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बाबा रामदेव जी का मेरे घर पर प्रवास

आजाद का मुगदर देख फड़क उठीं बाबा की बाहें

Sep 29, 08:19 pm
उन्नाव, जागरण संवाददाता: अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली पहुंचे बाबा रामदेव ने जब आजाद के साहस भरे किस्से सुने तो रोमांचित हो उठे। आंगन में रखे चंद्रशेखर आजाद के मुगदर को हवा में लहराया और फिर निहाल होते उनकी वीरता को सलाम किया।
माता जगरानी की स्मृति में बने आजाद मंदिर में स्थापित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर घर में दाखिल हुए तो वहां पड़े आजाद के व्यायाम संसाधनों को देख सब भूल गये। उनकी निगाह वहां रखे मुगदरों पर पड़ी तो वे उसे उठाकर भांजने लगे। आजाद की मौसी के परिवारियों ने बताया कि यह वह मुगदर हैं जिन्हें आजाद जी खुद भांजा करते थे। यही उनकी निशानी संजो हम सब रखे हैं। यहां आये लोगों ने इन्हें भांजने का कई बार प्रयास किया लेकिन कोई अब तक सफल नहीं हुआ। उधर बाबा ने कहा योग और तप की बदौलत ही आजाद-आजाद रहे। अंग्रेजी हुकूमत को लोहे के चने चबाने को विवश कर दिया था। ऐसे महान सपूत की माटी को माथे पर लगा कर मैं धन्य हो गया।
किस देश में रहती हो नाम नहीं मालूम

छिद्रान्वेषण .......साहित्यिक कठमुल्लापन......ड़ा श्याम गुप्त...

                       ब्लॉग जगत में भी साहित्यिक ठेकेदारी , हाँ जी हांजी प्रवृत्ति  एवं आलोचना को न सहन कर पाना और उचित समालोचनात्मक जो पक्ष में नहीं हैं  एसी टिप्पणियों का हटाना  खूब चल्र रहा है.....देखिये एक उदाहरण ----
           --------------------अभी हाल में ही किसी स्वनामधन्य ने  निम्न दोहा लिखा...

   और आये----26 comments:----  अधिकाँश प्रशंसा  में ..... सिर्फ दो  स्वस्थ आलोचनात्मक ........................

                                        सुरेश कुमार ने कहा…
 ..बहुत ही खुबसूरत दोहा छन्द...
                                              ZEALने कहा…
  आपकी काव्य रचना के आगे तो सब फीका लगता है। उम्दा दोहे।
                                  
                             रविकर ने कहा…
  गुरुजन के आशीष से, रच देता मति-मन्द | गागर में सागर भरे, दोहा सुन्दर छंद || सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई
                                  kailaash C sharmaa...ने कहा…
   बहुत शानदार दोहे..आभार
                                          S M habeeb ने कहा…
   दोहों में दोहे.... वाह सर बहुत बढ़िया.. सादर.                             . manoj kumar ने कहा
    दोहों पर दोहे। अद्भुत!!
                                          Madan sharmaa ने कहा…
 बहुत ही खुबसूरत रचना ....आभार.
                                              वाणी गीत ने कहा…
 दोहों पर दोहों में ही कहना .. रोचक!
                                            रीता शेखर ने कहा…
    तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध। सर,तेरह-ग्यारह का नियम स्पष्ट करने की कृपा करेंगे तो मैं  भी     कुछ सीख लूँगी| दोहों में दोहे का महत्व बहुत शानदार लग रहा है|
                              कुंवर कुसुमेश ने कहा…
पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद. अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद.
            तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
 सरस्वती की कृपा से, मुझको है यह सिद्ध।१।  ......        वैसे उपर्युक्त पहले दोहे पर ये निवेदन ज़रूर है कि:-      "मुझको है यह सिद्ध" में,अहंकार का भाव.         ऐसे कथनों से इन्हें,माँ शारदे बचाव.................
                                              Babli ने कहा…
बहुत सुन्दर दोहा लिखा है आपने! बेहतरीन प्रस्तुती!
दोहों की ही तरह,एकदम संक्षिप्त और अर्थ-संप्रेषक .
                                           sunil kumar ने कहा…
चार चरण-दो पंक्तियाँ, करती गहरी मार। कह देती संक्षेप में, जीवन का सब सार। दोहों में दोहे का महत्व बहुत शानदार.....
                             पोस्ट लेखक दोहाकार -ने कहा…
आदरणीय कुँवर कुसुमेश जी! मैं बहुत ही विनम्रता से आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि-   पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद.  अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद. ------इस दोहे में भी प्रथम चरण में एक मात्रा बढ़ी हुई है। --  अन्त में  यही कहना चाहता हूँ कि- 
"जिसके सिर पर हो सदा, माता का आशीष। 
वो ही तो कहलाएगा,वाणी का वागीश।।"
                          Dilbag virk ने कहा…
सचनुच आप दोहों में सिद्ध है ...     
                             सिर्फ कुंवर कुसुमेश जी ने ....कुछ यथातथ्य अशुद्धि  की बात निम्न  तरह  की ....

                     "वैसे उपर्युक्त पहले दोहे पर ये निवेदन ज़रूर है कि:-

                  मुझको है यह सिद्ध" में, अहंकार का भाव.
  ---यह एक दम सत्य व उचित टिप्पणी   हैं ..                                     -----परन्तु लेखक ... को नागवार गुजरती है ...वह कहता है ...
        आदरणीय कुँवर कुसुमेश जी!    मैं बहुत ही विनम्रता से आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि-       पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद.         (१३-११ )   ...      अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद.    (१३-११)   - इस दोहे में  प्रथम चरण में एक मात्रा बढ़ी हुई है                           --लेखक ने फिर एक अशुद्ध दोहा दे मारा...-----अन्त में यही कहना चाहता हूँ कि-                "जिसके सिर पर हो सदा, माता का आशीष।   (१३-११ )     
          वो ही तो कहलाएगा, वाणी का वागीश।।"    (१४-११ ).............       -------------मैंने स्वयं जब टिप्पणी दी कि .....कुशुमेश जी का दोहा तो ठीक मात्राओं वाला है ..परन्तु आपके   दोहे में कुशुमेश जी द्वारा कथन (मुझको है यह सिद्ध ..)...में अहंकार झलकता है ..उचित ही है ..इस    प्रकार के वाक्य नहीं लिखने चाहिए.......वाणी  का वागीश ...शब्द भी त्रुटिपूर्ण है वागीश..का अर्थ ....स्वयं वाणी  का ईश है ...एवं आपके ही इस दोहे के तीसरे चरण में एक मात्रा भी अधिक है ....कृपया ठीक करें ....

वैसे प्रवीण जी सही कह रहे थे जब धर्म सॅकट मे पड जाऐ तो उसके लोगो का परम कर्तब्य है कि वे अपने धर्म की रक्षा मे अपना तन मन धन लगा दे फरवरी ०५ २००७ का पेपर पढा तो पता चला की अयोध्या के पवित्र राम मन्दिर जिसके लिऐ अनगिनत रामसेवक जला दिये गये उस मन्दिर के प्रसाद वितरण के लिये धन की ब्यवथा नही हो पा रही है और हैदराबाद के एक निजाम खान साहब ने वहा प्रसाद भिजवाया क्या २५ अरब हिन्दू मे से एक भी हिन्दू ऐसा नही जो वहा प्रसाद की ब्यवथा कर सके तो वही राजस्थान के सनातन सन्था के मासिक पत्रिका मे गुजरात के एक सन्त कहते है कि अगर २५ अरब हिन्दू मे से एक भी अपने मन्दिर की रखवाली नही कर सकता है तो हिन्दूओ को धिक्कार है ये हिन्दू आखिर किस लिये जी रहे है पिछ्ले १४ सालो से अयोध्या मे राम मन्दिर नही बन पा रहा है क्यो नही बन पा रहा है आखिर किसी हिन्दू ने ये सोचा शायद किसी ने यह जानने की कोशिश नही की आखिर हिन्दू कब जागेगा आखिर कब नीचे चित्र मे देखे कि कि प्रकार रामजन्मभूमि-आन्दोलन मे हिन्दूओ को जलाया गया

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धर्म व सन्क्रिति की रक्षा मे सर्मपित
soujanya se - उत्तराखण्डी शेर






वेद और गीता के बारे में असत्य प्रचार का निराकरण....ड़ा श्याम गुप्त....



