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जाति, भाषा, मजहब की, शहर में आग लगाते हैं.........

वन्दे मातरम दोस्तों,

चली चुनावी हवा, जनता को मूर्ख बनाते हैं,
चलो कुछ मानते नही, चलो कुछ भूल जाते हैं.........

जहर का कारोबार किया, माना की हमने अब तक,
शराब जाम में मिला, चलो अमृत बरसाते हैं...........

फूट का विष हमने बोया,अपना राज चलाने को,
दिखावे को ही सही, अमन के पेड़ लगाते हैं..........

मौत की मानिंद, सब कुछ बेहद सस्ता होगा,
अब की भूख से नही मरोगे, गरीबों को बतलाते है...........

हमसे गर कुछ गलत हुआ, माफ़ी दो मौका एक और,
भोली है जनता, चलो फिर से बरगलाते हैं............

नोटों की बारिस हो, गुंडों का हरपल हो साथ,
धन बल, बाहू बल, जैसे हो जनता को मनाते हैं........

ये चाले नही चली, तो फिर जीतने खातिर,
जाति, भाषा, मजहब की, शहर में आग लगाते हैं.........

1 टिप्पणी:

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

आपने चुनावों में गाया जाने वाला "राग प्रचारी" बाखूबी गाया ... इस राग से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं. फिर भी इस राग में आपने नया गीत गाया.... पसंद आया.

राकेश जी,
सच में हर चुनाव की यही असलियत है.