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गोधरा नरसंहार पर न्यायालय का निर्णय


गोधरा नरसंहार के नौ वर्ष बाद आये विशेष न्यायालय के फैसले में 11 अभियुक्तों को मृत्युदण्ड और 20 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी है। न्यायालय ने मुख्य अभियुक्त मौलवी उमरजी सहित 63 अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया; वहीं तत्कालीन कांग्रेस पार्षद हाजी बिलाल पर अभियोग सिद्ध हुआ है। न्यायालय ने उसे मौत की सजा सुनाई है।


27 फरवरी 2002 को अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों को साबरमती एक्सप्रेस की एस-6 बोगी में बाहर से घेर कर जीवित जला दिया गया था। न्यायालय ने अपने फैसले में इसे आपराधिक षड्यंत्र मानते हुए दोषियों को सजा सुनाई है। नरसंहार की साजिश रचने वाली कोर कमेटी के जिन 11 लोगों पर इसके लिये एक हजार लोगों की भीड़ जुटाने तथा बोगी को जलाने के लिये 100 लीटर पेट्रोल एकत्र करने का आरोप सिद्ध हुआ है उन्हें मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गई है।

न्यायालय ने पाया कि इस घटना को अंजाम देने के लिए दोषियों ने एक टीम बनाई थी। इसमें हाजी बिलाल, सलीम जर्दा, शौकत अहेमद चरखा उर्फ लालू (फरार), सलीम पानवाला (फरार), जबीर बिनयामीन बहेरा, अब्दुलरजाक कुरकुरे, अब्दुलरहेमान मेंदा उर्फ बाला, हसन अहेमद चरखा उर्फ लालु, महेमुद खालिद चांद आदि शामिल थे। इनकी सहायता के लिए एक सहायक टीम भी बनाई गई थी, जिसमें फारुक अहमद भाण(फरार), महंमद अहमद हुसेन उर्फ लतिको, इब्राहिम अहमद भटकु उर्फ फेटु (फरार) शामिल थे। फरार होने वालों में कई लोगों के पाकिस्तान में होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।


जिन 59 कारसेवकों को इस नृशंस घटना में जीवित जला दिया गया था, उनके परिवारीजनों और निकट के लोगों के लिये यह एक शांतिदायक निर्णय है। दो दिन पहले ही इस घटना की नौवीं बरसी थी। घटना में मरने वालों में 27 महिलाएं और 10 मासूम बच्चे भी शामिल थे। 22 फरवरी को विशेष अदालत के न्यायाधीश पी.आर. पटेल ने गोधराकांड को दुर्लभ से दुर्लभतम करार देते हुए 31 आरोपियों को दोषी ठहराया था और अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

इसके साथ ही लोगों की निगाहें फैसले पर टिक गयी। कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सबूत के अभाव में छोड़े गये आरोपियों के जेल में बीते नौ सुनहरे वर्षों का हिसाब मांगना भी शुरू कर दिया है। केन्द्र सरकार को यह फैसला मुश्किल में डाल सकता है। फैसले ने जहां नानावटी आयोग के निष्कर्षों की पुष्टि की है वहीं संप्रग-1 में रेल मंत्रालय द्वारा गठित बनर्जी समिति द्वारा प्रस्तुत रपट में दिये गये तर्कों को तार-तार करके रख दिया है। इसके साथ ही सरकार की यह मंशा भी उजागर हो गयी है कि बनर्जी समिति के गठन का फैसला एक राजनैतिक फैसला था जिससे देश में भ्रम का वातावरण उत्पन्न करने का प्रयास किया गया।

वैसे तो यह सीधा-सपाट सा न्यायिक फैसला है जिस पर अभी टिप्पणी करना जल्दी होगी। यह भी स्पष्ट ही है कि सजा पाने वाले सभी अभियुक्त उच्च न्यायालय में अपील करेंगे। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इसे धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल और पेशेवर मानवाधिकार कार्यकर्ता इस फैसले को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं। साथ ही घटना के समय मरने वाले मासूम बच्चों को हिन्दू एक्सट्रीमिस्ट करार देने वाले बीबीसी और एएफपी जैसे मीडिया हाउस इसे अंतरराष्टीय स्तर पर कैसे पेश करते हैं, यह भी इस मुद्दे पर देश में अगले कुछ दिन चलने वाली बहस की दिशा तय करेगा। (01 मार्च 2011)

4 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

अपील ......फिर अपील ......और इस बीच अपराधियों की उम्र हो जायेगी ८० साल ........बस हो गया ....यही है हमारी न्याय व्यवस्था. सारी शक्ति तो प्रज्ञा सिंह के लिए बचा कर रखी जाती है ....
दुनिया के आतंकियों ! भारत ज़न्नत है तुम्हारे लिए ...आओ, यहीं बस जाओ.

Jai Hindu ने कहा…

सही कहा कौशलेन्द्र जी आपने क्या किया जाय गलती अपनों मैं ही है तो ! जब देश की रक्षा करने वाले ही युद्ध को छोड़ कर अंहिंसा का पाठ पढने लगते है और उसी को अपना धर्म मान लेते हैं और जब अपनी जाती मैं जैचंद पैदा होने लगते हैं तो यही हाल होता है की देशी विदेशी बन जाते हैं और विदेशी लोग देशी बन जाते है !

दीर्घतमा ने कहा…

यह सब सेकुलरो को दिखाई नहीं देता यह सत्य नहीं कोई देखता की जब-तक हिन्दू है तभी तक भारत है जहा-जहा हिन्दू है वह दंगा नहीं जहा मुस्लिम जाड़े है दंगे वही क्यों हमें बिचार करना होगा.

blogtaknik ने कहा…

और फांसी हो भी गई तो गृह मंत्रालय उसकी फांसी की फाइल को रक् कर रखेगा. बसर्ते आरोपी मुस्लिम होना चाहिए पर हिंदू को फांसी की सजा मिलने पर सरकारी तंत्र ग्लोकोन डी. पीकर कार्य करते है.