वेद व गीता पर दुरभिसंधि ..पर प्रत्युत्तर....ड़ा श्याम गुप्त...

                                          
                         ' धर्म की बात' ...ब्लॉग पर हिदू धर्म व गीता के विरुद्ध कुछ प्रश्न व शंकाएं खड़ी की गयी हैं जो निम्न हैं... इन सर्वथा असत्याचरण पूर्ण , अज्ञानतापूर्ण शरारते बातों का  हम साथ ही साथ प्रत्येक का बिन्दुवार निराकरण करेंगे....
 धर्म की बात-
Monday, May 16, 2011 --''वेदों की निंदक गीता''

          पुस्‍तक ''क्‍या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्‍दू धर्म?'' डा. सुरेन्‍द्र कुमार शर्मा 'अज्ञात' विषय ''वेदों की निंदक गीता'' में लिखते हैं कि वेद और गीता के अतिरिक्ति सभी धर्म ग्रंथ मानव रचित माने जाते हैं ...वेदों और गीता का विषयगत विश्‍लेषण इस निर्णय पर ले जाता है कि ये दोनों धर्म ग्रंथ एक ही 'धर्म' के नहीं हो सकते और नही इन का र‍चयिता एक ही तथाकथित परमात्‍मा हो सकता है-----
-अज्ञानपूर्ण कथ्य-वेदों में  जगह जगह इच्‍छा और कामना पर बल दिया गया है-
      कुर्वन्‍नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्‍छतं समाः
     एवं त्‍वयि नान्‍य‍थेतोऽस्ति न कर्म लिप्‍यते नरे- यजु 40/2
       ---अर्थातः हे मनुष्‍यों, कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्‍छा करो

जबकि गीता कहती है-----मा कर्मफलहेतुर्भूः - गीता 2/47.....अयुक्‍त- काकारेण फले सक्‍तो निबध्‍यते - गीता 5/12
अर्थात फल की इच्‍छा रखने वाले व्‍यक्ति फल में आसक्‍त होते हैा और बंधन में पड़ते हैं..
---निराकरण ---कोई  बच्चा भी उपरोक्त को पढकर जान सकता है कि वेदों में इच्छाओं व कामनाओं पर नहीं अपितु उचित सत्कर्म करने पर बल दिया गया है ...न कर्म लिप्यते नर..अर्थात कर्मों  में लिप्त नहीं होना है ....वही भाव गीता में है .......कर्म तो करना है पर फल की इच्छा से नहीं ....

-अज्ञान पूर्ण कथ्य -वेदों की ऐसी खाल तो नास्तिकों ने भी नहीं उतारी होगी जैसी गीता ने उतारी है, गीता -में वेदों के नाम पर गलत बयानी की गई है, वेदों में कहीं भी ईश्‍वर को 'पुरूषोत्‍तम' नहीं कहा गया, लेकिन गीता के 15 वें अध्‍याय में गीता का वक्‍ता स्‍वयंभू ईश्‍वर कहता हैः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित- पुरूषोत्तमः - 15/18
अर्थात में लोक और वेद में 'पुरूषोत्तम' के नाम से प्रसिद्ध हूं

----निराकरण -- वेदों में प्रसिद्द ..श्लोक ... अणो अणीयान, महतो महीयान ...कहा गया है ईश्वर को .......श्वेताश्रोपनिषद में ....समाहुग्र्यं पुरुष महान्तं ....कहा गया है  इन का अर्थ 'पुरुषोत्तम ही है.....
 
-अज्ञानपूर्ण कथ्य-वेदों में  अवतारवाद का सिद्धांत है, वेदों में परमात्‍मा के अवतार धारण करने का कहीं उल्‍लेख नहीं मिलता, पर गीता का यह एक प्रमुख सिद्धांत है......
यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत
अभ्‍युतथानमधर्मस्‍य तदात्‍मानं सृजाम्‍यहम
परित्राणाय साध्‍ूनां विनाशाय च दुष्‍क़ताम्
धर्म संस्‍थापनार्थाय संभवामि युगेयुगे - गीता 4/7-8-अर्थात जब जब धर्म की ग्‍लानि होती और अधर्म की उन्‍नति होती है, तब तब मैं अर्थात (भगवान कृष्‍ण) पैदा होता हूं, साधुओ की रक्षा और पापियों के विनाश के लिए तथा धर्म को स्थापित करने के लिए मैं हर युग में पैदा होता है |
 -निराकरण ---  सही है गीता व सभी अवतार  वेदों के बहुत बाद की बातें है .... वेदों में अवतारका वर्णन  कैसे होगा ........सृष्टि के समय ब्रह्मा द्वारा. सृष्टि रचना पर ऋग्वेद में कहा गया  है........उन्होंने --- यथा पूर्वम अकल्पयत ....अर्थात प्रत्येक कल्प में ,युग में नवीन सृष्टि ....पूर्व के सामान ही होती है......यह सूत्र रूप में अवतारवाद की अवधारणा है |.....

-अज्ञान पूर्ण कथ्य-एक धर्म के दो धर्मग्रंथों में ऐसा पारस्‍पारिक विरोध हिन्‍दू धर्म की ही विशेषता है , हम दोनों धर्म ग्रंथों में से एक को पूरी तरह अस्‍वीकार करें, विद्वानों का एक विशेषतः आर्यसमाजियों ने पिछली शताब्‍दी में ही वेद और गीता के इस पारस्‍पारिक विरोध को पहचान कर अपने अपने ढंग से इस का परिहार करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं ,स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के शिष्‍य प. भीमसेन शर्मा ने इस और सब से प्रथम ध्‍यान दिया और कदम भी उठाया, उन्‍होंने देखा कि गीता का ईश्‍वर साकार है जो वेदों में कथित निराकार ईश्‍वर के सिद्धांत के विपरीत है ...
---निराकरण----तेत्तिरीयोपनिषद में ( यथा -यजुर्वेद )---कथन है... असद इदमग्रे  आसीत , ततौ वे सदजायत ....वह निराकार था उससे साकार की उत्पत्ति हुई........ईश्वर-ब्रह्म   दोनों रूप है , अपने मूल रूप में ..निराकार और लौकिक ..संसारी माया रूप -जीव रूप में... साकार ..ज्ञानी लोग ही यह जान पाते हैं ......यही गीता में भी दर्शाया गया है .....

