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यदि में गीता नहीं पढूं तो क्या , में इसकी पूजा तो करता ही हूँ .


और गीता जी बच गयी : अब तो हिंदू इसे पढ़ेंगे ही

    
खबर :

‘गीता पर भारत के रुख की हुई पुष्टि’

गीता पूरी दुनिया के लिए, इस पर कोई बैन संभव नहीं


गीता पर प्रतिबंध की माँग खारिज

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कितनी खुशी कि बात है , कि हमारी धर्म निरपेक्ष सरकार ने भी हिंदू धर्म कि पुस्तक का सहयोग दिया . 

यह सारे देश में विजयोत्सव मानाने जैसा है . 

हमें भी  पता चला , कि हिन्दुस्तान में  गीता नाम कि holy पुस्तक है जो हिंदुओं से सम्बन्ध रखती है . 


हिंदू इसका सम्मान करता है , पूजता है , 

पर हिंदू इसे पढता नहीं है .  

बुरा नहीं मानना , शायद आपने इसे पढ़ा हो , या हमेशा पढते हों , पर अपने आस पास के हिंदुओं, अपने घर-परिवार, मित्रों , पधोसिओं , पर नजर डालें और बताएं कि कितने प्रतिशत लोगों ने इसे पढ़ा है . 

इन पंक्तियों का लेखक मैं , अशोक गुप्ता ,पैदायशी हिंदू,  एक शहर से , अच्छे घर में जन्म लेने वाला, पढ़ा-लिखा , पिछले ३२ साल से विदेशों में रह /घूम रहा , R S S का समर्पित कार्यकर्ता, छात्र नेता, दुनिया भर कि जानकारी के बारे में प्रयत्न शील , १८ साल से सत्संगों में जा रहा , उम्र ५७ साल, अभी कुछ समय से गीता जी को पढ़ना शुरू किया है .

धिक्कार है मुझ पर , और मेरे हिंदू होने पर , और मुझे पता है मेरे आस पास के हिंदुओं का , उन्होंने जीवन में कभी गीता जी उठा कर नहीं देखि. 


उनके घरों में चार-पांच कारें मिल जाएँगी , पर एक गीता मांगने पर नहीं मिलेगी , पढ़ने कि तो बात ही छोडो .


यदि एक प्रतिशत हिंदू भी गीता जी का अध्यान करे तो देश का नक्शा अपने आप बदल जायेगा , ऐसा मेरा विश्वास है ,


तब लोगों को अनाचार और भ्रष्टाचार से खुद ही नफरत हो जायेगी चाहे वो I AS हो या नेता या जज . 


धर्म से दूर रहना , निरपेक्ष रहना,  ही सारे फसाद की जड़ है . 


आप क्या कहते हैं !
 


और अगर हिंदुओं को पसंद आ गयी तो उन्हें भ्रष्टाचार की तरफ मोडना मुश्किल हो जायेगा , वे नाम के ही नहीं असल के हिंदू बन जायेंगे .


कोई बात बुरी लगी हो तो बताईएगा जरूर ! और छमा कर दीजियेगा .
खुशी कि बात है कि रुसी अदालत ने मुकदमा ख़ारिज कर दिया , 


पर पक्का है कि,  यदि यही मुकदमा, हिन्दुस्तान कि अदालत में होता,


तो ख़ारिज नहीं हो सकता था 
अखिल भारतीय वैदिक धर्म समेलन फैजपुर से सीधा प्रसारण


‘गीता पर भारत के रुख की हुई पुष्टि’


खुशी कि बात है कि गीता पर प्रतिबंध की माँग खारिज

रूस : गीता पर पाबंदी की अर्जी रद्द 
\खबर :

‘गीता पर भारत के रुख की हुई पुष्टि’

गीता पूरी दुनिया के लिए, इस पर कोई बैन संभव नहीं


गीता पर प्रतिबंध की माँग खारिज

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खुशी कि बात है कि रुसी अदालत ने मुकदमा ख़ारिज कर दिया , 

पर पक्का है कि,  यदि यही मुकदमा, हिन्दुस्तान कि अदालत में होता,

तो ख़ारिज नहीं हो सकता था 

ईसाई मिश्नारिओं से धर्म कि रक्षा कैसे , (पर क्या इसकी (हिंदू धर्म की) कोई जरुरत है भी)


ईसाई मिश्नारिओं से धर्म कि रक्षा कैसे , भारत में Defending Dharma: Handling the Christian Challenges


