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*****होड़ लगी एक बार गधो में*****

वन्दे मातरम दोस्तों,

होड़ लगी एक बार,
गधो में सत्ता पाने की,
चुनाव जीत बाकायदा,
संसद जाने की.........

आपस में कर बैठकें,
चुना गया प्रत्याशी एक,
काम चोर, महा आलसी,
हर तरह से सत्यानाशी एक........

बहुमत से तब मिल जुल कर,
एजेंडा एक पास हुआ,
जनता हमसे बड़ी गधी है,
जीतेंगे विश्वाश हुआ .............

चुनाव में जनता ने देखे,
गधे एक से एक बड़े,
एक मगर चुनना था जरूरी,
जितने थे चुनाव लड़े.........

अपनी समझ से जनता ने चुना तब,
सबसे कम बदमाश गधा,
चुनाव जीत, मक्कार काम चोर,
हो गया था ख़ास गधा..........

संसद से मन्दिर में फिर,
चहूँ ओर था अजब नजारा,
कोने में दुबका फिरता था,
चुन आया जो शेर बेचारा..........

अपनी ढपली, अपना राग,
सत्ता के मद में मदमाते,
इनके खिलाफ बोलने वाले,
आधी रात में लाठी खाते..........

भूख से त्राहिमाम देश में,
बेंक खाते इनके भरते जाते,
कुपोषण से लाखों बच्चे,
सालों साल है मरते जाते............

इनका कुछ बिगड़ेगा नही,
इनको इसलिए फ़िक्र कहाँ,
एकता जनता की तोड़ने,
डाला आरक्षण का दंश यहाँ.........

आदरणीय सांसदों संसद में सभी बुरे नहीं हैं, मगर मजबूरी में भी बुरे का साथ देना अपने आप को बुरा बना लेना है, यहाँ गधों से तात्पर्य ऐसे सांसदों से है जिन्हें जनता की नही, अपनी परवाह है, ओर अपने भले के लिए वे नीचता की किसी भी सीमा तक जा सकते हैं,
जो सांसद अपने आप को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर गधा नही मानते हैं..... उनसे में सादर माफ़ी चाहता हूँ ओर हाथ जोड़ कर कहता हूँ ये गधा शब्द कमसे कम आपके लिए नही है.

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