-५-अज्ञानपूर्ण कथ्य-गीता ---सब एक ही ब्रह्म के रचे हुए हैं सुनिए कृष्‍ण के द्वारा ही-
ॐ तत्‍सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्‍पृतः
ब्राह्मणास्‍तेन वेदाश्‍च यज्ञाश्‍च विहिता पुरा - गीता 17/23
अर्थात हे अर्जुन, ओम् तत, सत ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदधन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेदा यज्ञ आदि रचे गए हैं  ...गीता में कृष्‍ण स्‍्पष्‍ट घोषना कर रहे हैं कि सब से प्रमुख वेद सामवेद में ही हूं-
वेदानां सामवेदा स्मि - गीता 10/22
---निराकरण --- सत्य ही तो है श्री कृष्ण ...आत्म-ब्रह्म के रूप में यह घोषणा कर रहे हैं ...तो प्रत्येक वस्तु ब्रह्म ही तो है....तत सत् ...का अर्थ है ....तू वही  ब्रह्म है.... चार महा वेद - वाक्य हैं ...हं ब्रह्मास्मि . तत्वमसि , सर्व खल्विदं ब्रह्म, सोहं...मैं, तू, वह सभी ब्रह्म हैं ---

-अज्ञानपूर्ण कथ्य -पुस्‍तक ''कितने अप्रासंगिक हैं धर्मग्रंथ'' में स. राकेशनाथ विषय 'गीता कर्मवाद की व्‍याख्‍या या कृष्‍ण का आत्‍मप्रचार'' में लिखते हैं गीता में कृष्‍ण्‍ ने अधिकांश समय आत्‍मप्रचार में लगाया है, गीता के अधिकांश श्‍लोकों में 'अस्‍मद' शब्‍द का किसी न किसी विभक्ति में प्रयोगा किया गया है, 'अस्‍मद' शब्‍द उत्तम पुरूष के लिए प्रयोग किया जाता है हिन्दी में इसका स्थानापन्‍न शब्‍द 'मैं' है

गीता में कुल 700 श्‍लोक हैं, कृष्‍ण ने 620 श्‍लोक कहे
375 बार 'मैं' का प्रयोग किया, इससे यह निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है पूरी गीता में कृष्‍ण में, मुझ को, मैं ने, मेरे लिए, मेरा आदिा शब्‍दों द्वारा अपनी ही बात कहते रहे हैं, अर्जुन के लिए जो कुछ कहा वह अपनी बात समझने का जोर डालने के लिए

सातवें अध्‍याय में 30 श्‍लोक हैं, इन में से दो श्‍लोकों (20 व 26) को छोड कर शेष सब के साथ 'मैं' मौजूद है, कुछ पंक्तियां देखिए-
श्रीमद् भगवद् गीता 7/6/11 का अनुवादः
अर्थात में सारे संसार का उत्‍पत्त‍ि और प्रलय सथान अर्थात मूल कारण हूं, मेरे (6)अतिरिक्‍त दूसरी वस्‍तु कुछ भी नहीं, यह सारा संसार मुझ में इस प्रकार गुंथा हुआ है जैसे धागे में मणियां पिरोई रहती हैं (7) है अर्जुन में जल में रहस हूं तथा सुर्य चंद्रमा में प्रकाश हू, मे सारे वेदों में ओंकार हूं, मैं आकाश में शब्‍द हूं, मैं मनुष्‍यों में पुरूषार्थ हूं (8) मैं धरती में पवित्र गंध हूं और में अग्नि में तेज हूं, मैं सारे प्राणियों में जीवन तथा तपस्वियों में तप हूं (9) है पार्थ मुझे सारे प्राणियों का सनातन कारण समझ में बुद्ध‍िमानों की बु‍द्धि‍ और मैं तेज वालों का ते जूं (10) में बलवानों का काम तथा राग रहित बल हूं,मैं प्राणियां में र्ध्‍मानुकूल कामवासना हूं (11)

कया कृष्‍ण जी से यह पूछा जा सकता है कि जब आपके सिवा सारे संसार में कुछ है ही नहीं तो ये बढिया वस्‍तुएं छांटने से क्‍या लाभ?
---निराकरण--- वेदिक वाक्य है...अणो अणीयान् महतो महीयान ....वह ब्रह्म कण कण में है ....कृष्ण ...स्वयं ब्रह्म -जीव की भांति चर्चा कर रहे हैं तो अस्मद का प्रयोग क्यों नहीं होगा....वेदों में स्वयं ब्रह्म कहता है----एकोहं बहुस्याम .... अहं = मैं शब्द का प्रयोग है....

७ -अज्ञानपूर्ण कथ्य--अगर आजकल कृष्‍ण किसी को गीता का उपदेश दें तो उन्‍हें अपनी विभूतियों में निम्‍नलिखित तत्‍व और बढाने पडेंगे, ''है अर्जुन में आयुधों में परमाणु हूं, रेलगाडियों में डीलक्‍स हूं, नेताओं में जवाहरलाल नेहरू हूं, सिने गाय‍िकाओं में लतामंगेश्‍कार हूं, होटलों में 'अशोका होटल' हूं, चीनियों में माओत्‍से तुंग हूं, प्रधान मंत्रियों में चर्चिल हूं, फिल्‍मों में 'संगम' हूं, मदिराओं में ह्वि‍स्‍की हूं, पर्वतारोहियों में तेनसिंह हूं, ठगों में नटरलाल हूं''

निराकरण --- सत्य है...कण कण में ब्रह्म है तो यह भी कहना असत्य नहीं होगा......परन्तु लौकिक रूप में , सांसारिक-मायिक -व्यावहारिक रूप जो श्रेष्ठ है उसी में ' मैं'......मैं कहने, होने के लिए ..योगेश्वर बनना पड़ता है...कृष्ण बनना पडता है...ब्रहम -रूप में आत्मसात होना पड़ता है तब कोई बनता है...ब्रह्म का  'मैं '....
 
८ -अज्ञानपूर्ण कथ्य--न जाने कैसा विचित्र समय था और कैसे अज्ञानी लोग थे, ईश्‍वर को भी जानने वाला कोई नहीं था उसे अपना परिचय स्‍वयं कराना पडा, अपनी एक एक बात विस्‍तारपुर्वक बतानी पडी नीति तो यह बताती है कि अपने गुणों का स्‍वयं बखाने करने से इंद्र भी छोटा बन जाता है
'इंद्रोऽपि लघुतां याति स्‍वयं प्रख्‍यापितैर्गुणै'
---निराकरण-- निश्चय ही यह नियम  इंद्र ( समस्त देव गण )= इद्रियाँ , सांसारिक -भाव युक्त ...जीव के लिए है .....ब्रह्म --प्रत्येक बिंदु पर ..अपना परिचय देता है ..कि मनुष्य मेरे गुणों पर चले ...परन्तु इन्द्रियों से भ्रमित मानव अपनी महत्ता को प्रख्यापित करने में मग्न ..कुकर्म करता है तो ब्रह्म को चेताना पडता है....यही  वेद  , उपनिषद, गीता, ब्राह्मण, पुराण, शास्त्रों की समान रूप से शिक्षा  है...उनमें कतई अंतर व द्विविधाभाव नहीं है.....वे सभी वेदों से ही अवतरित हैं, होते हैं ...सामाजिक सामयिकता लिए हुये  ....... यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति .....निश्चय ही जो इतने सम्पूर्ण, इतने सुंदर ढंग से जीवन को व्याख्यायित करने वाले ग्रन्थ लिख सकता है ...वह परमात्मा ही  हो सकता है....परम-आत्मा, भगवान ...ऐश्वर्यपूर्ण -ईश्वर ......

कविता लेखन ....मूल प्रारंभिक रूप-भाव......ड़ा श्याम गुप्त....


              ब्लॉग जगत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति हेतु मुफ्त लेखन की सुविधा होने से अनेकानेक  ब्लॉग आरहे हैं एवं नए नए  व युवा कवि अपने आप  को प्रस्तुत कर रहे हैं ....हिन्दी व भाषा एवं  समाज के लिए गौरव और प्रगति-प्रवाह की बात है ......परन्तु इसके साथ ही यह भी प्रदर्शित होरहा है कि .....कविता में लय, गति , लिंगभेद, विषय भाव का गठन, तार्किकता, देश-काल, एतिहासिक तथ्यों की अनदेखी  आदि  की जारही है |  जिसके जो मन में आरहा है तुकबंदी किये जारहा है | जो काव्य-कला में गिरावट का कारण बन सकता है|
              यद्यपि कविता ह्रदय की भावाव्यक्ति है उसे सिखाया नहीं जा सकता ..परन्तु भाषा एवं व्याकरण व सम्बंधित विषय का उचित ज्ञान काव्य-कला को सम्पूर्णता प्रदान करता है |  शास्त्रीय-छांदस कविता में सभी छंदों के विशिष्ट नियम होते हैं अतः वह तो काफी बाद की व अनुभव -ज्ञान की बात है  परन्तु प्रत्येक नव व युवा कवि को कविता के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान की छोटी छोटी मूल बातें तो आनी  ही चाहिए |   कुछ  सहज सामान्य प्रारंभिक बिंदु  नीचे दिए जा रहे हैं, शायद नवान्तुकों व अन्य जिज्ञासुओं के लिए सार्थक हो सकें ....
(अ) -अतुकांत कविता में- यद्यपि तुकांत या अन्त्यानुप्रास नहीं होता परन्तु उचित गति, यति  व लय अवश्य होना चाहिए...यूंही कहानी या कथा की भांति नहीं होना चाहिए.....वही शब्द या शब्द-समूह बार बार आने से सौंदर्य नष्ट होता है....यथा ..निरालाजी की प्रसिद्ध कविता.....
"अबे सुन बे गुलाव ,
भूल  मत गर पाई, खुशबू रंगो-आब;
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा -
कैपीटलिस्ट ||"