     
Defending Dharma:
Handling the Christian Challenges

by
Yajnavalkya Dasa


  
FOREWORD
by Stephen Knapp
This booklet especially deals with the arguments that Christians use most often to criticize and demean the Vedic tradition, or discourage others from being Hindus or followers of Sanatana-dharma. Herein you can find the means to help yourself and others Defend Dharma by using logic and common sense, and the counter arguments that can be used against the criticisms from those who simply do not understand it, especially Christians. This also helps you recognize the lapses in logic (known as "philosophical fallacies") in their own arguments. Thus, everyone should awaken to the realities of what Christianity has done to decent humans in the past, and how their conversion tactics are still performed with the mission of Christianizing the world.
This booklet is not copyrighted. In “Defending Dharma”, the original publisher, International Database, and the author, Yajnavalkya Dasa, have donated this work to the public domain. Therefore, you are free (and encouraged) to copy and distribute this booklet as you wish.
Presently, you can find this booklet on the web site: http://www.stephen-knapp.com. It is for email and internet distribution, as well as for downloading and printing for hardcopy distribution. It is also available as a Microsoft Word document, in Wordperfect, or Adobe Acrobat Reader pdf files. To get your copy in any of these additional formats, simply email your request to: Srinandan@aol.com.

PREFACE
पूरा लेख पड़ने के लिए ऊपर या यहाँ चटका करें . पर क्षमा कीजिये कि लेख अंग्रेजी में है .
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लोकपाल और समस्या का हल......लघुकथा ...डा श्याम गुप्त...

              सुबह ही सुबह हमारे एक चिकित्सक मित्र घर पधारे और बोले...यार एक केंडीडेट  को पास कराना है, अपने  अच्छे  मित्र का लड़का है |  कल तुम्हारा टर्न है और अगर तुमने कुछ  उलटा -सीधा रिकार्ड कर  दिया तो फिर कुछ नहीं होपायगा, अतः सोचा सुबह ही सुबह  मुलाक़ात कर ली जाय |
      ' पर इतनी चिंता क्यों ठीक होगा तो पास हो ही जायगा |' मैंने कहा |
     ' नहीं', वे बोले, 'थोड़ी  सी विज़न में कमी है | और पैसे ले लिए गए  हैं |'
     ' तो क्या हुआ', मैंने कहा, 'लौटा देना कि काम नहीं होसकता |'
      अरे यार ! लिए हुए पैसे तो काम में भी  लग गए | खर्च भी होगये | अब घर से पैसे देने में तो बुरा लगता है, कि आई हुई लक्ष्मी क्यों लौटाई जाय |  बड़ा धर्म संकट होजाता है |
        मैं जब तक कुछ सोच पाता, वे बोले,  यार ! अब अधिक न सोचो, कभी तुम्हारा काम भी पडेगा तो मैं भी टांग नहीं अडाऊंगा | यह काम तो करना ही पडेगा, तुम्हारा हिस्सा पहुँच जायगा | और मुझे न चाहते हुए भी उनका काम करना पडा |
         मैं सोचने लगा, क्या लोकपाल इस समस्या का कोई हल निकाल पायगा ?  

जाति, भाषा, मजहब की, शहर में आग लगाते हैं.........

वन्दे मातरम दोस्तों,

चली चुनावी हवा, जनता को मूर्ख बनाते हैं,
चलो कुछ मानते नही, चलो कुछ भूल जाते हैं.........

जहर का कारोबार किया, माना की हमने अब तक,
शराब जाम में मिला, चलो अमृत बरसाते हैं...........

फूट का विष हमने बोया,अपना राज चलाने को,
दिखावे को ही सही, अमन के पेड़ लगाते हैं..........

मौत की मानिंद, सब कुछ बेहद सस्ता होगा,
अब की भूख से नही मरोगे, गरीबों को बतलाते है...........

हमसे गर कुछ गलत हुआ, माफ़ी दो मौका एक और,
भोली है जनता, चलो फिर से बरगलाते हैं............

नोटों की बारिस हो, गुंडों का हरपल हो साथ,
धन बल, बाहू बल, जैसे हो जनता को मनाते हैं........

ये चाले नही चली, तो फिर जीतने खातिर,
जाति, भाषा, मजहब की, शहर में आग लगाते हैं.........

*****होड़ लगी एक बार गधो में*****

वन्दे मातरम दोस्तों,

होड़ लगी एक बार,
गधो में सत्ता पाने की,
चुनाव जीत बाकायदा,
संसद जाने की.........

