिशा में उन्होंने बहुत काम भी किए। लेकिन आज भी मुसलमानों में वह अवरोध बचा हुआ है। इसी तरह 1947 के बाद दशकों तक चलने वाले हिन्दी आंदोलन के कारण कुछ राज्यों ने शिक्षा पद्धति में हिन्दी का आग्रह बनाए रखा। कुछ अन्य राज्यों ने यह आग्रह नहीं रखा। यह परिणाम जब सामने आया कि ये राज्य सरकारी सेवाओं के मामले में पिछड़ गए हैं, तब इन राज्यों ने प्राथमिक स्तर से ही अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया। ऐसे राज्यों में पश्चिम बंगाल भी है। अब वहां प्राथमिक कक्षाओं से ही अंग्रेजी शिक्षा दी जाने लगी है।

अब तो करीब करीब प्राथमिक कक्षाओं से अंग्रेजी का अध्ययन सभी जगह प्रचलित होता जा रहा है। मुसलमानों में यह हिचक कुछ मात्रा में अभी भी है, बड़ी संख्या में मदरसों का खुलना और उनकी संख्या बढ़ते जाना यह बताता है। सच्चर आयोग ने यह बताया है कि केवल 4 प्रतिशत मुसलमान मदरसा शिक्षा में जाते हैं। लेकिन आम मुसलमान वहां न भी जाता हो तो भी अपने बच्चों को कारीगरी की शिक्षा देते हैं। अभी सच्चर कमेटी के आंकड़ों का पूरा सत्यापन नहीं हुआ है, खासतौर से सामाजिक और शैक्षिक आंकड़ों का।

4 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

आरक्षण बौद्धिक अपंगता और मक्कारी का जनक है ...इसका दूरगामी परिणाम है समाज में वर्गभेद और बिखराव की दृढ स्थापना .........आरक्षित वर्ग के लोग यदि वास्तव में अपना उत्थान चाहते हैं तो स्वयं उन्हें ही इसका विरोध करने के लिए आगे आना चाहिए.

Jai Hindu ने कहा…

देश के नेता यही तो चाहते है और साथ में अल्प्शंक्यक भी !

दीर्घतमा ने कहा…

कौन कहता है की मुस्लिम पिछड़ा है.यह तो उनकी प्रक्रति है

blogtaknik ने कहा…

यह सब दिखावा है. ताकि आरक्षण नि रोटी सकी जा सके नहीं तो भारत में कितने ही गरीब भूखे और पिछड़े लोग है. बहुत से लोग राज ४० रु से भी कम मजदूरी प्राप्त करते है.