(ब )- तुकांत कविता/ गीत आदि  में--जिनके अंत में प्रत्येक पंक्ति  या पंक्ति युगल आदि में (छंदीय गति के अनुसार)  तुक या अन्त्यानुप्रास समान होता है...
-- मात्रा -- तुकांत कविता की प्रत्येक पंक्ति में सामान मात्राएँ होनी चाहिए मुख्य प्रारंभिक वाक्यांश, प्रथम  पंक्ति ( मुखडा ) की मात्राएँ गिन कर  उतनी ही सामान मात्राएँ प्रत्येक पंक्ति में रखी जानी चाहिए....यथा ..

 "कर्म      प्रधान      जगत      में    जग   में,  =१६ मात्राएँ 
 (२+१ , १+२+१ ,  १+१+१ ,  २ ,  १+१ , २  =१६)
  प्रथम       पूज्य    हे     सिद्धि     विनायक  |  = १६.
(१+१ +१,  २+१,    २ ,   २+१ ,     १+२+१+१   =१६ )

  कृपा       करो       हे       बुद्धि      विधाता ,         = १६ 
(१+२ ,   १+२ ,     २ ,      २+१     १ +२ +२     =१६  )

 रिद्धि       सिद्धि      दाता         गणनायक ||   =  १६
(२+१,      २+१ ,     २+२ ,       १+१+२+१+१  =१६ )

-लिंग ( स्त्रीलिंग-पुल्लिंग )---कर्ता व कर्मानुसार.....उसके अनुसार उसी  लिंग का प्रयोग हो.... यथा ....
       " जीवन  हर वक्त लिए एक छड़ी होती  है "  ----यहाँ  क्रिया -लिए ..कर्ता  जीवन का व्यापार   है..न कि छड़ी  का  जो समझ कर  'होती है '  लिखा गया ----अतः या तो ....जीवन हर वक्त लिए एक छड़ी होता है ....होना चाहिए ...या  ..जिंदगी  हर वक्त लिए एक छड़ी होती है ...होना चाहिए |
- इसी प्रकार ..काव्य- विषय का --काल-कथानक का समय  (टेंस ), विषय-भाव ( सब्जेक्ट-थीम ), भाव (सब्सटेंस), व  विषय क्रमिकता,  तार्किकता , एतिहासिक तथ्यों की सत्यता,  विश्व-मान्य सत्यों-तथ्यों-कथ्यों  ( यूनीवर्सल ट्रुथ ) का ध्यान रखा जाना चाहिए....बस .....|
४-- लंबी कविता में ...मूल कथानक, विषय -उद्देश्य , तथ्य व देश -काल  ....एक ही रहने चाहिए ..बदलने नहीं चाहिए .....उसी मूल कथ्य व उद्देश्य को विभिन्न उदाहरणों व कथ्यों से परिपुष्ट करना एक भिन्न बात है ...जो विषय को स्पष्टता प्रदान करते  हैं  ....

                           -और सबसे बड़ा नियम यह है कि ...स्थापित, वरिष्ठ, महान, प्रात: स्मरणीय ...कवियों की सेकडों  रचनाएँ  ..बार बार पढना , मनन करना  व उनके कला व भाव का अनुसरण करना .......उनके अनुभव व रचना पर ही बाद में आगे शास्त्रीय नियम बनते हैं......





भीड़ के सत्य में खोता वास्तविक सत्य

न्मादित भीड़ का निर्णय कैसा भी हो उस निर्णय का परिणाम जो दृष्टिगोचर होता है उसे नकारा नहीं जा सकता ...वह भी एक सत्य ही है ...भले ही सापेक्ष क्यों न हो. भीड़ की भावना समुद्र के एक ज्वार की तरह है. एक पल आती है दूसरे पल चली जाती है.....रह जाती हैं रेत पर ज्वार के साथ आयीं कुछ चीज़ें .....कुछ शंख...सीपें ...और शायद कभी कभी कोई मोती भी. पर जिस तरह मोती की संभावना अति क्षीण होती है उसी तरह भीड़ के ज्वार के साथ किसी सुपरिणाम की संभावना भी क्षीण ही होती है .

भीड़ में तात्कालिक परिस्थितिजन्य आवेश होता है जो भीड़ के कृत्य को दिशा देता है. आवेश यदि सकारात्मक है तो दिशा ठीक होगी अन्यथा भीड़ विनाश को साथ लेकर चलती है. पर यह आवेश कैसा भी हो ..स्थायी नहीं होता. इस अनस्थायित्व के कुछ सद्गुण हैं तो कुछ दुर्गुण भी. 

पहले बाबा रामदेव के साथ भीड़ थी.....ज्वार आया ....चला गया. 
भ्रष्टाचार यथावत रहा.

फिर अन्ना जी आये ......ज्वार आया .....चला  गया 
भ्रष्टाचार यथावत रहा. 

सरकारी कार्यालयों की राम कहानी वही है. पहले रिश्वत देकर काम हो जाता था अब तो रिश्वत देकर भी काम नहीं होता. पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ में काम न करने की अपसंस्कृति ने जन्म लिया है. पहले काम इसलिए लटकाया जाता है कि पहले रिश्व्वत मिल जाय फिर देखेंगे. अधिकारियों के हाथ-पैर जोड़-जोड़ कर परेशान और फिर शिकायतें कर कर के थका हुआ आम आदमी जब रिश्वत दे देता है तब भी काम नहीं होता क्यों कि अब तो रिश्वत मिल गयी है ..काम नहीं करूंगा तो क्या कर लोगे ? शिकायत करना है तो करो .....

शिकायत से भी कुछ नहीं होता ...फिर दुखी -पीड़ित आदमी अदालत जाता है, वहां वकील उलटे अस्तुरे से मुड़ने के लिए तैयार बैठा रहता है. ...अदालत में वर्षों केस चलता रहता है. परेशान आदमी पूछता है कि आखिर फैसला कब होगा? ज़वाब मिलता है कि यदि प्रतिदिन केसेज की सुनवाई हो तो अभी पुराने ही केस इतने हैं कि उन्हें निपटने में तीन सौ साल लग जायेंगे. 
धड़ाम !
आम आदमी चारो खाने चित्त . 

क्या किया जा सकता है इन परिस्थितियों में ? 

आदमी घर से दूकान या ऑफिस जाने के लिए निकलता है .....रास्ते में जितने भी मंदिर -मस्जिद- गुरूद्वारे- चर्च मिलते हैं सबको बेवकूफ बनाता हुआ ...तगड़ा मुर्गा फंसने की दुआ मांगता हुआ अपने बूचडखाने में पहुंचता है. जहाँ वह दिन भर दूसरे निरीह आदमी का खून पिएगा.  
यही है हमारा राष्ट्रीय चरित्र. 