आपस में कर बैठकें,
चुना गया प्रत्याशी एक,
काम चोर, महा आलसी,
हर तरह से सत्यानाशी एक........

बहुमत से तब मिल जुल कर,
एजेंडा एक पास हुआ,
जनता हमसे बड़ी गधी है,
जीतेंगे विश्वाश हुआ .............

चुनाव में जनता ने देखे,
गधे एक से एक बड़े,
एक मगर चुनना था जरूरी,
जितने थे चुनाव लड़े.........

अपनी समझ से जनता ने चुना तब,
सबसे कम बदमाश गधा,
चुनाव जीत, मक्कार काम चोर,
हो गया था ख़ास गधा..........

संसद से मन्दिर में फिर,
चहूँ ओर था अजब नजारा,
कोने में दुबका फिरता था,
चुन आया जो शेर बेचारा..........

अपनी ढपली, अपना राग,
सत्ता के मद में मदमाते,
इनके खिलाफ बोलने वाले,
आधी रात में लाठी खाते..........

भूख से त्राहिमाम देश में,
बेंक खाते इनके भरते जाते,
कुपोषण से लाखों बच्चे,
सालों साल है मरते जाते............

इनका कुछ बिगड़ेगा नही,
इनको इसलिए फ़िक्र कहाँ,
एकता जनता की तोड़ने,
डाला आरक्षण का दंश यहाँ.........

आदरणीय सांसदों संसद में सभी बुरे नहीं हैं, मगर मजबूरी में भी बुरे का साथ देना अपने आप को बुरा बना लेना है, यहाँ गधों से तात्पर्य ऐसे सांसदों से है जिन्हें जनता की नही, अपनी परवाह है, ओर अपने भले के लिए वे नीचता की किसी भी सीमा तक जा सकते हैं,
जो सांसद अपने आप को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर गधा नही मानते हैं..... उनसे में सादर माफ़ी चाहता हूँ ओर हाथ जोड़ कर कहता हूँ ये गधा शब्द कमसे कम आपके लिए नही है.

हम सीरियस बिलकुल नहीं हैं सिर्फ मज़ाक भर कर रहे हैं




१-  
एक छोटा सा लोकतांत्रिक मज़ाक 

बड़ी आनाकानी के बाद 
निकाली थी उन्होंने एक डिबिया  
बोले- 
नहीं मानते हो 
तो लगा दूंगा मलहम...
खोलो, कहाँ है घाव...
फिर आहिस्ते से खोल,  
ढक्कन छोड़ 
फेक दिया सब कुछ दरिया में ...
बोले-
ये रहा तुम्हारा लोकपाल बिल.

२- 
दलाध्यक्ष ...गोया प्रधानमंत्री ...गोया राष्ट्राध्यक्ष 

एक छोटा सा सवाल है, 
अब से पहले 
कभी देखा है 
किसी दलाध्यक्ष को 
किसी प्रधानमंत्री 
या राष्ट्राध्यक्ष की छाती पर 
इस कदर मूंग दलते ?
नहीं .....?
तो देखो...जी भर के देखो
और याद रखना 
इतिहास का ये काला पन्ना.

३-  प्रधान मंत्री 

गुस्सा मत करो उस पर.... 
न बेशर्म कहो ....
क्या करे बेचारा !
नाबालिग है अभी 
धीरे-धीरे सीख लेगा चलना 
बिना उंगली थामे भी. 
तुम तो बस 
वोट देते रहो उसे.

४- ये देश खाली करो... कि वो आ रहे हैं ...

पूरब से इन्हें बुला लो 
पश्चिम से उन्हें बुला लो 
उत्तर में ड्रेगन है 
दक्षिण में समंदर है 
चलो, हम समंदर में डूब जाएँ.

५- क्योंकि उनका हक़ है

इनको आरक्षण  
उनको आरक्षण  
सबको आरक्षण 
सिवा हमारे .....
क्योंकि उनका हक़ है 
और हमारा कभी था ही नहीं.

६- जजियाकर भी देंगे 

मेज़बान शरण माँगते हैं
मेहमान घर में बसते हैं 
नागरिकता उन्हें ही दे दो
अपना काम तो हम  
द्वितीय नागरिकता से भी चला लेंगे 
जजियाकर भी देंगे. 
क्योंकि हम 
न तो अल्प संख्यक हैं....
न आरक्षित ...
न घुसपैठिये ....
न आतंकवादी ..... 
बस, 
केवल टुटपुंजिये  भारतीय ही तो हैं.
आपका कर ही क्या लेंगे ? 


