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भीड़ के सत्य में खोता वास्तविक सत्य

न्मादित भीड़ का निर्णय कैसा भी हो उस निर्णय का परिणाम जो दृष्टिगोचर होता है उसे नकारा नहीं जा सकता ...वह भी एक सत्य ही है ...भले ही सापेक्ष क्यों न हो. भीड़ की भावना समुद्र के एक ज्वार की तरह है. एक पल आती है दूसरे पल चली जाती है.....रह जाती हैं रेत पर ज्वार के साथ आयीं कुछ चीज़ें .....कुछ शंख...सीपें ...और शायद कभी कभी कोई मोती भी. पर जिस तरह मोती की संभावना अति क्षीण होती है उसी तरह भीड़ के ज्वार के साथ किसी सुपरिणाम की संभावना भी क्षीण ही होती है .

भीड़ में तात्कालिक परिस्थितिजन्य आवेश होता है जो भीड़ के कृत्य को दिशा देता है. आवेश यदि सकारात्मक है तो दिशा ठीक होगी अन्यथा भीड़ विनाश को साथ लेकर चलती है. पर यह आवेश कैसा भी हो ..स्थायी नहीं होता. इस अनस्थायित्व के कुछ सद्गुण हैं तो कुछ दुर्गुण भी. 

पहले बाबा रामदेव के साथ भीड़ थी.....ज्वार आया ....चला गया. 
भ्रष्टाचार यथावत रहा.

फिर अन्ना जी आये ......ज्वार आया .....चला  गया 
भ्रष्टाचार यथावत रहा. 

सरकारी कार्यालयों की राम कहानी वही है. पहले रिश्वत देकर काम हो जाता था अब तो रिश्वत देकर भी काम नहीं होता. पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ में काम न करने की अपसंस्कृति ने जन्म लिया है. पहले काम इसलिए लटकाया जाता है कि पहले रिश्व्वत मिल जाय फिर देखेंगे. अधिकारियों के हाथ-पैर जोड़-जोड़ कर परेशान और फिर शिकायतें कर कर के थका हुआ आम आदमी जब रिश्वत दे देता है तब भी काम नहीं होता क्यों कि अब तो रिश्वत मिल गयी है ..काम नहीं करूंगा तो क्या कर लोगे ? शिकायत करना है तो करो .....

शिकायत से भी कुछ नहीं होता ...फिर दुखी -पीड़ित आदमी अदालत जाता है, वहां वकील उलटे अस्तुरे से मुड़ने के लिए तैयार बैठा रहता है. ...अदालत में वर्षों केस चलता रहता है. परेशान आदमी पूछता है कि आखिर फैसला कब होगा? ज़वाब मिलता है कि यदि प्रतिदिन केसेज की सुनवाई हो तो अभी पुराने ही केस इतने हैं कि उन्हें निपटने में तीन सौ साल लग जायेंगे. 
धड़ाम !
आम आदमी चारो खाने चित्त . 

क्या किया जा सकता है इन परिस्थितियों में ? 

आदमी घर से दूकान या ऑफिस जाने के लिए निकलता है .....रास्ते में जितने भी मंदिर -मस्जिद- गुरूद्वारे- चर्च मिलते हैं सबको बेवकूफ बनाता हुआ ...तगड़ा मुर्गा फंसने की दुआ मांगता हुआ अपने बूचडखाने में पहुंचता है. जहाँ वह दिन भर दूसरे निरीह आदमी का खून पिएगा.  
यही है हमारा राष्ट्रीय चरित्र. 

हम प्रतीक्षा करते हैं कि कोई क़ानून बनेगा तब देखा जाएगा...तब तक तो रक्त पी ही सकते हैं. यह कैसी मानसिकता है जो डंडा खाने पर ही सुधरने के लिए प्रतिज्ञा किये बैठी है इससे पहले बिलकुल नहीं .
कहीं ऐसा तो नहीं कि १९४७ में हम अपना देश चलाने के लिए सक्षम नहीं थे ? आजादी ले तो ली पर सहेजने का शऊर नहीं था .....अभी भी नहीं है. हम कड़े क़ानून की प्रतीक्षा कर रहे हैं. जब तक डंडे से बात नहीं करोगे हम नहीं सुधरेंगे. अभी लोक पालबिल आने में समय है तब तक लूट लेते हैं जितना लूट पायें  फिर तो नहीं ही लूट पायेंगे.             
क़ानून बन बभी गया तो यह मानसिकता कितने दिन तक लोकपाल बिल का पालन कर पायेगी  ? 

1 टिप्पणी:

vishwajeetsingh ने कहा…

क्रांति कुछ ही लोग करते है , बाकि तो भीड़ होती है , जो समय की तरंगों के साथ बह जाती है । स्वामी रामदेव जी ने यदि समय की तरंगों को देखते हुए भीड़ का सही उपयोग कर लिया होता , तो सोनिया गांधी की पैतृक संपत्ति कांग्रेस के योद्धाओं को भगवे का अपमान करने का साहस न होता ।
1947 में भारत को आजादी नहीं मिली थी , बल्कि ब्रिटिस सरकार द्वारा अपने विश्वास पात्र मैकालेवादी व्यक्तियों को सत्ता का हस्तांतरण हुआ था ।
सुन्दर , चिंतनीय आलेख ...... आभार ।