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श्रेष्ठता का अतिवाद


इतिहास के झरोखे से...

यह अच्छा हो या बुरा किंतु निर्मल मन से हमें यह स्वीकारना ही होगा कि सभ्यता के बोध के साथ वंश की श्रेष्ठता का भाव मानव मन के एक कोने में सदा के लिये बस चुका है । आप इसे मानव-सभ्यता का साइड-इफ़ेक्ट कह सकते हैं । समाज में कुछ लोग श्रेष्ठ होना चाहते हैं तो कुछ अपनी श्रेष्ठता बनाये रखना चाहते हैं । “श्रेष्ठवंश” के इस भाव ने समाज में उच्च और निम्न वर्ग के अंतर को बनाये रखा है । ग्रीक राजवंशों से लेकर हिटलर और माओ तक रक्त की श्रेष्ठता और शुद्धता को लेकर असुरक्षा के भय से ग्रस्त बने रहे । जेनेटिक शुद्धता की असुरक्षा के संकट से निपटने के लिये जातीय संहार से लेकर ब्रेन-वाश और भाई-बहन के परस्पर विवाह तक की विधियों को पूरी दुनिया में अपनाया जाता रहा है । भारत में नियोग के अतिरिक्त तपश्चर्या पर विश्वास किया जाता रहा तो पश्चिमी और मध्य एशियाई देशों में रक्तसम्बन्धों में विवाह पर भरोसा किया जाता रहा । हिटलर ने जातीय संहार को अपनाया तो माओ ने अपनी जीवित प्रयोगशालाओं में मनोवैज्ञानिक तरीकों पर भरोसा करते हुये किशोरावस्था से ही भावी पीढ़ी के मस्तिष्क का वैचारिक प्रक्षालन प्रारम्भ किया । माओ को यह विश्वास था कि इस तरह के प्रक्षालन से तैयार पीढ़ी के परस्परिक विवाह से होने वाली संतानों के जींस में होने वाले गुणात्मक म्यूटेशन से कम्युनिज़्म के जेनेटिक ट्रेट्स विकसित होंगे जो शुद्ध कम्युनिज़्म का संवहन करेंगे । माओ के इस प्रयोग से एक मज़ेदार बात यह प्रमाणित होती है कि वर्गभेद का विरोध करने वाले माओ के मन में भी मनुष्य की प्रकृति, आचरण और विचारों को लेकर श्रेष्ठता और हीनता का स्थायी भाव था ।

महानता के बोध में डूबता चला गया यूनान...
         
अपने दुर्दांत योद्धाओं, बेहद ख़ूबसूरत स्त्रियों, गणित, कला और दर्शन प्रेमी नागरिकों की विरासत से सम्पन्न यूनान को भी एक दिन खंडहर और विनाश देखने के लिये बाध्य होना पड़ा था । कहीं इस सबका कारण उसका अतिवाद तो नहीं !   
एथिकल और वंशीय महानता के बोध से ग्रीक मूल का मिस्री बादशाह “सिकन्दर महान” भी ख़ुशफ़हम था । ग्रीक राज-वंशों में रक्त की शुद्धता बनाये रखने के लिये भाई-बहनों के पारस्परिक विवाहों की परम्परा ही पड़ गयी । जेनेटिक शुद्धता को लेकर ये लोग इतने चिंतित थे कि अपना नाम तक नहीं बदलना चाहते थे । वंश परम्परा से चले आ रहे नाम में ही केवल संख्याओं के आधार पर उन्हें चिन्हित किया जाने लगा । कला, दर्शन और गणित के प्रेमी ग्रीक राजाओं की पहचान गणितीय संख्याओं पर आश्रित होने लगी । ग्रीकमूल की मिस्री शासक क्लियोपेट्रा सप्तम् के माता-पिता भी आपस में भाई-बहन थे । तीन सौ वर्ष तक ग्रीस पर शासन करने वाले टोलेमी राजवंश की अंतिम स्त्री शासक क्लियोपेट्रा ने भी अपने दो भाइयों से विवाह किया था । ईसापूर्व 69 में जन्मी क्लियोपेट्रा सप्तम् के पिता टोलेमी त्रयोदश का भी विवाह अपनी बहन के ही साथ हुआ था ।

विद्वता और सौन्दर्य की नैसर्गिक सम्पत्तियाँ भी उसे क्रूर होने से नहीं बचा सकीं... 

इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई अपनी वीरता और देशप्रेम के लिये विख्यात हुयीं तो मात्र 39 वर्ष तक जीवन को भरपूर भोग कर दुनिया को अलविदा कहने वाली मिस्र की क्लियोपेट्रा अपनी विद्वता, बहुभाषाज्ञान, सत्ता की अदम्य भूख के लिये शारीरिक समझौतों, कई विवाहों, प्रेम सम्बन्धों, भाई-बहन की हत्याओं और ख़ूबसूरती के लिये चर्चित हुयी । उसने सत्ता के लिये अपने भाई से पति बने टोलेमी त्रयोदश और छोटी बहन अर्सिनोय चतुर्थ की हत्या करवा दी । किशोरावस्था से लेकर अपनी युवावस्था तक क्लियोपेट्रा के जीवन में चार पुरुष आये और चले गये... दो अपने स्वयं के भाई, तीसरा ज़ूलियस सीज़र और चौथा मार्क एण्टोनी । इस बीच उसने चार बच्चों को भी जन्म दिया, ज़ूलियस सीज़र से सीज़ेरियॉन, और मार्क एण्टोनी से तीन बच्चे ।
ईसापूर्व 30 में रोम ने अलेक्ज़ेण्ड्रिया पर हमला किया । युद्ध में मार्क एण्टोनी की पराजय हुयी । रोमन्स ने मार्क एण्टोनी को क्लियोपेट्रा के मरने की झूठी ख़बर सुना कर आत्महत्या के लिये प्रेरित किया । रोमन्स जो चाहते थे वही हुआ, एण्टोनी ने आत्महत्या का प्रयास किया, उसे रक्तरंजित अवस्था में क्लियोपेट्रा के पास ले जाया गया । घोर निराशा और अथाह दुःख के सागर में डूबी क्लियोपेट्रा ने एण्टोनी को अपना वास्तविक पति और प्रेमी स्वीकार करते हुये अपने शरीर को कूटना और नोचना शुरू कर दिया । उसके कारुणिक विलाप को देखकर शत्रु और विरोधी भी दहल गये, पूरा मिस्र दुःखित हुआ ।
रक्तरंजित एण्टोनी का शरीर क्लियोपेट्रा के सामने था । ज़िन्दग़ी को भरपूर जीने की शौक़ीन क्लियोपेट्रा को लगा कि अब उसकी दुनिया ख़त्म हो चुकी है । दूसरों को क्रूरता से मरवा देने वाली क्लियोपेट्रा ने अपनी मौत के लिये भी एक दर्दनाक तरीका ही चुना । बारह अगस्त को अलेक्ज़ेण्डिया के एक मौसोलियम में सर्पदंश लेकर क्लियोपेट्रा ने दुनिया को अलविदा कह दिया । अतिवाद की वंशपरम्परा ने क्लियोपेट्रा को जिस मार्ग पर ढकेला था उसकी ऐसी परिणति दुःखद है और हम सबके लिये सचेतक भी ।
 


आर्यों का श्रेष्ठत्व...

शब्द “आर्य” श्रेष्ठत्व का बोधक है । आर्यों की श्रेष्ठता अपने सार्वभौमिक चिंतन, उदात्त मानवीय संस्कारों और आचरण में सतत परिमार्जन का परिणाम हुआ करती थी । श्रेष्ठ होना एक सतत गतिमान प्रक्रिया है जो सात्विक तपश्चर्या की अपेक्षा करती है । आर्यों को अपने सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतन के लिये जाना जाता रहा है । कालांतर में तपश्चर्या समाप्त हो गयी, आत्मिक विकास की गतिमान प्रक्रिया अवरुद्ध हो गयी और पूर्वजों की महानता को ओढ़ने का विकल्प जीवन में अपना लिया गया ।
आर्यों के आधुनिक वंशजों में अपने पूर्वजों की महानता का लेश भी दिखायी नहीं देता । राजा और प्रजा के सामूहिक चारित्रिक पतन ने विदेशी आक्रमणकारियों को अवसर उपलब्ध होने दिया । आर्यावर्त पददलित हुआ और एक दीर्घपराभव के दुःख को भोगने के लिये विवश हुआ । हम अभी तक इस दुःख से मुक्त नहीं हो सके हैं... मुक्त होने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं ।
तब आर्यत्व एक अर्जित पद हुआ करता था, लोग अनार्यत्व से आर्यत्व की दिशा में चलने के लिये साधना किया करते थे । अब हम मानते हैं कि हमारी अकर्मण्यता और जड़ता ने हमें आर्यत्व से बहुत दूर कर दिया है । मूर्ति पूजा के विकृत स्वरूपों, पाखण्डों, विकृत अनुष्ठानों और तामसी वृत्तियों ने हमारे पूर्वजों के आर्यत्व से हमें वंचित कर दिया है । हम आर्य कहलाने के लेश भी अधिकारी नहीं रहे ।
जब मैं उच्च-शिक्षितों को आर्थिक अपराधों में लिप्त पाये जाने की सूचनायें पढ़ता हूँ, अनुष्ठान कराने वाले पंडितों के पतन को देखता हूँ, शिक्षकों को छात्राओं के यौनशोषण में लिप्त होने की ख़बरें सुनता हूँ, पूजा पण्डालों के अनैतिक व्यापार को देखता हूँ, धार्मिक कार्यों के लिये असामाजिक तत्वों को निर्भय हो चंदा वसूलते देखता हूँ, गुरुओं को राष्ट्रविरोधियों के पक्ष में खड़े होकर कुतर्क करते हुये देखता हूँ... तो मुझे लगता है कि अब आर्यत्व एक अतीत का विषय हो कर रह गया है और उसके स्थान पर एक आतंकवाद जन्म ले रहा है । यह आतंकवाद अनियंत्रित है, निरंकुश है, निर्भय है और अतिवादियों द्वारा पोषित है । मेरा स्पष्ट मत है कि आत्मोत्थान के बिना आर्यत्व और हिंदुत्व की बात करने का कोई अर्थ नहीं है । हिंदू मत में अपनी विचारधारा दूसरों पर थोपने का कोई प्रावधान नहीं है किंतु जो ऐसा करके स्वयं को हिंदू धर्म के रक्षक होने के मिथ्याभिमान में चूर हैं वे निश्चित रूप से एक धार्मिक आतंकवाद के पोषक हैं । यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो एक दिन हिंदू धर्म भी लोगों की घृणा का विषय बन जायेगा । हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि किसी भी सिद्धांत की पहचान और उसका व्यावहारिक अस्तित्व उसके अनुयायियों द्वारा ही प्रतिष्ठित या तिरस्कृत होता है ।