JAGO HINDU JAGO: मक्कार सेकुलर गद्दारो Happy Crishmiss कहने से पहले...

JAGO HINDU JAGO: मक्कार सेकुलर गद्दारो Happy Crishmiss कहने से पहले...: आप किस सांप्रदाय के साथ कैसे सबन्ध ऱखना चाहते हैं इस वारे में हिन्दू संसकृति किसी तरह का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाती लेकिन जिस तरह से मानबता क...

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गीता को बैन कर दोगे, पर एसी होली को बैन कैसे करोगे, चाहे तुम हिरान्यकशिपू , या कंस ही क्यों न हो


क्या कभी देखि है एसी होली , हिन्दुस्तान में भी , अब देखिये salt lake city, utah, usa में

सब जगह गीता को बैन कर दें , 


हिंदू भी गीता को न पढ़ें . 


पर इस होली को कैसे बैन करोगे !


देखिये एक अविस्मरणीय होली अमेरिका में : 

holi in salt lake city, utah,usa.



    

पाकिस्तानी हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में दुर्दशा -हिन्दू होने का अपराध



अमेरिका और पोप शासित इण्डिया में  जहाँ ११० करोड़ हिन्दू जनसँख्या है,हिन्दुओं का दमन और उन पर अत्याचार कभी सुर्खियाँ नहीं बन सकता, मगर बात अभी पाकिस्तान से आये १५० हिन्दुओं की है जो हिन्दुस्थान में दर दर भटक रहें हैंपिछले माह पाकिस्तान से १५० हिन्दू तीर्थयात्रा पर आये थे मगर अब ये हिन्दू हिन्दुस्थान से वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैऔर यहाँ स्थायी रूप से शरण मांग रहें हैंइसके पीछे पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं पर होने वाला बर्बर अत्याचार हैआये हुए हिन्दुओं के अनुसार पाकिस्तान में उन्हें कभी जजिया कर तो कभी मुश्लिम बनने का दबाव,हत्या ,लूट और फिरौती का दंश झेलना पड़ता था हिन्दू लड़कियों के बलात्कार और बलात मुश्लिम बनाने की घटनाएँ अब आम हो गयी हैये बात पाकिस्तान की सरकार, संसद और मानवाधिकार संघठन भी स्वीकार करने हैंइसके पक्ष का आकड़ा एक ये भी है की विभाजन के समय पाकिस्तान में २५% हिन्दू थे जो अब १.५% के आस पास रह गए हैंखैर ये बात तो पाकिस्तान में होने वाले अत्याचार की हुई जहाँ पाकिस्तानी का मतलब मुसलमान और हिन्दू विरोधी  होना ही होता है,और ये उनके देश का आन्तरिक मामला है उसपर हम एक सीमा से ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकते
हिन्दुस्थान (जिसे खान्ग्रेस सरकार ने पोप पोषित इंडिया बना रखा है) में आये हुए पाकिस्तानी हिन्दुओं के साथ होने वाला व्यवहार भी उन्हें अपने यहाँ चलने वाले तालिबानी शासन की ही याद दिलाता हैये १५० हिन्दू जिनमें बच्चे बुजुर्ग महिलाये भी शामिल है इन्होने दिल्ली में शरण ली हैकुछ छोटे स्वयंसेवी संघठनो और इक्का दुक्का समाज सेवको के अलावा कोई भी उनकी सुध लेने वाला नहीं हैखान्ग्रेस अपनी हिंदुविरोधी नीतियों और तुष्टिकरण के कारण इन हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए अपना पूरा जोर लगा रही हैइन हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में शरण पाने की याचिका भी सरकार ने जानबूझकर विचाराधीन रखा हैइसी बिच एक हिन्दू संघटन ने इन्हें उत्तर प्रदेश में शरण दिलाने की कवायद  की तो यू पी पुलिस ने उन्हें रात मे ही मार पिट कर दिल्ली भगा दियाखैर कांग्रेस से हिन्दू विरोध की ही उम्मीद की जा सकती है क्यूकी इस पार्टी का इतिहास ही है तुष्टिकरण का हैसबसे कष्टप्रद बात ये है की इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संघठन को लकवा मार गया है और भरतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का झंडा उठाने वाली पार्टी ने इस मुद्दे पर कोई पहल करने की जरुरत नहीं समझीहिन्दू  हृदय सम्राट की पदवी पाए हुए माननीय नरेन्द्र मोदी जी भी चुप हैइसका कारण क्या है??
