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सरहद पे या कि घर में जान जाए जवान की

सर पर कफन को बांधे बढ़ता हूँ मैं मगर,
चिंता कहाँ है उनको मेरी जान की.......

वो ज़ेब ही भरने में हर पल रहे मग्न,
मुझको सदा है चिंता मेरे भारत महान की.......

टाटा बढ़ेगा क्यूँकर रिलायंस को फायदा हो,
उन्हें फ़िक्र कहाँ मजदूर की किसान की .........

तोपों में हो घोटाला बेशक बुल्ट हो नकली
सरहद पे या कि घर में जान जाए जवान की .........

हिन्दू मरा या मुस्लिम इसकी फ़िक्र किसे है,
लाशों पे ही रखी है नीव मेरे मकान की .........

बेशक तेरे कहर से मेरी जबां बंधी है,
ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की...........

1 टिप्पणी:

कौशलेन्द्र ने कहा…

"लाशों पे ही रखी है नींव तेरे मकान की"
मेरा क्या, मैं तो निकला हूँ कफ़न साथ लेके
देखी है हैवानियत मैंने इस शैतान की.
गुप्त जी ! देश भक्तों के साथ यही हो रहा है आजकल.