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निश्चल प्रेम का प्रतीक ....hachiko

मेरी पत्नी ने हाल ही में एक फिल्म देखी है .....कई बार उसका ज़िक्र कर चुकी है ......Hachiko ..a dogs tale ............. ये जापान की एक सच्ची कहानी पे आधारित है .....1924 की बात है एक जापानी प्रोफेस्सर को रेलवे स्टेशन से एक कुत्ते का बच्चा मिल गया और उन्होंने उसे पाल लिया ..........उसका नाम रखा Hachiko ........धीरे धीरे दोनों में बहुत ज्यादा प्रेम हो गया .........प्रोफेस्सर प्रतिदिन अपने शहर Shibuya से ट्रेन पकड़ कर दूसरे शहर जाया करते थे ...एक दिन जब वो घर से निकले तो hachiko भी पीछे पीछे आ गया ...अब प्रोफेस्सर परेशान ...करें तो क्या करें .......बहुत समझाया पर hachiko कहाँ मानने वाला था ......सो उस दिन प्रोफेस्सर को ट्रेन छोड़ देनी पड़ी और वो hachiko को वापस घर ले कर आये .........खैर अगले दिन उसे अच्छी तरह घर में बंद करके चुपचाप घर से निकले और आधे रास्ते पहुंचे तो क्या देखते हैं की जनाब hachiko साहब चले आ रहे हैं पीछे पीछे ........खैर उसे प्यार से समझाया की देखो भैया ,मुझे नौकरी करनी है यार ........कल का दिन तो छुट्टी मरवा दी तुमने ..आज भी करवाओगे क्या ..........जाओ घर जाओ ....पर hachiko जी कहाँ मानने वाले थे , तो दोनों यूँ ही बात करते करते स्टेशन पहुंचे. वहां प्रोफेसर ने उसे बिस्कुट खिला के समझा बुझा के घर भेजा और किसी तरह ट्रेन पकड़ी ..........शाम को जब वापसी की ट्रेन से उतरे तो देखा की जनाब वहीं खड़े हैं रिसीव करने के लिए ....खैर दोनों हँसते खेलते घर पहुंचे और उसके बाद ये एक रूटीन बन गया ....hachiko रोजाना प्रोफेस्सर को ट्रेन पे see off करता और शाम को रिसीव करता .......दोनों हँसते खेलते ...मस्ती करते वापस आते ..........ये सिलसिला दो तीन साल तक चलता रहा .........
एक दिन कॉलेज में पढ़ाते हुए प्रोफेस्सर को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे ..........उस शाम hachiko इंतज़ार करता रहा पर प्रोफेस्सर नहीं आये .........प्रोफेस्सर का अंतिम संस्कार उनके गाँव ले जा कर ,कर दिया गया ...........उनकी पत्नी ने वो शहर छोड़ दिया और hachiko को वो अपनी बेटी और दामाद को दे गयीं ........सब कुछ बदल गया ....दुनिया बदल गयी ...पर एक चीज़ नहीं बदली ......hachiko अब भी हर शाम उस स्टेशन पर इंतज़ार करता था उस गाडी का......... और प्रोफेस्सर का .........कुछ दिनों बाद बेटी और दामाद ने भी वो शहर छोड़ दिया ......वो घर बेच दिया ....और hachiko को वो अपने साथ ले गए .......पर कुछ दिन बाद ही hachiko वहां से गायब हो गया ...........किसी ने उसे ढूँढने की कोशिश भी नहीं की ........इस घटना के 9 साल बाद .........प्रोफेस्सर की बरसी पर एक दिन जब उनकी पत्नी, बेटी और दामाद Shibuya आये तो उन्होंने देखा की hachiko वहीं बैठा था ........उसी जगह ...जहाँ बैठ के वो प्रोफेस्सर का इंतज़ार करता था .........वो बूढा हो गया था पर उसकी आँखों में अब भी वही चमक थी....पिछले 9 साल उसने यहीं इसी स्टेशन पर बिता दिए थे ....प्रोफेस्सर का इंतज़ार करते .......बहुत से लोग उसे जानते थे ...तब से ...जब अच्छे दिनों में वो प्रोफेस्सर को लेने और छोड़ने आया करता था ........वो उसके लिए खाना ले कर आया करते थे ...बहुत से लोगों ने उसे अपने साथ अपने घर ले जाने की कोशिश की ...पर वो कहीं नहीं गया ....स्टेशन में ही एक पुराने रेल के डब्बे के नीचे उसने शरण ले ली थी .........धीरे धीर उसकी वफादारी के किस्से पूरे इलाके में फ़ैल गए ....लोग उसे देखने आने लगे .......और फिर उस शहर के लोगों ने Shibuya स्टेशन पर उसकी एक कांस्य प्रतिमा लगा दी ........जब उस प्रतिमा का अनावरण हुआ तो hachiko वहीं खड़ा था .......8 मार्च 1935 को hachiko का देहांत हो गया .......ठीक उस जगह पर जहाँ वो बैठ के प्रोफेस्सर का इंतज़ार किया करता था ......उसके पैरों के निशाँ आज भी संरक्षित हैं ........और उसकी कांस्य प्रतिमा आज भी Shibuya स्टेशन के गेट नंबर 5 के सामने लगी है ...आज पूरे जापान में hachiko को निश्छल प्रेम और वफादारी का प्रतीक माना जाता है ..........ये उसका original फोटो है जो मैंने wikipedia से लिया है