हम प्रतीक्षा करते हैं कि कोई क़ानून बनेगा तब देखा जाएगा...तब तक तो रक्त पी ही सकते हैं. यह कैसी मानसिकता है जो डंडा खाने पर ही सुधरने के लिए प्रतिज्ञा किये बैठी है इससे पहले बिलकुल नहीं .
कहीं ऐसा तो नहीं कि १९४७ में हम अपना देश चलाने के लिए सक्षम नहीं थे ? आजादी ले तो ली पर सहेजने का शऊर नहीं था .....अभी भी नहीं है. हम कड़े क़ानून की प्रतीक्षा कर रहे हैं. जब तक डंडे से बात नहीं करोगे हम नहीं सुधरेंगे. अभी लोक पालबिल आने में समय है तब तक लूट लेते हैं जितना लूट पायें  फिर तो नहीं ही लूट पायेंगे.             
क़ानून बन बभी गया तो यह मानसिकता कितने दिन तक लोकपाल बिल का पालन कर पायेगी  ? 

अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.......कविता ..डा श्याम गुप्त ....

अनिवार्य हिन्दी कापी और कवि कौ जनमु दिन.....      ( ब्रज भाषा )
कवि गोरखधंधा जी के 
जनमु दिना पे आयोजित गोष्ठी में ,
कविवर  पांडे जी नै -
बडी सकुचाहट ते याद दिलायौ ;
धंधा जी अबहि छै महीना पहलै ही तौ ,
आपने आपुनि जनम दिना हतो  मनायौ |
कवि जी सकपकाय गए , हडबड़ाये , फिरि-
मुसुकावत भये बोले-
पर भैया !, कवि तौ -
अखिल भारतीय कहिलाबै है ;
वाकौ तौ केन्द्र सरकार की नीतिन ते ही,
नातौ होबै है , और -
केन्द्रीय भाषा नीति तौ ,
द्विभाषी है ;
वा जनमु दिना तौ -
असल अंगरेजी आलेख हतो ,
ये तौ वाकी -
अनिवार्य हिन्दी कापी है ||
 

CIA-RAW SPONSORSHIP OF ALL TERROR IN INDIA


By: Satish Chandra

On: 10 Sep 2011 08:42 pm

INDIA IN PERIL -- RAW'S SABOTAGE OF INDIA'S NUCLEAR WARHEADS:// The Delhi High Court blast was carried out by RAW within a couple of hours of my pointing to RAW'S sabotage of India's nuclear warheads, to divert attention from it. See 'What You Should Know About RAW' below.// NEW AIR FORCE CHIEF IS CIA-RAW MAN AS IS NEW ARMY CHIEF-DESIGNATE -- SEE 'WHAT YOU SHOULD KNOW ABOUT RAW' BELOW// The head of the Strategic Forces Command is a Christian and now the head of the Indian Air Force is also a Christian, not to mention that the Defence Minister is a Christian as was his predecessor -

क्या आप कटती हुई गायों को बचाना चाहते है ?


प्रिय भारतवासियों,
उत्तर प्रदेश के बिजनेसमेन (व्यापारीगण) अब स्वचालित आधुनिक मशीन से युक्त कत्लखाने गायों को काटने के लिए बहुत जल्द बनाने जा रहे है ताकि गायों को तीव्र गति से काटा जा सके, उनके मांस को विदेशों में भेजा जा सके और उन्हें बहुत बड़ा लाभ प्राप्त हो सके | अगर ये लोग इसमें कामयाब हो जाते है तो फिर इन कत्लखानो की संख्या पूरे भारत में बहुत तेजी से बढ़ेगी | पूरे देश के लोग इन कत्लखानो को खोलने का पुरजोर विरोध कर रहे है और उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा है कि अगर एक करोड़ लोग भी कत्लखाने खोलने का विरोध करें और इस आन्दोलन की हिमायत करें तो स्वचालित आधुनिक मशीन से युक्त कत्लखाने खोलने की इजाजत व्यापारियों को नहीं दी जाएगी|
हम गायों की पूजा करते है | भारतीय होने के नाते और मानवता के नाते हम ऐसा होते हुवे हरगिज नहीं देख सकते ................ कृपया आप अपना समर्थन अवश्य दें |
अगर आपको लगता है कि इस तरह के कत्लखाने नहीं खुलने चाहिए तो आप कृपा करके 0522-3095743 पर एक मिस कोल जरूर करे| एक घंटी बजने के बाद कोल अपने आप डिस-कनेक्ट हो जाएगी |
जिस तरह से आपने अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के आन्दोलन को सफल बनाया उसी तरह से आप अपना समर्थन दें | इसमें आपका कोई खर्चा नहीं है, बल्कि आपके इस एक मिस कोल से प्रतिदिन कटने वाली हजारों लाखों गायें बच जाएगी |कृपया आप अपने मोबाइल से मिस्कोल जरूर करें और इसे जितने लोगों तक पंहुचा सके पहुचाये |
मैने मिस कोल कर दिया है ........ अब आपकी बारी है क्‍योकि क्‍या आप अपनी माँओ को कटते देख सकते है ?
अभी मिस कोल करे - नंबर है - 05223095743


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अच्छा लगा हो तो आगे प्रसार दीजिए, फॉरवर्ड कीजिये, और भारतीय भाषाओं में अनुवादित कीजिये, अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए, अपना नाम /मोबाईल नंबर डालिए| मुझे कोई आपत्ति नहीं है| मतलब बस इतना है कि ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये|
http://mahashakti.bharatuday.in/2009/07/blog-post_29.html

मुफलिसी के तन से तूने, खींची चादर लाज की........

बड़ा ही खतरनाक रहा, बड़ना तेरा विकास,
मुफलिसी के तन से तूने, खींची चादर लाज की........

झोपड़ियां मिटा के कैसे, पांच सितारा हो खड़े,
गरीबी की रोटी पे तूने, रखी नजर बाज की..........

हरे भरे बन काट तूने, कंक्रीट के बनाये जंगल,
है खबर इक बड़ी कीमत, हमे चुकानी है इस काज की.........

दूसरों का पेट भरने, खेत खटता बैल बन जो,
मुद्दत से किसान की बेटी, नही देखी शक्ल प्याज की..........

सारा परिवार साथ बैठ, देखता सी ग्रेड फ़िल्में,
ये कौन सी है संस्क्रती, ये कैसी बात आज की .............

संध्या वन्दन भूल बैठे, भूल बैठे जोत बाती,
शोर को संगीत समझे, ना बात करें साज की.........

बलशाली के पाँव पकड़ो, तलुवे चाटो नाक रगडो,
भूखे को लात मारो, ना फ़िक्र कोई मोहताज की.........

बेशक पैर तले अपनों की लाश, बड़ना लेकिन है जरूरी, 
तन का हो या मन का सौदा, ना बात करो राज की...........

भ्रष्टाचारी या जग माही, सोते लम्बे पैर पसार,

भ्रष्टाचारी या जग माही,
सोते लम्बे पैर पसार,
भ्रष्टाचार से लड़ने वाले,
सरे राह दिए जाते मार.

सांच यहाँ पर झूंठ से लड़ते,
लड़ते जाता कुस्ती हार,
साधू संत यहाँ जिल्लत सहते,
पाखंडी की जय जय कार,

शेर ने अपनी पूँछ दवा ली,
कुत्ते जंगल देते दहार,
नया जमाना नया दौर है,
मर्द मर्द से करता प्यार,

सावन में पतझड़ का मौसम,
पतझड़ में छा जाती बहार,
मेहनतकश फाके को मजबूर,
सत्तानशीं को व्यंजन हजार,

सधवा को मुश्किल सिन्दूर बचाना,
विधवा नित करती सिंगार,
सती पति का कत्ल है करती,
गोद उजाड़ता पालनहार,

जननी कोख में मारी जाती,
नही देख पाती संसार,
मांझी नाव डुबाने खातिर,
ले जाता बीच मंझधार,

राय पर्वत बन हुंकारती,
चुटकी मसले जाते पहार,
सत्य का गला सदा ही कटता,
चहूँ और है हाहाकार,

यही फिजा गर रही देश में,
देश का होगा बँटाधार,
सत्य की सुनो ओ सत्तानशीनो,
झूंठ का बंद करो व्यापार,

अहिंसा का गला रेतने वालों,
रक्त क्रान्ति को रहो तैयार,
इक अन्ना गर भी गया तो,
अन्ना जन्मेंगे कई हजार,

आतंकियों का दोष कहाँ, नेताओं की शय है दोस्त.