आगामी चुनावों को देखते हुए मुश्लिम वोट बैंक की खातिर राजनितिक पार्टियाँ इन हिन्दुओं को जबरिया पाकिस्तान भेजने से भी गुरेज न करेहाँ अगर ये लोग मुश्लिम होते तो खान्ग्रेस से लेकर भाजपा सब पार्टियों में ईनको हिन्दुस्थान में शरण दिलाने की होड़ लग जातीशायद भारत सरकार को शरणार्थी नीति पर भी एक स्पष्ट रुख अख्तियार करना चाहिएकितना शर्मनाक है की हिन्दुस्थान में ६ करोड़ जेहादी बांग्लादेशियों को बसाने में खान्ग्रेस सरकार को सोचने में जरा भी समय नहीं लगता और सिर्फ १५० हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा हैअसम का उदाहरण ले तो रातो रात ट्रक में बैठकर बंगलादेशी आते है और अगले दिन तक जंगल के जंगल गांव में तब्दील। न कोई शरण देने का झंझट न कोई निरीक्षण..इसका कारण है की वो मुश्लिम है..वो एक वोट बैंक है
इस परिस्थिति में हिन्दुओं को भी आत्म मंथन करने की जरुरत क्या हिन्दुस्थान का हिन्दू इतना निरीह हो गया है की ११० करोण हिन्दू मिलकर १५० भाई बहनों को शरण न दे सके? शायद हम हिन्दुओं की आंतरिक फूट ,तथाकथित सेकुलर होने की होड़ और खान्ग्रेसियों के तलवे चाटने वालों की हिमायत करने की प्रवृत्ति इस का कारण हैकल्पना करे अफजल गुरु के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों का,देशद्रोही होने के बाद भी एक बड़ा तबका उसे आदर्श मानता हैवैश्विक स्तर पर मुश्लिम लादेन के प्रबल समर्थक भी है मगर अब दूसरी और हिन्दुस्थान में हिन्दू ही कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर को आतंकी बता कर अपनी बौधिक चेतना के दिवालियेपन और हिन्दुओं की नपुंसकता का परिचय देते रहते है
अगर अब भी हिन्दुओं ने नपुंसकता नहीं छोड़ी तो आज १५० पाकिस्तानी हिन्दू दर दर  भटक रहें है कल ११० करोड़ हिन्दुस्थान के हिन्दू आतंकी घोषित कर दिए जायेंगे और बाबर और मीर जाफर की औलादे इस देश पर शासन करेंगीऔर हम अपनी संस्कृति और धर्म के मुगालते में रहते हुए "गर्व से कहो हम हिन्दू है" की छद्म गाथा गाते रहेंगे
आप सभी से अनुरोध है आप जहा कहीं भी हो संवैधानिक मर्यादा में रहते हुए एक पत्र माननीय प्रधानमंत्री जी,राष्ट्रपति जी,अपने जनप्रतिनिधिया जिलाधिकारी किसी को भी किसी माध्यम से,इन हिन्दुओं की सहायता के लिए, लिखें और उन हिन्दुओं की सहायता के लिए प्रयास करते हुए समाज और हिंदुत्व के लिए अपना कर्तव्य पूरा करने की कड़ी में एक छोटा सा प्रयास करें

आठवीं रचना..............लघु कथा............... ( डा श्याम गुप्त )


           कमलेश जी की यह आठवीं रचना थी | अब तक वे दो महाकाव्य, दो खंड काव्य व तीन काव्य संग्रह लिख चुके थे | जैसे तैसे स्वयं खर्च करके छपवा भी चुके थे | पर अब तक किसी लाभ से बंचित ही थे | आर्थिक लाभ की अधिक चाह भी नहीं रहीजहां भी जाते प्रकाशक, बुक सेलर, वेंडर, पुस्तक-भवन, स्कूल, कालिज, लाइब्रेरी एक ही उत्तर मिलता, आजकल कविता कौन पढ़ता है; वैठे ठाले लोगों का शगल रह गया है, या फिर बुद्धिबादियों का बुद्धि-विलास |  न कोई बेचने को तैयार है न खरीदने को |  हां नाते रिश्तेदार, मित्रगण मुफ्त में लेने को अवश्य लालायित रहते हें, और फिर घर में इधर-उधर पड़ी रहतीं हैं |
           