मेरी पत्नी ने जब से ये फिल्म देखी है वो एकदम emotional हुई पड़ी है ...... उसके आग्रह पर मैंने hachiko के बारे में पूरी कहानी net से जुटाई ........इस दौरान मुझे स्वयं अपने घर का एक किस्सा याद आता है ...एक बैल हुआ करता था हमारे घर ...बहुत तगड़ा था ....बड़े बड़े सींग थे उसके ,इसलिए बड़ सिंघवा बुलाते थे उसे.......फिर एक दिन हमारे ताऊ जी ने उसे बेच दिया .......गाँव में एक परम्परा होती है ........पुराना मालिक नए मालिक के हाथ में जानवर का पगहा पकड़ा के और एक रोटी गुड के साथ खिला के विदा कर देता है .....आज भी याद है मुझे वो दिन .....साफ़ इनकार कर दिया उसने वो रोटी खाने से और बहुत देर तक तो वो हिला ही नहीं अपने खूंटे से ....फिर ताऊ जी ने कहा ....जा बेटा .......जा........और वो चला गया .......बात आयी गयी हो गयी .......तीन चार महीने बीत गए ..........हमारे भाई उन दिनों बनारस के UP college में पढ़ा करते थे ........एक दिन वो घर आये तो उन्होंने बताया की बस में से मैंने आज एक बैल देखा ...एक दम अपने बड़ सिंघवा जैसा था ...पर थोडा लंगडा के चल रहा था .........कोई ख़ास महत्त्वपूर्ण बात तो थी नहीं सो इस पर और कोई चर्चा न हुई .....देर रात लगभग तीन बजे ....बाहर दरवाज़े से जोर से रंभाने की आवाज़ आयी ..........ताऊ जी उठे ...उन्होंने सोचा , शायद कोई सांड आ गया होगा ..........टोर्च जलाए ,बाहर गए तो बड़ सिंघवा अपने खूंटे पर खड़ा था ........बचपन में मुंशी प्रेम चंद की वो कहानी पढ़ी थी ...दो बैलों की कथा ...वही दृश्य था ...........ताऊ जी उसे सहला रहे थे और रो रहे थे .......हड्डियाँ निकल आयी थी बेचारे की .......एक टांग से लंगडा रहा था .....पिछली टांग टूट गयी थी .........सुबह होते होते पूरा गाँव जुट गया ,ये दृश्य देखने .......हमारे भाई लोग गए ,और उसे पकड़ कर लाये जिसने बैल बिकवाया था ......चार हाथ दिए तो उसने बक दिया की जिसे बेचा था वो किसान नहीं था बल्कि बैल गाडी वाला था और बनारस की अनाज मण्डी में गाडी चलाता था ( पुराने ज़माने में लोग खेत जोतने वाले को ही अपना जानवर बेचते थे ....गाडी वालों को नहीं..........अब तो सीधे कसाइयों को बेच देते हैं ) खैर अगले दिन उस गाडी वाले को भी पकड़ कर लाये और अच्छी मरम्मत की .........हुआ यूँ था की शहर में गाडी खीचते टक्कर लग गयी और बैल की टांग टूट गयी ............अब लंगड़ा बैल गाडी वाले के किस काम का सो उसने लावारिस छोड़ दिया .........शहर में लावारिस जानवर ..........वो जानता था की अब कहाँ शरण मिलेगी सो लंगडाता ही चल दिया घर की तरफ .....और लगभग 20 दिन बाद घर पहुंचा ..........हम लोगों ने उसकी सेवा सुश्रुषा की और कुछ हफ़्तों में ही उसकी टांग ठीक हो गयी ..........फिर वो ता उम्र हमारे पास ही रहा ...........जानवर कहते हैं हम उन्हें ..............beasts ..... पर उन्हें प्यार कर के तो देखिये ....फिर आपको पता लगेगा की निश्छल प्रेम .......वफादारी और साहचर्य के असली मायने क्या हैं .....

3 टिप्‍पणियां:

कौशलेन्द्र ने कहा…

तैमूर जी ! बड़ी मार्मिक कहानी लिखी है आपने. हम भी ग्राम्य पृष्ठभूमि से हैं इसलिए ऐसी घटनाओं के अनुभवी हैं. कभी-कभी तो ये मूक पशु ऐसा व्यवहार करते हैं कि उन्हें पशु कहने में खुद को अपमान लगता है. शायद इसी लिए इनका नाम करण करने की प्रथा चली होगी.

chooti baat ने कहा…

अयसा प्यार तो जानवर ही कर सकता है इन्सान के बस की बात नहीं है

Abhishek ने कहा…

कल आपका लेख पढने के बाद मैंने ये मूवी देखि. आपने सच कहा है बड़ी ही अच्छी मूवी है. शायद पहली बार किसी मूवी को देखके मैं इतना इमोसनल हुआ हूँ.