वन्दे मातरम दोस्तों,

जब हत्यारों को हम, दामाद की मानिंद पालेंगे,
नेतागण वोटों की खातिर, जब तक इन्हें बचालेंगे.
तब तक ऐसे हमलों में, नित लोग मरेंगे तय है दोस्त,
आतंकियों का दोष कहाँ, नेताओं की शय है दोस्त.

आई बी के अलर्ट पर, क्यों पुलिस नही होती गंभीर,
महज राजनैतिक विरोधियों पर, भांजते रहते हैं शमसीर,
मेरे घर घुस मुझको मारें, इतनी इनकी औकात नही,
लौह पुरुष सरदार पटेल सी, चिदम्बरम में बात नही.

कुत्तों सी अपने घर में, नेता करते जूतम पैजार,
पुलिस और प्रशासन को, जेबें भरने से नही फुर्सत यार,
अपने घर में भेद भाव के, बीज जिन्होंने बोये हैं,
उनके ही कारण भारत माँ के, लाखों नैना रोये हैं,

आतंक खात्मे की वास्तव में, इच्छा शक्ति है तुममे अगर,
जेलों से निकाल कर जिन्दा ही, इन्हें जला दो चौराहे पर,
क्यों करते इनपे करोड़ों खर्च, क्या ये बाप तुम्हारे हैं,
या तुम्हारे मुंह में नोटों की, ये जूती डारन हारे हैं.

गांधी, नानक, गौतम के देश में, भगत, शिवा बन जाना होगा,
अपने हत्यारों का गला रेट कर, इनको सबक सिखाना होगा,
खाल खींच कर इनके जिस्म से, मिर्च हमे भरनी होगी,
हर तिमाही में अन्यथा, लाखों गोदें सूनी करनी होगी.

जुर्म के सामने शान्ति गीत, अहिंसा नही कायरता है,
नौनिहाल या नौजवान, मेरा ही भाई मरता है,
मौत चीज क्या होती है, हमको इन्हें बताना होगा,
मौत के सौदागरों के दिल में, मौत का डर बिठलाना होगा.

 

आर्यावर्त लायें

आर्यावर्त लायें

ईसाइयत और इस्लाम ने जहां भी आक्रमण या घुसपैठ की, उन्होंने वहाँ की मूल संस्कृति को नष्ट कर दिया. लक्ष्य प्राप्ति में भले ही शताब्दियाँ लग जाएँ, ईसाइयत और इस्लाम आज तक विफल नहीं हुए. ईसा १० करोड़ से अधिक अमेरिकी लाल भारतीयों और उनकी माया संस्कृति को निगल गया. अब ईसा की भेंड़ सोनिया काले भारतीयों और उनकी वैदिक संस्कृति निगल रही है. जिन्हें देश, वैदिक सनातन धर्म और सम्मान चाहिए-हमारी सहायता करें.

ऐसे ईसाइयत और इस्लाम को संरक्षण देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेदों २९(१) व ३९(ग) की भारतीय संविधान के अनुच्छेदों ६० व १५९ के अधीन शपथ लेकर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १९६ व १९७ के अधीन सोनिया के लिए लूट, हत्या और बलात्कार के संरक्षण हेतु चाकरी करने वाली प्रतिभा, प्रदेशों के राज्यपाल और भारतीय संविधान को बनाये रखने की शपथ लेने वाले भ्रष्ट जज वैदिक सनातन धर्म और मानव जाति के शत्रु हैं.

४ मस्जिदों में धमाके के कारण हम भगवा आतंकवादी हैं. और १०८ मंदिर तोड़ने वालो की संरक्षक सोनिया सरकार आतंकवादी नहीं! दूध की धुली है. हमारे पास भारतीय दंड संहिता की धारा १०२ के अधीन प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार है. यद्यपि भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३१ बदला भी गया और लुप्त भी हुआ, लेकिन उपरोक्त धारा आज भी प्रभावी है. जिन मस्जिदों से हमारे ईश्वर को गाली दी जाती है और जिन पुस्तकों कुरान व बाइबल में हमें कत्ल करने की आज्ञा है, आप सहयोग दें, उन्हें हम नहीं रहने देंगे.

मात्र हम अभिनव भारत और आर्यावर्त सरकार के बागी ही ईसाइयत और इस्लाम को मिटा सकते हैं. सोनिया इसे जानती है, इसीलिए आतंकित है.

प्रेसिडेंट, प्रधानमंत्री और राज्यपाल सोनिया द्वारा मनोनीत मातहत व उपकरण है. लुटेरे संविधान का अनुच्छेद ३९(ग) व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार ही नहीं देता. भारतीय संविधान को कोई भ्रष्टाचारी नहीं मानता.

जज व नागरिक दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं १९६ व १९७ के अधीन, सोनिया के मनोनीत, राज्यपालों द्वारा शासित हैं. अहिंसा, सांप्रदायिक एकता और शांति प्रक्रिया की आड़ में और भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) के संरक्षण में, ईसाइयत व इस्लाम - मिशन व जिहाद की हठधर्मिता के बल पर वैदिक संस्कृति को मिटा रहे हैं. वे हठधर्मी सिद्धांत हैं, "परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मै उन पर राज्य करूं, यहाँ लाओ और मेरे सामने घात करो." (बाइबल, लूका १९:२७) और "और तुम उनसे (काफिरों से) लड़ो यहाँ तक कि फितना (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना) बाकी न रहे और दीन (मजहब) पूरा का पूरा (यानी सारी दुनियां में) अल्लाह के लिए हो जाये." (सूरह अल अनफाल ८:३९). स्पष्टतः वैदिक सनातन धर्म मिटाना दोनों का घोषित कार्यक्रम है. यदि आप पलटवार में आर्यावर्त सरकार को सहयोग नहीं देंगे तो मानव जाति ही मिट जायेगी.

किसी गैर मुसलमान को जीने का अधिकार न मुसलमान देता है और न किसी उस व्यक्ति को जीने का अधिकार ईसाई देता है, जो ईसा को अपना राजा नहीं मानता. फिरस्वतंत्रताकैसे मिली यह पूछते ही या तो आप ईश निंदा में कत्ल हो जायेंगे या भारतीय दंड संहिता की धारा १५३ अथवा २९५ में जेल में होंगे. जज तो राज्यपाल का बंधुआ मजदूर है. अपराधी वह है, जिसे सोनिया का मातहत राज्यपाल अपराधी माने।


साभार - http://jhindu.blogspot.com/2011/09/blog-post_06.html

Minority voting

धर्मयुद्ध में सहयोग दें.

पूर्व केंद्रीयमंत्री डा० सुब्रमण्यम स्वामी के विरोधी उत्तर दें.