काव्य गोष्ठियों में उन्हें सराहा जाता;  तब उन्हें लगता कि वे भी कवि हैं तथा कालिदास, तुलसी, निराला के क्रम की कड़ी तो हैं ही |  पर यश भी अभी कहाँ मिल पाया था |  बस एक दैनिक अखवार ने समीक्षा छापी थी, आधी-अधूरी |  एक समीक्षा दो पन्ने वाले नवोदित अखवार ने स्थान भरने को छापदी थी |  कुछ काव्य संग्रहों में सहयोग राशि के विकल्प पर कवितायें प्रकाशित हुईं | पुस्तकों के लोकार्पण भी कराये;  आगुन्तुकों के चाय-पान में व कवियों के पत्र-पुष्प समर्पण व आने-जाने के खर्च में जेब ढीली ही हुई | अधिकतर रचनाएँ रिश्तेदारों, मित्रों व कवियों में ही वितरित हो गईं |  कुछ विभिन्न हिन्दी संस्थानों को भेज दी गईं जिनका कोई प्रत्युत्तर आजतक नहीं मिला;  जबकि हुडदंग -हुल्लड़ वाली कवितायेँ, नेताओं पर कटाक्ष वाली फूहड़ हास्य-कविताओं वाले मंचीय-कवि, मंच पर, दूरदर्शन पर, केबुल आदि पर अपना सिक्का जमाने के अतिरिक्त आर्थिक लाभ से भी भरे-पूरे रहते हैं |
          
किसी कवि मित्र के साथ वे प्रोत्साहन की आशा में नगर के हिन्दी संस्थान भी गए | अध्यक्ष जी बड़ी विनम्रता से मिले, बोले, पुस्तकें तो आजकल सभी छपा लेते हैं, पर पढ़ता व खरीदता कौन है? संस्थान की लिखी पुस्तकें भी कहाँ बिकतीं हैं | हिन्दी के साथ यही तो होरहा है, कवि अधिक हैं पाठक कम | स्कूलों में पुस्तकों व विषयों के बोझ से कवितायें पढ़ाने-पढ़ने का समय किसे है | कालिज के छात्र अंग्रेज़ी व चटपटे नाविलों के दीवाने हैं , तो बच्चे हेरी-पौटर जैसी अयथार्थ कहानियों के | युवा व प्रौढ़ वर्ग कमाने की आपाधापी में शेयर व स्टाक मार्केट के चक्कर में , इकोनोमिक टाइम्स, अंग्रेज़ी अखवार, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के फेर में पड़े हैं | थोड़े बहुत हिन्दी पढ़ने वाले हैं वे चटपटी कहानियां व टाइम पास कथाओं को पढ़कर फेंक देने में लगे हैं | काव्य, कविता,साहित्य आदि पढ़ने का समय-समझने की ललक है ही कहाँ पुस्तक का शीर्षक पढ़कर अध्यक्ष जी व्यंग्य मुद्रा में बोले, " काव्य रस रंग " -शीर्षक अच्छा है पर शीर्षक देखकर इसे खोलेगा ही कौन |  अरे ! आजकल तो दमदार शीर्षक चलते हैं, जैसे- 'शादी मेरे बाप की',  ईश्वर कहीं नहीं है’,  नेताजी की गप्पें',  राज-दरवारी  आदि  चौंकाने वाले शीर्षक हों तो इंटेरेस्ट उत्पन्न हो |
          
वे अपना सा मुंह लेकर लौट आये |  तबसे वे यद्यपि लगातार लिख रहे हैं, पर स्वांत -सुखाय; किसी अन्य से छपवाने या प्रकाशन के फेर में न पड़ने का निर्णय ले चुके हैं |  वे स्वयं की एक संस्था खोलेंगे | सहयोग से पत्रिका भी निकालेंगे एवं अपनी पुस्तकें भी प्रकाशित करायेंगे | पर वे सोचते हैं कि वे सक्षम हैं, कोई जिम्मेदारी नहीं, आर्थिक लाभ की भी मजबूरी नहीं है | पर जो नवोदित युवा लोग हैं व अन्य साहित्यकार हैं जो साहित्य व हिन्दी को ही लक्ष्य बनाकर ,इसकी सेवा में ही जीवन अर्पण करना चाहते हैं उनका क्या? और कैसे चलेगा ! और स्वयं साहित्य का क्या ?