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भारत के सर्वनाश करने का बीजारोपण

प्रिय बंधुओ ! 
     इस मानसून सत्र में प्रस्तावित विधेयक-  "साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम ( न्याय एवं क्षतिपूर्ति)  २०११ " भारत को हिंसा की आग में झोंक देने की पृष्ठ भूमि है . अल्प संख्यकों के हित की आड़ में पूरे देश को कई वर्गों में बाँट देने का षड्यंत्र हमें समझना होगा. यदि यह क़ानून बनता है तो इसके दूरगामी परिणाम भारत को खंडित करने वाले होंगे . धर्म के आधार पर एक बार खंडित हो चुके भारत के इतिहास ने पूरे विश्व को यह सन्देश दे दिया है कि भारत को आसानी से खंडित किया जा सकता है . एक पांचवी पास रोमन कैथोलिक महिला स्वतन्त्र भारत में भारतीयों के द्वारा ही भारत के सर्वनाश करने का बीजारोपण कर रही है और हमारा विपक्ष तमाशा देख रहा है . निश्चित ही इस विध्वंसक  क़ानून के बनने  के बाद  देश में एक भयानक साम्प्रदायिक और जातीय आग भड़केगी   ...........एक ऐसी भीषण आग जो ज़ल्दी बुझाए नहीं बुझेगी. एक ऐसी अराजकता उत्पन्न होने वाली है जो बहुसंख्य भारतीयों के मौलिक अधिकारों को निगल जायेगी . जातीय भेदभाव, जो बहुत सीमा तक वर्त्तमान भारत से समाप्त हो चुका है, को पुनः लादने का षड़यंत्र किया जा रहा है. "दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र " के सिद्धांत के आधार पर सारे अल्प संख्यकों का अभूतपूर्व ध्रुवीकरण धर्मांतरण के लिए उत्प्रेरक  का काम करेगा.
 भारतीय समाज को "समूह "नाम की एक और नयी जाति में बाँट देने का षड्यंत्र किया जा रहा है जो निश्चित ही स्वयं को धर्मांतरण के लिए स्वस्फूर्त गति से प्रस्तुत करेगी. मैं जानना चाहता हूँ कि आज शालाओं से लेकर महाविद्यालयों तक और निजी या सरकारी विभिन्न संस्थानों
से ले कर सामाजिक संस्थाओं तक में  सरकारी "आरक्षणवाद"  को छोड़कर और कहीं भी जातीय भेदभाव का कोई भी लक्षण दिखाई दे रहा है क्या ? आज जब अंतरजातीय और अंतर्धर्मीय विवाह तक होने लगे हैं तब इस विधेयक का औचित्य क्या है ? यह विधेयक एक पक्ष को किसी काल्पनिक न्याय दिलाने के नाम पर दूसरे पक्ष के सारे मौलिक अधिकारों का हनन कर उसके साथ घोर अन्याय  करने की घोषणा करता है.
   हम पांचवी पास रोमन कैथोलिक महिला और उसके भक्तों से जानना चाहते हैं कि क्या अभी तक इस प्रस्तावित क़ानून के अभाव में इन अल्प संख्यकों के साथ अन्याय होता रहा है ? क्या देश का वर्त्तमान क़ानून उनकी रक्षा करने में असमर्थ है ? क्या हमारे पास अभी तक कोई समदर्शी क़ानून नहीं था जो इस एकांगी क़ानून की आवश्यकता पड़ गयी .....जो सिर्फ और सिर्फ एक वर्ग विशेष के काल्पनिक हितों की चिंता करेगा ? जब आज़ादी के बाद अभी तक भारतीय राजनेता, जो संसद में हर वर्ग का  प्रतिनिधित्व करते रहे हैं भारतीयों की चिंता नहीं कर सके तो एक विदेशी मूल की महिला उनके बारे में कितना निष्पक्ष सोच सकेगी ?  
 प्रिय बंधुओ ! आपके पास इन सबका केवल एक ही न्यायपूर्ण उत्तर है जो इन सारे कुत्सित इरादों पर पानी फेर सकता है ...और वह है आपका वोट. समय आने पर इसका सही प्रयोग करने से मत  चूकिएगा.  

3 टिप्‍पणियां:

drshyam ने कहा…

एक दम सच.....

vidhya ने कहा…

सच

blogtaknik ने कहा…

हमारा भारत देश सन 1947 में आज़ाद होते ही गुलाम हो गया था
किंयूकी भारत 1947 से ही गाँधी नेहरू परिवार (कॉंग्रेस) का गुलाम है और उसके राजशाही शासन के अधीन ह. आज फिर ये काला कानून बना रहें है और हम आज भी गुलाम बन कर तमासा देख रहें है.