जो लोग डा० स्वामी के विरुद्ध विष वमन कर रहे हैं, वे मेरे निम्नलिखित उत्तर को पढ़ कर सोचें!
काबा हमारी है, अजान गाली है, मस्जिद सेनावास हैं, जर्मनी सहित कई देशों ने नए मस्जिदों के निर्माण पर रोक लगा दी है और कुरान सारी दुनिया में फुंक रही है. धरती पर क्यों रहे इस्लाम?
आधुनिक दुर्गा साध्वी पूर्ण चेतनानंद की ललकार भायखला, मुंबई कारागार से!
भारतीय संविधान के अनुच्छेद २९(१) का संकलन कर वैदिक सनातन धर्म के अनुयायियों की धरती, देश, सम्पत्ति व नारियां उनसे चुरा कर संयुक्त रूप से मुसलमानों और ईसाइयों को सौँप दिया गया है. हमारे शासकों को यह स्वीकार भी है. अतएव मुसलमान और ईसाई लोगों को लड़ कर यह निर्णय कर लेना चाहिए कि विश्व पर अधिकार मुसलमानों का रहेगा या ईसाइयों का. यहाँ भी एक समस्या है. जीते चाहे कोई, रहेगा वह शासक (सोनिया) का दास ही! सूचना के अधिकार के अधीन मुझे बताया गया है कि वैदिक पंथियों को अपने वैदिक सनातन धर्म को बनाये रखने का कोई अधिकार नहीं है.
अहिंसा, सांप्रदायिक एकता और शांति प्रक्रिया की आड़ में ईसाइयत व इस्लाम मिशन व

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक......ड़ा श्याम गुप्त.....


अखिल भारतीय साहित्य परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक......ड़ा श्याम गुप्त.....

                     अखिल भारतीय साहित्य परिषद की  राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक, पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह  दि १०-११ सितम्बर २०११ को लखनऊ में, मुन्नू लाल धर्मशाला , चौक में  आयोजित की जारही है ....आप सभी आमंत्रित हैं....|

उम्र से लम्बी स्याह काली, रात हमी तो बदलेंगे...........

हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे,
उम्र से लम्बी स्याह काली, रात हमी तो बदलेंगे...........

गाँधी बहुत जरूरी हुए, हर काम को करने की खातिर,
इनके बिना म्रत्यु पत्र भी, मिलता नही समय आखिर,
सच को भी सामने लाने को, जेबें ढीली करने होगी,
जो उनके मेरे मन में है, वो बात हमी तो बदलेंगे.......
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

सज्जन हमे रास ना आते, गुंडों के तलुवे चाटें,
भूखे को दाना नही, ताकतवर को रबड़ी खिलाते,
"सच का मुंह काला और झूठे का बोलबाला है",
दुनिया ना जो समझे, वो जज्वात हमी तो बदलेंगे........
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

हर हाथ तोड़ वो डालेंगे, उनको भ्रम बड़ा भारी,
सबको जूते से मसल देंगे, सत्ता के व्यापारी,
देश को जेल बनाने की, निज मन जिनने ठानी है,
उनके भ्रम भरे सारे ख्यालात हमी तो बदलेंगे........
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........

नेता जो संसद में जा, बन बैठे भगवान हमारे,
क़ानून को जो जूती समझे, जनता को बेचारे,
सात पीड़ियों की खातिर, जो देश बेचने को तैयार,
ऐसे गद्दारों की, हर बात हमी तो बदलेंगे........  
हम भारत के नौजबां, हालात हमी तो बदलेंगे..........              

राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव






रा धा --कौन, कहांसे, कब------

         राधा-चरित्र का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में स्पष्ट नहीं मिलता; वेद,उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है। राधा व राधा-कृष्ण  का सांगोपांग वर्णन ’गीत-गोविन्द’ से मिलता है।  वस्तुतः राधा का क्या अर्थ है, राधा शब्द की व्युत्पत्ति कहां से, कैसे हुई ?




           ऋग्वेद के  मन्त्रों में हरी या हरय  के साथ हारा शब्द मिलता है; हरी अर्थात तीब्र गति से आने वाले विष्णु ( व इंद्र भी ) एवं हारा..उनकी मूल आत्म-शक्ति इसीलिये हरे-कृष्ण...हरे राम  कहा जाता है ....आत्म-हत्या को शायद हाराकीरी भी इसी लिए कहते हैं |         
           ऋग्वेद  के भाग १/मंडल१-२ में-राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसको ’बैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है। ऋग्वेद -२/३-४-५- में-’ सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकी संरक्षक शक्ति का उपयोग कर धनों की प्रार्थना, प्राक्रतिक साधनों का उचित उपयोग की प्रार्थना की गई है। ऋग्वेद -५/५२/४०९४ में ’ राधो’ व ’आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं यथा-- "यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों कावर्धन(व्रद्धि व उत्पादन) आराधना सहित करें।
               वस्तुतः ऋग्वेदिक  व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’
राधा शब्द की व्युत्पत्ति, रारयि (संसार, ऐश्वर्य, श्री, वैभव) + धा =( धारक,धारण करने वालीशक्ति), से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान मार्गीकाल में सृष्टि  के कर्ता का  ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी (राधा) का आविर्भाव हुआ | 
              भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण  कहा तो उनकी मूल कृतित्व -काल, कर्म, धर्म व  काम के अधिष्ठाता हुए--काल रूप कृष्ण  व उनकी सहोदरी (भगिनी-साथ-साथउदभूत) राधा परमेश्वरी;---  कर्म रूप ब्रह्मा व नियति (सहोदरी);---  धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा(सहोदरी) एवम--- कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ।----इस प्रकार राधा  परमात्व-तत्व कृष्ण  की चिर सहचरी, चिच्छित-शक्ति (ब्रह्म संहिता) है।  वही परवर्ती साहित्य में श्री कृष्ण  का लीला-रमण, व लौकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी,प्रेमिका,पत्नीहुई, व ब्रज बासिनी रूप में जन-नेत्री।
             भागवत पुराण में-एक अराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है, किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे, जिसे ’मान होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यह वही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्री कृष्ण (पुरुष) की रसेश्वरी (प्रकृति) रूप में कल्पित व प्रतिष्ठित किया।
            वस्तुतः गीत गोविन्द व भक्ति काल के समय
स्त्रियों के सामाज़िक (१ से १० वीं शताब्दी) अधिकारों में कटौती होचुकी थी, उनकी स्वतंत्रता, स्वेच्छा, कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत: राधा का चरित्र महिला उत्थान व उन्मुक्ति के लिये रचित हुआ। पुरुष-प्रधान समाज में कृष्ण उनके अपने हैं, जो उनकी उंगली पर नाचते हैं, स्त्रियों के प्रति जवाब देह हैं, नारी उन्मुक्ति-उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार वृन्दावन- अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रज में, जन-जन में, घर-घर में, मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ। वे मात्-शक्ति हैं, भगवान श्रीकृष्ण के साथ सदा-सर्वदा संलग्न, उपस्थित, अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति;  अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हेंबिछुडना ही होता है, गोलोक के नियमन के लिये ।

"जबर मारय....रोबय भी न देय"





बाप रे! सांसदों के विशेषाधिकार का हनन हो गया......सच्ची क्या ? 

देश में इतने घोटाले हुए, देश का पैसा बाहर चला गया .....देश की प्रतिभाएं बाहर चली गयीं ........सन १९४७ के बाद से स्वशासन के झंडे तले विकास के नाम पर न जाने क्या-क्या अनाचार-कदाचार-भ्रष्टाचार होता रहा ....देर-सबेर सबके बारे में देश-दुनिया को पता चलता रहा. पर ये विशेषाधिकार हनन कब हो गया पता ही नहीं चला....वह भी उनके विशेषाधिकार का हनन जो सबके अधिकारों का हनन करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार माने बैठे हैं. सचमुच, यह तो गजब हो गया . इतना बड़ा काण्ड हो गया और किसी को पता तक नहीं चला. मेरा मन गाना गाने का हो रहा है - "गज़ब भयो रामा जुलुम भयो रे"     


कलुआ नाई उबल पडा -  इन्होने पूरे देश को बेवकूफ समझ रखा है क्या ? किसने किसका अधिकार हनन किया है किसी से छिपा है ? यह तो वही बात हुयी कि शेर ने मेमने से कहा " तूने नहीं तो तेरे पुरुखों ने जूठा किया होगा पानी ? सजा तो मिलेगी ही"

मैंने कहा - देखो भाई कलुआ जी ! जब देश की बहुतेरी जनता सोयी रहे और कोई एक अन्ना अपने दो-चार जागरूक लोगों के साथ शहीद होने को निकल पड़े तो शहादत की भूमिका तो बनेगी ही. ...वही तो बन रही है ...इसमें गुस्सा करने की नहीं कुछ दृढ निश्चय करने की आवश्यकता है .

