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छिद्रान्वेषण .......साहित्यिक कठमुल्लापन......ड़ा श्याम गुप्त...

                       ब्लॉग जगत में भी साहित्यिक ठेकेदारी , हाँ जी हांजी प्रवृत्ति  एवं आलोचना को न सहन कर पाना और उचित समालोचनात्मक जो पक्ष में नहीं हैं  एसी टिप्पणियों का हटाना  खूब चल्र रहा है.....देखिये एक उदाहरण ----
           --------------------अभी हाल में ही किसी स्वनामधन्य ने  निम्न दोहा लिखा...

   और आये----26 comments:----  अधिकाँश प्रशंसा  में ..... सिर्फ दो  स्वस्थ आलोचनात्मक ........................

                                        सुरेश कुमार ने कहा…
 ..बहुत ही खुबसूरत दोहा छन्द...
                                              ZEALने कहा…
  आपकी काव्य रचना के आगे तो सब फीका लगता है। उम्दा दोहे।
                                  
                             रविकर ने कहा…
  गुरुजन के आशीष से, रच देता मति-मन्द | गागर में सागर भरे, दोहा सुन्दर छंद || सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई
                                  kailaash C sharmaa...ने कहा…
   बहुत शानदार दोहे..आभार
                                          S M habeeb ने कहा…
   दोहों में दोहे.... वाह सर बहुत बढ़िया.. सादर.                             . manoj kumar ने कहा
    दोहों पर दोहे। अद्भुत!!
                                          Madan sharmaa ने कहा…
 बहुत ही खुबसूरत रचना ....आभार.
                                              वाणी गीत ने कहा…
 दोहों पर दोहों में ही कहना .. रोचक!
                                            रीता शेखर ने कहा…
    तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध। सर,तेरह-ग्यारह का नियम स्पष्ट करने की कृपा करेंगे तो मैं  भी     कुछ सीख लूँगी| दोहों में दोहे का महत्व बहुत शानदार लग रहा है|
                              कुंवर कुसुमेश ने कहा…
पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद. अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद.
            तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
 सरस्वती की कृपा से, मुझको है यह सिद्ध।१।  ......        वैसे उपर्युक्त पहले दोहे पर ये निवेदन ज़रूर है कि:-      "मुझको है यह सिद्ध" में,अहंकार का भाव.         ऐसे कथनों से इन्हें,माँ शारदे बचाव.................
                                              Babli ने कहा…
बहुत सुन्दर दोहा लिखा है आपने! बेहतरीन प्रस्तुती!
दोहों की ही तरह,एकदम संक्षिप्त और अर्थ-संप्रेषक .
                                           sunil kumar ने कहा…
चार चरण-दो पंक्तियाँ, करती गहरी मार। कह देती संक्षेप में, जीवन का सब सार। दोहों में दोहे का महत्व बहुत शानदार.....
                             पोस्ट लेखक दोहाकार -ने कहा…
आदरणीय कुँवर कुसुमेश जी! मैं बहुत ही विनम्रता से आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि-   पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद.  अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद. ------इस दोहे में भी प्रथम चरण में एक मात्रा बढ़ी हुई है। --  अन्त में  यही कहना चाहता हूँ कि- 
"जिसके सिर पर हो सदा, माता का आशीष। 
वो ही तो कहलाएगा,वाणी का वागीश।।"
                          Dilbag virk ने कहा…
सचनुच आप दोहों में सिद्ध है ...     
                             सिर्फ कुंवर कुसुमेश जी ने ....कुछ यथातथ्य अशुद्धि  की बात निम्न  तरह  की ....

                     "वैसे उपर्युक्त पहले दोहे पर ये निवेदन ज़रूर है कि:-

                  मुझको है यह सिद्ध" में, अहंकार का भाव.
  ---यह एक दम सत्य व उचित टिप्पणी   हैं ..                                     -----परन्तु लेखक ... को नागवार गुजरती है ...वह कहता है ...
        आदरणीय कुँवर कुसुमेश जी!    मैं बहुत ही विनम्रता से आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि-       पांचों दोहे आपके,आये बहुत पसंद.         (१३-११ )   ...      अच्छे लगते हैं मुझे,सचमुच दोहा छंद.    (१३-११)   - इस दोहे में  प्रथम चरण में एक मात्रा बढ़ी हुई है                           --लेखक ने फिर एक अशुद्ध दोहा दे मारा...-----अन्त में यही कहना चाहता हूँ कि-                "जिसके सिर पर हो सदा, माता का आशीष।   (१३-११ )     
          वो ही तो कहलाएगा, वाणी का वागीश।।"    (१४-११ ).............       -------------मैंने स्वयं जब टिप्पणी दी कि .....कुशुमेश जी का दोहा तो ठीक मात्राओं वाला है ..परन्तु आपके   दोहे में कुशुमेश जी द्वारा कथन (मुझको है यह सिद्ध ..)...में अहंकार झलकता है ..उचित ही है ..इस    प्रकार के वाक्य नहीं लिखने चाहिए.......वाणी  का वागीश ...शब्द भी त्रुटिपूर्ण है वागीश..का अर्थ ....स्वयं वाणी  का ईश है ...एवं आपके ही इस दोहे के तीसरे चरण में एक मात्रा भी अधिक है ....कृपया ठीक करें ....

1 टिप्पणी:

कौशलेन्द्र ने कहा…

डॉक्टर गुप्त जी ! आपके साहित्यिक और आध्यात्मिक प्रेम को सादर नमन !
मुझे तो साहित्य की बारीकियों की रत्ती भर भी समझ नहीं है. बस कभी-कभी यूँ ही मन में आये विचारों को किसी भी तरह अभिव्यक्त कर देता हूँ. सन्देश ठिकाने तक पहुँच जाय ...बस अपना काम हो गया. वैसे यह सच है कि समालोचना से पूर्व कही जाने वाली बात को अच्छी तरह तौल लिया जाय. समालोचक का उत्तरदायित्व गुरु के समतुल्य होना चाहिए ...जो एक सही दिशा को इंगित कर सके.