आज अन्ना, किरण बेदी, अरविंद....सब गुनाहगार हो गए. क्योंकि इन्होने कातिल को कातिल कह दिया. इन्होने कहा कि अब बस ...और नहीं चलेगा ये कातिलपना......कतल तुम्हारा अधिकार नहीं .....अपने हक़ मांगना हमारा अधिकार है ...और इसे हम लेकर रहेंगे. अन्ना- किरण और अरविंद वे लोग हैं जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग दिया. अंधभक्त प्रशासन को लगता है कि ये टैक्सचोर हैं ..और कुछ नहीं तो इन्होने या इनके पुरुखों ने नदी का पानी जूठा क्यों किया....... उस नदी का पानी जिसे इन बेचारों ने तो पीया ही नहीं.....और जिसे पीना कुछ ख़ास दुष्टों का ही अधिकार है.

किरण बेदी एक ऐसी शख्सियत है जिसका कार्यकाल बेदाग़ और सुखद कीर्तिमानों से भरा रहने के कारण निरंतर मानसिक यंत्रणाएं भोगने के लिए बाध्य रहा है....और जिस पर पूरे देश को गर्व रहा है. आज उसी किरण
बेदी को कटघरे में खड़ा किये जाने का बेहया षड्यंत्र किया जा रहा है. यद्यपि यह भी सच है कि खिसियानी बिल्ली के खम्बा नोचने से खम्बे का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है बल्कि उसी की बेवकूफी ज़ाहिर हो रही है. ज़ाहिर यह भी हो रहा है कि बदले की कार्यवाही कितने घटिया स्तर तक जा सकती है. 

जब देश का राजा आत्मविश्लेषण के स्थान पर बदले की कार्यवाही पर उतारू हो जाय तो समझ लेना चाहिए कि कोई बड़ा परिवर्तन होने वाला है. यह परिवर्तन किसी भी प्रकार का हो सकता है जिसके लिए पूरे देश को तैयार रहना होगा. 

कलुआ अचानक गंभीर हो गया है....और मैं उसकी गंभीरता को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ. 

दुर्दांत हत्यारों को, फांसी ना मेरे भाई है ............


चल आ करते है हत्याएं,
संसद को खंडहर बनाये चल,
फिर मुंबई में फेंके बम,
भारत को मिटटी में मिलाएं चल............

मौत का खेल खेलने का,
हमारे पास स्वर्णिम अवसर है,
पकड़े भी गए तो क्या होगा?
जेल में डनलप का बिस्तर है.........

कुछ एक साल तो तारीख तारीख
खेलने में निकल जायेंगे
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक
कई अफसर बदल जायेंगे ........

फांसी की सजा फिर भी मिली तो,
राष्ट्रपति से क्षमा याचना,
जाति, धर्म, मजहब या कौम से,
मिल जाएगा कोई हमे खास हाँ..........

हमारी खातिर विधान सभा में,
नये नियम बनाये जायेंगे,
राष्ट्रपति पर दबाव बनाने को,
लोग सडकों पे लाये जायेंगे.........

फिर भी फेवर अपना ना हुआ तो,
सरकारें गिरा देंगे,
खून से रंगेगी भारत भूमि,
मजहबी दंगे करवा देंगे ...........

चल निश्चित हो कर करते हैं,
भारत भूमि पर कत्ले आम,
इस देश के नेता कर देंगे,
बाकी बचा हमारा काम..........

हत्यारों की फांसी पर, सियासत गरमाई है,
दुर्दांत हत्यारों को, फांसी ना मेरे भाई है ............

मैं सत्ता के शिखर पर बैठा हूँ

मेरी रगों में हिटलर का खून है,
मुसोलिनी का मैं वंशज हूँ,
नाजी मेरा गुरू है,
रावण मेरा संरक्षक,
मैं सत्ता के शिखर पर बैठा हूँ .........

तुम अन्ना हो
बाबा हो
या अन्य कोई ताकतवर सामाजिक कार्यकर्ता

कुछ नही कर सकते
तुम मेरा

क्योंकि तुम कुछ नही हो

क्या है तुम्हारे पास ?
ये अदना सी जनता
जिसका अपना तो कोई बजूद ही नही है
जिसे हम
जब चाहे
हांक देते हैं
भेड़ बकरियों की तरह
जिसे हम लडाते रहे हैं
धर्म, जाति, भाषा और सम्प्रदाय के नाम पर
जिनको इस्तेमाल करते रहे हैं हम
चुनावों में

क्या बिगाड़ लोगे तुम मेरा ?.........

मेरे पास पुलिस है
प्रशासनिक अधिकारी मेरे तलुवे चाटते है
क़ानून को मैं ही बनाता हूँ
अपने और अपनों के फायदे के लिए
और जरूरत होने पर
मैं ही खुद बनाता हूँ
क़ानून से बच निकलने का रास्ता

और ये क़ानून
ये अधिकारी
ये पुलिस करती है
मेरे ही इशारे पर
अपनी अंतरात्मा को मार कर
एक पालतू कुते की मानिंद
करते है
मेरे आदेश का पालन

अगर कोई बाबा कोई अन्ना
करता है मेरी खिलाफत
करता है मेरे भर्ष्टाचार को उजागर

तो मैं
अपनी सारी ताकत लगा देता हूँ
उसके सफेद दामन को दाग दार करने में
और मेरा वादा है तुम सभी से
मैं पहुचाउंगा तुम्हे ही
जल्दी  बहुत जल्दी
जेल की सलाखों के पीछे
या फिर
मुझ में शामिल गुंडा तत्व
बहा देंगे
सरे राह
सरे आम
तेरा लहू पानी की मानिंद
और फिर मैं खुद ही
पहुच जाउंगा
तुम्हे महान
अति महान
महान कहने के लिए



भारत के पतन का कारण - अविवेकी अहिंसा का आचरण

भारत जो कभी विश्वविजेता था , सम्पूर्ण विश्व जिसके ज्ञान - विज्ञान और शक्ति के सामने झुकता था तथा जिसकी शर्तो पर उसका विश्व के अन्य देशों के साथ व्यापार होता था । आखिर क्या कारण रहा कि वह अपने गौरवशाली इतिहास और वैभव को खो बैठा तथा पद्च्युत होकर बाहर से आई मुठ्ठीभर मजहबी और साम्राज्यवादी शक्तियों का गुलाम हो गया ?

इसका कारण जानने के लिए हमें भारतीय इतिहास के पाँच हजार वर्ष पुराने पृष्टों को खंगालना पडेगा । महाविनाशकारी विश्वयुद्ध महाभारत में बहुत बडी संख्या में वेदज्ञ विद्वानों के मारे जाने के कारण भारत में वेदों के पठन - पाठन और प्रचार का कार्य शनै - शनै लुप्त होता चला गया , तदानुपरांत विद्वानों की प्रतिष्ठा और क्षमता भी कम हो गई तो कालांतर में देश में में देश में अनेक अवैदिक और भोगवादी मत - मतांतरों चार्वाक , बृहस्पति , तांत्रिक और वाममार्गी आदि सम्प्रदायों ने जन्म लिया । वेदों के गूढ़ तत्वज्ञान से रहित अनेक प्राचीन भाष्यकारों ने अपने मंतव्यानुसार वेद मंत्रों के अर्थ का अनर्थ कर दिया । वैदिक शास्त्रों को विकृत किया गया और अवैदिक शास्त्रों की रजना की गई । जिसके परिणाम स्वरूप बहुदेवतावाद , अवतारवाद , जातिवाद , छुत - अछुत , अशिक्षा , यज्ञ में पशु बलि देना जैसी कुप्रथाओं का प्रचलन हुआ